भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (३५)

मानसोत्तरशैले तु गानबंधुरिति स्मृतः ॥ तद्गच्छ शीघ्रं शैलेंद्रं गानवांस्त्वं भविष्यसि ॥ ३१ ॥ इत्युक्तो विस्मयाविष्टो नारदो वाग्विदां वरः ॥ मानसोत्तरशैले तु गानबंधुं जगाम वै ॥ ३२ ॥

वह मानसके उत्तर पर्वतपर गानबंधु नामसे विख्यात है उसके पास जानेसे तुम गानविद्यायुक्त हो जाओगे ॥ ३१ ॥ श्रेष्ठ बोलनेवालोंमें श्रेष्ठ नारदजी यह कहने पर मानसके उत्तर और गानबंधुके समीपमें गये ॥ ३२ ॥

गंधर्वाः किन्नरा यक्षास्तथा चाप्सरसां गणाः ॥ समासीनास्तु परितो गानबंधुश्च मध्यतः ॥ ३३॥ गानाशिक्षासमापन्नाः शिक्षिता स्तेन पक्षिणा ॥ स्निग्धकंठस्वरास्तत्र समासीना मुदान्विताः ॥ ३४ ॥

गंधर्व किन्नर यक्ष अप्सराओंके समूह उसके चारों ओर थे और गान बंधु मध्यमें स्थित था ॥ ३३ ॥ गान शिक्षासे युक्त उसने अनेक पक्षियोंको भी कर दिया था, स्निग्ध कंठवाले अनेक पक्षी वहां स्थित थे ॥ ३४ ॥

ततो नारदमालोक्य गानबंधुरुवाच ह ॥ प्रणिपत्य यथा न्याय्यं स्वागतेनाभ्यपूजयत् ॥ ३५ ॥ किमर्थं भगवन्नत्र चागतोऽसि महद्युते ॥ किं कार्यं हि महाब्रह्मन्ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ ३६ ॥

तब नारदजीको आता देख गानबंधु कहने लगा और नम्रतासे प्रणाम कर पूजन करता हुआ ॥ ३५ ॥ हे महाकान्तिमान ! आप किस कारणसे यहां आकर प्राप्त हुए हो, हे महाब्रह्मन् ! कहिये, आपका क्या कार्य है उसके करनेमें देर न करूं ॥ ३६ ॥

तच्छ्रुत्वा नारदो धीमान्प्रत्युवाच सपक्षिणम् ॥ उलूकेन्द्र महाप्राज्ञ शृणु सर्वं यथातथम् ॥ ३७ ॥ मम वृत्तं प्रवक्ष्यामि तच्च भूतं महाद्भुतम् ॥ वैकुण्ठनगरेब्रह्मन्नारायणसमीपगम् ॥ ३८ ॥

यह सुन बुद्धिमान् नारद पक्षिराजसे कहने लगे हे महाप्राज्ञ उलूकेन्द्र ! आप सब यथा योग्य श्रवण कीजिये ॥ ३७ ॥ मैं अपना महाद्भुत वृत्तान्त कहता हूं कि, वैकुण्ठनगरमें नारायणके समीपमें ॥ ३८ ॥

मां विनिर्धूय संदृष्टं समाहूय च तुंबुरुम् ॥ लक्ष्मीसमन्वितो विष्णु- रशृणोद्गानमुत्तमम् ॥ ३९॥ ब्रह्मादयो वयं सर्वे निरस्ताः स्थानत- श्च्युताः ॥ कौशिकाद्याः समासीना गानयोगेन वै हरिम् ॥ ४० ॥

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