अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(५६) अद्भुतरामायण नवम-
भगवन् ! आप हमपर आक्षेप न करिये क्षत्रियोंको ब्राह्मणोंके साथ अपना बल प्रकाश करना उचित नहीं है ॥ ८ ॥
इक्ष्वाकूणां विशेषेण बाहुवीर्येण कत्थनम् । तमेवं वादिनं तत्र रामो वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥ अलं वागुपदेशेन धनुरारयच्छ राघव ॥ ततो जग्राह रोषेण क्षत्रियर्षभसूदनम् ॥ १० ॥
और विशेषकर इक्ष्वाकुवंशी ब्राह्मणोंके सन्मुख अपने बाहुवीर्यका कथन नहीं करते हैं ॥ ९ ॥ यह सुनकर परशुराम बोले हे राम ! वाणीका उपदेश मत करो, धनुष चढाओ; तब क्रोध कर रामचन्द्रने धनुष ग्रहण किया ॥ १० ॥
रामो दाशरथिर्दिव्यं हस्ताद्रामस्य कार्मुकम् ॥ धनुरारोपयामास सलिलमिव राघवः ॥ ११ ॥ ज्याशब्दमकरोत्तत्र स्मयमानः स वीर्यवान् ॥ तस्य शब्देन भूतानि वित्रेशुरशनेरिव ॥ १२ ॥
जब वह धनुष रामचन्द्रके हाथमें आया तब लीलासेही रामचन्द्रने उसे चढा लिया ॥ ११ ॥ और हँसते हुए ज्याशब्द किया; उसके शब्दसे सब प्राणी वज्रके शब्दके समान घबरा गये ॥ १२ ॥
अथाब्रवीद्वचो रामं रामोदाशरथिस्तदा । इदमारोपितं ब्रह्मन्किमन्यत्करवाणि ते ॥ १३ ॥ तस्य रामो ददौ दिव्यं जामदग्न्यो महाबलः । शरमाकर्णदेशांतमयमाकृष्य तामिति ॥ १४ ॥
तब रघुनंदन परशुरामसे बोले हे ब्रह्मन् ! धनुष तो चढा लिया, कहिये अब और क्या करूं ॥ १३ ॥ तब परशुरामने एक बडा तीक्ष्ण बाण देकर कहा कर्णपर्यन्त खींचकर इसे चढाओ ॥ १४ ॥
एतच्छ्रुत्वाऽब्रवीद्रामः प्रदीप्त इव मन्युना ॥ श्रूयते क्षम्यते चैव दर्पपूर्णोऽसि भार्गव ॥ १५ ॥ त्वया ह्यधिगतं तेजः क्षत्रियेभ्यो विशेषतः ॥ पितामहप्रसादेन तेन मां क्षिपसि ध्रुवम् ॥ १६ ॥
यह सुनकर रामचन्द्र क्रोधसे दीप्तिमान् हुए बोले, सुना जाता है क्षमा किया जाता है परन्तु तुम तथापि अभिमानसे पूर्ण हो ॥ १५ ॥ आप पितामहके प्रसादसे क्षत्रियोंसे अधिक स्पर्धा करके उनके बलपर आक्षेप करते हो ॥ १६ ॥
पश्य मां स्वेन रूपेण चक्षुस्ते वितराम्यहम् ॥ इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै रामो दिव्यां दृशं तदा ॥ १७ ॥ ततो रामशरीरे वै. रामोऽपश्यत्स भार्गवः ॥ आदित्यान्वसूवुद्रान्साध्यांश्च समरुद्गणान् ॥ १८ ॥