अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 173 में से
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दशम सर्ग
रामचन्द्रका महावीरको चतुर्भुजरूप दिखाना
अथ सीतालक्ष्मणाभ्यां सह केनापि हेतुना । जगाम विपिनं रामो दंडकारण्यमाश्रितः ॥ १ ॥ तत्र गोदावरीतीरे पर्णशालां विधाय सः । उवाच कंचित्कालं वै मृगयामभिकारयन् ॥ २ ॥
फिर सीता लक्ष्मणके साथ किसी कारणसे रामचन्द्र दण्डकारण्यमें आये । ॥ १ ॥ वहां गोदावरीके किनारे पर्णशाला रचकर मृगया करते कुछ दिन वहाँ रहे ॥ २ ॥
कदाचिद्रावणो मोहाल्लंकायां तां न्यवासयत् । तामदृष्ट्वा ततो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः ॥ ३ ॥ आटतुश्चाटवीं सर्वां सीतादर्शन-लालसौ । रामस्य रुदतस्तस्य बाष्पवारिसमुद्भवा ॥ ४ ॥
एक समय मोहसे जानकीको हरण कर रावण ले गया, उनको राम लक्ष्मण देखकर ॥ ३ ॥ सीताके दर्शनकी इच्छासे सम्पूर्ण वन ढूंढते हुए ॥ ४ ॥
नदी वैतरणी चाभूच्चक्षुषोरश्रुवुद्भवा । वितरत्यश्रु वै यस्मादतो वैतरणीस्मृता ॥ ५ ॥ पितॄणां तरणं यस्मान्मानूणां स्नानतर्पणात् । तेनापि कारणेनासौ नदी वैतरणी स्मृता ॥ ६ ॥
उनके नेत्रोंके जलसे एक वैतरणी नदी बह गई थी; आंसू विपरीत होनेसे वह वैतरणी कहाई ॥५॥ जिसमें स्नान दान करनेसे मनुष्योंके पितर तरते और तृप्त हो जाते हैं इसी कारणसे वैतरणी कहाती है ॥ ६ ॥
नेत्रयोर्दूषिकायाश्चय ताभिः शैलास्ततोऽभवन् । सुग्रीवेण वानरेण सख्यं कर्तुं महामनाः ॥ ७ ॥ ऋष्यमूकंमगाद्रामो लक्ष्मणेनानुजेन च । पञ्चभिर्मंत्रिभिः सार्द्धं सुग्रीवो नाम वानरः ॥ ८ ॥
और नेत्रोंके मलसे वहांसे पर्वत हो गये हैं फिर वे सुग्रीवके साथ मित्रता करनेकी इच्छासे ॥ ७ ॥ रामचन्द्र लक्ष्मणके सहित ऋष्यमूक पर्वतको गये; वहां पांच मंत्रियोंके साथ सुग्रीव नामक वानर ॥ ८ ॥
यत्रास्ते वालिभयतः सोऽपश्यद्रामलक्ष्मणौ । चापबाणधरौ वीरौ ग्रसंताविव चाम्बरम् ॥ ९ ॥ तौ दृष्ट्वा सुमहत्त्रस्तो वालिपक्षा-वमन्यत । प्रास्थापयद्धनूमंतं भिक्षुरूपेण वानरम् ॥ १० ॥