भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 173 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 37

(३०) अद्भुतरामायण [पञ्चम-

स्वशिष्यैस्त्वं महाप्राज्ञ दिग्बलो नाम वै सदा ॥ गणाधिपत्यमापन्नो यत्राहं तत्समास्व वै ॥४७॥ मालतीमालवं* चेति प्राह दामोदरो वचः ॥ मम लोके यथाकामं भार्यया सह मालव ॥ ४८ ॥

तुम अपने शिष्योंसहित दिग्बल नामवाले होकर गणाधिपत्यको प्राप्त हो जहां मैं स्थित हूँ वहां सदा निवास करो ॥ ४७ ॥ और फिर मालतीसहित मालवसे दामोदर कहने लगे, मालव ! तुम अपनी भार्याके सहित मेरे लोकमें ॥ ४८ ॥

दिव्यरूपधरः श्रीमाञ्छृण्वन्गानमिहानुगैः ॥ आस्व नित्यं यथाकामं यावल्लोका भवंति वै ॥ ४९ ॥ पद्माक्षमाह भगवान् धनदो भव मानद ॥ धनानामीश्वरो भूत्वा विहरस्व यथासुखम् ॥ ५० ॥

दिव्यरूप धारण किये अनुचरोंके सहित गान श्रवण करते रहो । जबतक यह लोक है तबतक यथायोग्य निवास करो ॥ ४९ ॥ पद्माक्षसे फिर विष्णु बोले, तुम धनद हो धनपति होकर यथेच्छा विहार करो ॥ ५० ॥

ब्रह्माणं च ततः प्राह कौशिकोडभूद्गणाधिपः । गणाः स्तोष्यंति तं चाशु प्राप्तो मेऽस्ति सलोकताम् ॥ ५१ ॥ एते च विप्रा नियतं मम भक्ता यशस्विनः । श्रोत्रच्छिद्रं यथाहत्य शंकुभिर्वै परस्परम् ॥ ५२ ॥

और फिर ब्रह्माजीसे कहा यह कौशिक गणपति हो दूसरे गण इसको सन्तुष्ट करें और यह मेरी सलोकताको प्राप्त होगा ॥ ५१ ॥ यह यशस्वी ब्राह्मण मेरे भक्त हैं यह परस्पर शंकुओंसे अपने कानोंके छिद्रोंको ताडनकर प्रतिज्ञा करते हुए ॥ ५२ ॥

श्रोण्यामो नैव चान्यद्वै हरेः कीर्त्ति विनेति ये । महाव्रतधरा विप्रा मम भक्तिपरायणाः ॥ ५३ ॥ एते प्राप्ताश्च देवत्वं मम सान्निध्यमेव च । मालवो भार्यया सार्द्धं मत्क्षेत्रं परिगृह्य वै ॥ ५४ ॥

नारायणके सिवाय हम दूसरेकी कीर्ति श्रवण नहीं करेंगे इस कारण ये मेरी भक्तिमें परायण महाव्रतधारी ब्राह्मण ॥ ५३ ॥ यह देवत्वको और हमारी सन्निकटताको प्राप्त हो और मालव भार्याके सहित मेरे क्षेत्रको ग्रहण कर ॥ ५४ ॥


* मालतीसहितं मालवम् ।