अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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मेरे प्रसादसे तुझको गानयोगकी प्राप्ति होगी और विष्णुके गानयोग तेरी जिह्वा स्तुतिके योग्य स्पष्ट होजायगी ॥ ८५ ॥ देवता विद्याधर गन्धर्व अप्सराओंका तू गान विद्याका आचार्य होगा और अनेक प्रकारके भक्ष्य भोज्य आकर प्राप्त होंगे ॥ ८६ ॥
ततः कतिपयाहोभिः सर्वं भद्रं भविष्यति ॥ हरिमित्रवचस्तच्च विष्णुदूतोपबृंहितम् ॥ ८७ ॥ सर्वं निरयसंज्ञंमेक्षणादेव व्यनाशयत् ॥ प्रकृत्या विष्णुभक्तानामीदृशो करुणा द्विज ॥ ८८ ॥
फिर कुछ दिनोंमें सम्पूर्ण मंगल हो जायगा, जब हरिमित्रने विष्णु दूतोंके समक्ष यह वचन कहे ॥८७॥ तो क्षणमात्रमें सब नरककी सामग्री नष्ट होगई, हे नारद ! विष्णुभक्तोंकी स्वभावसेही यह प्रकृति होती है ॥ ८८ ॥
कृतापराधलोकानामपि दुखं व्यपोहति ॥ अमृतस्यन्दि वचनमुक्त्वा स प्रययौ हरिम् ॥ ८९ ॥ सर्वं ते कथितं येन गानाचार्योहमृत्तमः ॥ प्राप्स्यामि हरिमेतेन हरिमित्रप्रसादतः ॥ ९० ॥
नारदैतदनुवर्णितं मयापूर्वजन्मचरितं महाद्भुतम् ॥ यः श्रृणोति हरिमेत्य चेतसा स प्रयाति भवनं गदाभृतः ॥ ९१ ॥
इत्यार्षे श्रीम. वाल्मी. आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे हरिमित्रोपाख्यानं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
कि, अपराधी जनोंके भी दुःख दूर करते हैं इस प्रकार वह अमृतके भरे वचनोंको कहकर हरिके लोकको गया ॥ ८९ ॥वह सब आपसे कहा जिस कारण मैं गानाचार्यपदको प्राप्त हुआ हूं, हरिमित्रके प्रसादसे मैं नारायणको प्राप्त हूं गा ॥ ९० ॥ हे नारद ! यह आपसे पूर्वजन्मका महा अद्भुत चरित्र वर्णन किया, जो चित्त लगाकर इसे सुनते हैं वह नारायणके लोकको प्राप्त होते हैं ॥ ९१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये भाषाटीकायां अद्भुतोत्तर काण्डे हरिमित्रोपाख्यानं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥