अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५ (६२) अद्भुतरामायण [ एकादश-
जिसको यत्न करनेपर देवता और द्विजातिभी नहीं जानते हैं, इस ज्ञानको प्राप्त द्विजोत्तम ब्रह्ममय हो जाते हैं ॥ ३ ॥ इसके द्वारा पूर्वब्रह्मवादी भी संसारको नहीं देखते हैं यह गुप्तसे गुप्त छिपा रखनेके योग्य है ॥ ४ ॥
वंशे भक्तिमतो ह्यस्य भवंति ब्रह्मवादिनः ॥ आत्मा यः केवलः स्वच्छः शांतः सूक्ष्मः सनातनः ॥ ५ ॥ अस्ति सर्वान्तरः साक्षाच्चिन्मात्रस्तमसः परः ॥ सोऽन्तर्यामी स पुरुषः स प्राणः स महेश्वरः ॥ ६ ॥
जो जानता है उसके वंशमें महात्मा और ब्रह्मवादी होते हैं, आत्मा केवल स्वच्छ शान्त सूक्ष्म सनातन है ॥ ५ ॥ वह सर्वान्तर साक्षात् चिन्मात्र अन्धकार से परे है, वही अन्तर्यामी पुरुष प्राण और महेश्वर है ॥ ६ ॥
स कालाग्निस्तदव्यक्तं सद्यो वेदयति श्रुतिः ॥ कस्माद्विजायते विश्वमत्रैव प्रविलीयते ॥ ७ ॥ मायावी मायया बद्धः करोति विविधास्तनूः ॥ न चाप्ययं संसरति नच संसारयेत्प्रभुः ॥ ८ ॥
वही कालाग्नि अव्यक्त है यह वेदश्रुति कहती है, इससे संसार उत्पन्न होकर इसीमें लय हो जाता है ॥ ७ ॥ वही मायावी मायासे बद्ध होकर अनेक शरीर धारण करता है, न कोई इसे चला सकता है न यह चलता है ॥ ८ ॥
नायं पृथ्वी न सलिलं न तेजः पवनो नभः ॥ न प्राणो न मनो व्यक्तं न शब्दः स्पर्श एव च ॥ ९ ॥ न रूपरसगन्धश्च नाहङ्कर्ता न वागपि ॥ न पाणिपादौ नो पायुर्न चोपस्थं प्लवंगम ॥ १० ॥
न यह पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश प्राण मन अव्यक्त शब्द स्पर्श है ॥ ९ ॥ न रूप रस गन्ध और न अहंकार न वाणी है, हे महावीर ! कर चरण उपस्थ पायुरूप भी नहीं है ॥ १० ॥
न कर्ता न च भोक्ता च न प्रकृतिपूरुषौ ॥ न माया नैव च प्राणश्चैतन्यं परमार्थतः ॥ ११ ॥ तथा प्रकाशतमसोः सम्बन्धोनोपपद्यते ॥ तद्वदेव न सम्बंधः प्रपञ्चपरमात्मनोः ॥ १२ ॥
कर्त्ता भोक्ता प्रकृति पुरुष माया प्राण भी नहीं है, केवल चैतन्य स्वरूप है ॥ ११ ॥ जिस प्रकार प्रकाश और अन्धकारका सम्बन्ध नहीं है इसी प्रकार प्रपंचसे परमात्माका कुछ सम्बन्ध नहीं है ॥ १२ ॥
छायातरू यथा लोके परस्परविलक्षणौ ॥ तद्वत्प्रपंचपुरुषौ विभिन्नौ परमार्थतः ॥ १३ ॥ यद्यात्मा मालिनोऽस्वस्थो विकारी स्यात्स्वभावतः । नहि तस्य भवेन्मुक्तिर्जन्मांतरशतैरपि ॥ १४ ॥