अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग हिन्दीटीकासहित (६१)
अहं सुग्रीवसचिवो हनुमान्नाम वानरः । सुग्रीवेण प्रेषितोऽहंयुवां कौ ज्ञातुमागतः ॥ १९ ॥
दृष्ट्वा युवां च द्विभुजौ चापबाणधरौ परम् । आगत्य चान्यथा दृष्टं वद मे को भवानिति ॥ २० ॥
में सुग्रीवका मंत्री हनुमान् नाम वानर हूँ, सुग्रीवने भेजा है देखियो कि, यह कौन हैं ? ॥ १९ ॥ आपको धनुषबाण धारण किया देखकर अगर कुछ और ही प्रकारसे देखा, कहिये आप कौन हैं। ॥ २० ॥
इति पवनसुतं तं व्याकुलं व्याहरन्तं किमिति कथमितीदं कंपमानं प्लवंगम्।।
कृतकरपुटमौलिं संविधेयं ब्रुवन्तं मधुरतर मुदारं रामचन्द्रोऽब्रवीत्तम् ॥ २१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदि काव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे श्रीराम-चतुर्भुजरूपदर्शनं नाम दशमः सर्गः ॥ १० ॥
इस प्रकार व्याकुलतासे कहते महावीरके वचन सुन यह क्या है इस प्रकार कहकर कंपित होते हुए और हाथ जोडकर शिर झुकाये वचन कहते महावीर-वीरजीसे उदारतापूर्वक रामचन्द्र बोले ॥ २१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रा. अ. भाषाटीकायां चतुर्भुजरूपदर्शनं नाम दशमः सर्गः ॥ १० ॥
एकादश सर्ग
रामका सांख्ययोग वर्णन करना
रामःप्राह हनूमन्तमात्मानं पुरुषोत्तमः ॥
वत्स वत्स हनूमंस्त्वं भक्तोयत्पृष्टवानसि ॥ १ ॥
तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि शृणुष्वावहितो मम ॥
अवाच्यमेतद्विज्ञानमात्मगुह्यं सनातनम् ॥ २ ॥
पुरुषोत्तम राम हनुमान्से अपना वर्णन करने लगे, हे वत्स हनुमान् ! हमारे भक्त तुम जो हमसे पूछते हो ॥ १ ॥ सो मैं कहता हूँ तुम सावधान होकर सुनो यह आत्मगुह्य सनातन ज्ञान किसीसे कहना नहीं चाहिये ॥ २ ॥
यन्न देवा विजानंति यतन्तोऽपि द्विजातयः ॥
इदं ज्ञानं समाश्रित्य ब्रह्मभूताद्विजोत्तमाः ॥ ३ ॥
न संसारं प्रपश्यंति पूर्वेऽपि ब्रह्मवादिनः ॥
गुह्याद्गुह्यतमं साक्षाद्गोपनीयं प्रयत्नतः ॥ ४ ॥