भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 173 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 65

(५८) अद्भुतरामायण [ नवम-

भीतश्च तत्र न्यवसद्विनीतश्च महा तपाः । ततः संवत्सरेऽतीते हृतौजसमवस्थितम् ॥ २७ ॥ निर्मदं दुःखितं दृष्ट्वा पितरो राम- मब्रुवन् । न वै सम्यगिदं पुत्र विष्णुमासाद्य वै कृतम् ॥ २८ ॥

वहाँ भीत और नम्रतापूर्वक निवास करते हुए फिर सम्वत्सरके बीत जानेपर पराक्रमरहित स्थित रहे ॥ २७ ॥ उस समय उनके पितर निर्मद और दुःखी देखकर परशुरामजीसे बोले हे पुत्र ! विष्णुको प्राप्त होकर यह तुमने अच्छा नहीं किया है ॥ २८ ॥

स हि पूज्यश्च मान्यश्च त्रिषु लोकेषु सर्वदा । गच्छ पुत्र नदीं पुण्यां वधूसरकृतालयाम् ॥ २९ ॥ तत्रोपस्पृश्य तीर्थेषु पुनर्बपुुरवा- प्स्यसि । दीप्तोदं नाम तत्तीर्थं यत्र ते प्रपितामहः ॥ ३० ॥

वह सदा त्रिलोकीमें पूज्य और मान्य हैं; अब तुम वधूसर आलयवाली पवित्र नदीमें जाओ ॥ २९ ॥ वहाँ तीर्थोंमें स्नान कर फिर अपने तेजको प्राप्त होगे, वह दीप्तोह नाम तीर्थ है, जहाँ तुम्हारे प्रपितामह ॥ ३० ॥

भृगुर्देवयुगे राम तप्तवानुत्तमं तपः । तत्तथा कृतवान्रामो भार्गवो वचनात्पितुः ॥ ३१ ॥ प्राप्तवांश्च पुनस्तेजो भारद्वाज महा- मुने । एतद्यः शृणुयाद्भत्स रामचरित्रमुत्तमम् ॥ ३२ ॥

भृगुजीने देवयुगमें तप किया था; यह वचन सुन परशुरामनने वैसाहि किया ॥ ३१ ॥ हे महामुने भारद्वाज ! इस प्रकार परशुरामको फिर तेजकी प्राप्ति हुई हे वत्स ! जो कोई पवित्र रामचन्द्रके चरित्रको सुनता है ॥ ३२ ॥

सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति । ततो रामो जानकी- स्पृष्टपाणिः सूतैर्भक्त्या मागधैः स्तूयमानः । पुष्पसारैरास्तृतो देव- संघैः स उत्तरान्कोसलानाजगाम ॥ ३३ ॥

इत्यार्षे श्री. वाल्मीकीये आ. जामदग्न्याय विश्वरूपदर्शनं नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥

वह सब पापसे छूटकर विष्णुके लोकको जाता है, तब रामचन्द्र जानकीका हाथ स्पर्श कर सूतमागधजनोंसे स्तुतिको हो देवताओंसे फूलोंकी वर्षासे आच्छादित हो उत्तर कोशल देशमें आये ॥ ३३ ॥

इति श्रीरा. अद्भु. भाषाटीकायां जामदग्न्यविश्वरूपदर्शनं नाम नवमःसर्गः ॥ ९ ॥