अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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तुम मेरा दर्शन करो मैं तुमको नेत्रप्रदान करता हूँ, यह कह रामने उनके निमित्त दिव्य नेत्र दिये ॥ १७ ॥ तब परशुराम रामचन्द्रके शरीरमें आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, मरुत्समूह ॥ १८ ॥
पितॄन्हुताशनांश्चैव नक्षत्राणि ग्रहांस्तथा ॥ गन्धर्वान्राक्षसान्य- क्षान्नदीस्तीर्थानि यानि वै ॥ १९ ॥ ऋषीन्वैनिखिलान्यांश्च ब्रह्म- भूतान्सनातनान् ॥ देवर्षींश्चैव कात्स्न्र्येन समुद्रान्पर्वतांस्तथा ॥ २० ॥
पितृ, अग्नि, नक्षत्र, ग्रह, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, नदी, तीर्थ ॥ १९ ॥ ऋषि और ब्रह्मभूत, सनातन लोक, सब देवर्षि, समुद्र पर्वत ॥ २० ॥
वेदांश्च सोपनिषदान्वषट्कारान्सहाध्वरैः ॥ ऋचो यजूंषि सामानि धनुर्वेदांश्च सर्वशः ॥ २१ ॥ विद्युतो मेघवृन्द्वानि वर्षाणि च महा- व्रत ॥ ततः स भगवान्विष्णुस्तं वै बाणं मुमोच ह ॥ २२ ॥
वेद, उपनिषद्, वषट्कार यज्ञ, ऋक्, यजु, साम, सम्पूर्ण धनुर्वेद देखने लगे ॥ २१ ॥ तब विद्युत् मेघवृंद वर्ष चलायमान होगये उस समय विष्णुने उस बाणको छोडा ॥ २२ ॥
शुष्काशानिसमाकीर्णं महोल्काभिश्च सुव्रतः ॥ पांसुवर्षेण महता मेघसंघैश्च केवलम् ॥ २३ ॥ भूमिकंपैः सनिर्घातैर्नादैश्च विपुलैरपि ॥ भार्गवं विह्वलं कृत्वा तेजश्चाक्षिप्य केवलम् ॥ २४ ॥
उस समय सब जगत् उल्का और अशनिसे व्याप्त हो गया और बडी भारी धूरिकी वर्षा और मेघसमूहसे व्याप्त हो गया ॥ २३ ॥ भूमिकम्पादि महाशब्द बडे निर्घातसे परशुरामको विह्वल करके उनका केवल तेजही आकर्षण करके ॥ २४ ॥
अगच्छज्ज्वलितो रामं शरो बाहुप्रचोदितः ॥ स तु विह्वलतां गत्वा प्रतिलभ्य च चेतनाम् ॥ २५ ॥ रामः प्रत्यागतप्राणः प्राणम- द्विष्णुतेजसम् । विष्णुना सोऽभ्यनुज्ञातो महेंद्रमगमत्पुनः ॥ २६ ॥
रामकी भुजासे छूटा हुआ वह बाण चलायमान हो गया, तब विह्वलतासे परशुरामजीको जब चेतना प्राप्त हुई ॥ २५ ॥ राम फिर प्राण आये हुएको समान विष्णुको प्रणाम करते हुए और विष्णुकी आज्ञासे वे फिर महेन्द्र पर्वतको चले गये ॥ २६ ॥