भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५५)

नवम सर्ग

परशुरामको रामका विश्वरूप दिखाना

रामः सीतापरिणयं कृत्वा दशरथादिभिः ।। भ्रातृभिश्चापि सहितो भार्यया सह सीतया ।। १ ।। अयोध्यां गन्तुमारेभे नानावाद्य-पुरः सरम् । आर्चीकनंदनो रामो भार्गवो रेणुकासुतः ।। २ ।।

रामचन्द्र दशरथजीके सन्मुख जानकीका पाणिग्रहण करके भ्राताओंके सहित तथा जानकीके सहित ।। १ ।। विविध प्रकारके बाजे आदिके सहित अयोध्या जानेकी इच्छा करने लगे, मार्गमें आर्चीकनंदन परशुराम ।। २ ।।

तस्य दशरथेः श्रुत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः । विवाहकौतुकं वीरः पथा तेन समागतम् ।। ३ ।। धनुरादाय तद्दिव्यं क्षत्रियाणां निबर्हणम् । जिज्ञास्यमानो रामस्य वीर्यं दाशरथेस्तथा ।। ४ ।।

उन रामचन्द्र महापराक्रमीका अद्भुत विवाहकौतुक श्रवण कर मार्गमें उनसे मिले ।। ३ ।। वह क्षत्रियनाशक दिव्य धनुष लेकर रामचन्द्रके बल जाननेकी इच्छासे आये ।। ४ ।।

सतमभ्यागतं दृष्ट्वा उद्यतास्त्रमवस्थितम् । प्रहसन्निव विप्रेन्द्रं रामो वचनमब्रवीत् ।। ५ ।। स्वागतं ते मुनिश्रेष्ठ किं कार्यं करवाणि ते । प्रोवाच भार्गवो वाक्यं स्वागतेन किमस्ति मे ।। ६ ।।

उन शास्त्र उठाये परशुरामजीको खडे देख कर हँसते हुए रामचन्द्र उन विप्रेन्द्रसे बोले ।। ५ ।। हे मुनिश्रेष्ठ ! आप भले आये कहिये मैं आपका क्या प्रिय करूं, तब भार्गव कहने लगे, हमें स्वागतसे क्या प्रयोजन है ।। ६ ।।

क्षत्रकालं हि राजेंद्र धनुरेतन्ममास्ति हि।।समारोपय यत्नेन यदि शक्तोसि राघव ।। ७ ।। इत्युक्तस्त्वाह भगवंस्त्वं नाधिक्षेप्तुमर्हसि । नेहि नह्यधमो धर्मः क्षत्रियाणां द्विजातिषु ।। ८ ।।

हे राजेन्द्र ! यह मेरे हाथमें क्षत्रियोंको कालस्वरूप धनुष हैं, यदि समर्थ हों तो आप इसे चढाइये ।। ७ ।। यह सुनकर परशुरामसे रामचन्द्र बोले


१ द्विजातिषु ब्राह्मणेषु विषये बाहुवीर्येण कथनरूपोऽधर्मो धर्मः क्षत्रियाणां नहि नहि, इक्ष्वाकूणां तु विशेषेण नहीत्वन्वयः ।

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