भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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(६०) अद्भुतरामायण [ दशम -

आत्मानं दर्शयामास हनूमान्रामलक्ष्मणौ । को भवानिति चोक्तेऽथ चतुर्बाहुं किरीटिनम् ॥ ११ ॥ शंखचक्रगदापाणिं वनमाला- विभूषितम् । श्रीवत्सबक्षसं देवं पीतवाससमच्युतम् ॥ १२ ॥

वालीके भयसे रहता था, उसने रामलक्ष्मणको देखा, वह वीर चाप धारण किये आकाशसे ग्रसते हुएके समान थे ॥ ९ ॥ उनको देखकर सुग्रीव बडे त्रासको प्राप्त हुआ, कारण कि, उनको वालीके पक्षका जाना, तब भिक्षुरूपसे महावीरको उनके निकट भेजा ॥ १० ॥ हनुमान्ने रामलक्ष्मणको अपना स्वरूप दिखाया, आप कौन हो इस प्रकार चतुर्बाहु किरीटधारी ॥ ११ ॥ शंख, चक्र, गदापाणि वन मालासे विभूषित श्रीवत्स वक्षस्थलमें धारण किये, पीतवस्त्रधारी अच्युत ॥ १२ ॥

लक्ष्मीसरस्वतीभ्यां च संश्रितोभयपार्श्वकम् । ब्रह्मपुत्रैः सनन्दाद्यैः स्तूयमानं समन्ततः ॥ १३ ॥ देवर्षिपितृगंधर्वैः सिद्धविद्याधरोरगैः । सेव्यमानं महात्मानं पुंडरीकविलोचनम् ॥ १४ ॥

लक्ष्मी सरस्वतीसे सेवित ब्रह्माके पुत्र सनन्दादिसे सब ओर सेव्यमान ॥ १३ ॥ देवता पितर गन्धर्व सिद्धविद्याधर उरग महात्माओंसे सेवित कमललोचन ॥ १४ ॥

सहस्र सूर्यसंकाशं शतचन्द्रशुभाननम् । फणासहस्रमतुलं धारयन्तं च लक्ष्मणम् ॥ १५ ॥ अनन्तं रामशिरसि आतपत्रं फणागणैः । दधानं सर्वलोकेशनागसंघैश्च संस्तुतम् ॥ १६ ॥

सहस्रसूर्यके समान प्रकाशमान, सौ चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाले सहस्र फण धारण किये लक्ष्मणको ॥ १५ ॥ जो अनन्त हैं और रघुनाथजीके शिरपर अपने फणोंका छत्र धारण किये हैं वे सर्वलोकेश नागसमूहोंसे स्तुति किये हुए हैं ॥ १६ ॥

आत्मानं दर्शयामास रामचन्द्रो हनूमते । तद्रूपं हनूमन्वीक्ष्य किमेतदिति विस्मितः ॥ १७ ॥ क्षणं निमील्य नयने पुनः सोऽपश्यद- द्भुतम् । स्तुत्वा नत्वा च बहुधा सोऽब्रवीद्राघवं वचः ॥ १८ ॥

इस प्रकार रामचन्द्रने महावीरजीके प्रति अपनी आत्माको दिखाया महावीरजी उस रूपको देख यह क्या है इस प्रकार विस्मित हो गये ॥ १७ ॥ क्षणमात्रको नेत्र मीचकर फिर वह अद्भुत रूप देखते हुए और अनेक प्रकारकी स्तुति और प्रणाम कर रामचन्द्रसे कहने लगे ॥ १८ ॥