भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१०४अध्यात्मरामायण[ सर्ग १

तारयिष्यामहे युष्मान्वयमेव क्षणादिह ।
ततो नावि समारोप्य सीतां राघवलक्ष्मणौ ॥ ८॥
क्षणात्सन्तारयामासुर्नदीं मुनिकुमारकाः ।
रामाभिनन्दिताः सर्वे जग्मुरत्रेर्यथाश्रमम् ॥ ९॥

तावेत्य विपिनं घोरं झिल्लीझङ्कारनादितम् ।
नानामृगगणाकीर्णं सिंहव्याघ्रादिभीषणम् ॥ १०॥
राक्षसैर्घोररूपैश्च सेवितं रोमहर्षणम् ।
प्रविश्य विपिनं घोरं रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ ११॥

इतः परं प्रयत्नेन गन्तव्यं सहितेन मे ।
धनुर्गुणेन संयोज्य शरानपि करे दधत् ॥ १२॥
अग्रे यास्याम्यहं पश्चात्त्वमन्वेहि धनुर्धरः ।
आवयोर्मध्यगा सीता मायेवात्मपरात्मनोः ॥ १३॥
चक्षुश्चारय सर्वत्र दृष्टं रक्षोभयं महत् ।
विद्यते दण्डकारण्ये श्रुतपूर्वमरिन्दम ॥ १४॥

इत्येवं भाषमाणौ तौ जग्मतुः सार्धयोजनम् ।
तत्रैका पुष्करिण्यास्ते कल्हारकुसुमोत्पलैः ॥ १५॥
अम्बुजैः शीतलोदेन शोभमाना व्यदृश्यत ।
तत्समीपमथो गत्वा पीत्वा तत्सलिलं शुभम् ॥ १६॥
ऊषुस्ते सलिलाभ्याशे क्षणं छायामुपाश्रिताः ।
ततो ददृशुरायान्तं महासत्त्वं भयानकम् ॥ १७॥
करालदंष्ट्रवदनं भीषणन्तं स्वगर्जितैः ।
वामांशे न्यस्तशूलाग्रग्रथितानेकमानुषम् ॥ १८॥
भक्षयन्तं गजव्याघ्रमहिषं वनगोचरम् ।
ज्याऽऽरोपितं धनुर्धृत्वा रामो लक्ष्मणमब्रवीत् १९
पश्य भ्रातर्महाकायो राक्षसोऽयमुपागतः ।
आयात्यभिमुखं नोऽग्रे भीरूणां भयमावहन् ॥ २०॥
सज्जीकृतधनुस्तिष्ठ मा भैर्र्जनकनन्दिनि ।


क्षणमें ही नदीके उस पार पहुँचा देंगे ।” तब मुनि-कुमारोंने सीताके सहित राम और लक्ष्मणको नौकामें चढ़ाकर एक क्षणमात्रमें नदीके उस पार पहुँचा दिया । और फिर रामचन्द्रजी द्वारा प्रशंसित हो अत्रि मुनिके आश्रमको लौट आये ॥ ८-९ ॥

तब वे झिल्लियोंकी झनकारसे गुञ्जायमान, विविध वन्य पशुओंसे पूर्ण और सिंह-व्याघ्र आदि हिंस्र पशुओंसे भयानक एक घोर वनमें पहुँचे ॥ १० ॥ भयंकर रूपधारी राक्षसोंसे सेवित उस रोमाञ्चकारी घोर वनमें घुसकर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा— ॥ ११ ॥ “यहाँसे तुम्हें बहुत सावधान होकर हमारे साथ चलना होगा । मैं धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर और हाथमें बाण लेकर आगे-आगे चलता हूँ और तुम धनुष धारण कर पीछे चलो, तथा जीव और परमात्माके बीचमें रहनेवाली मायाके समान सीता हमारे बीचमें चलें ॥ १२-१३ ॥ हे अरिन्दम ! सब ओर सावधानीसे निगाह रक्खो । हमने पहले जैसा सुना था उसीके अनुसार इस दण्डकारण्यमें राक्षसोंका अत्यन्त भय दिखायी देता है” ॥ १४ ॥

इस प्रकार आपसमें बातचीत करते वे डेढ़ योजन (छः कोश) निकल गये । वहाँ कुमुद, कल्हार और कमलादिसे सुशोभित एक पुष्करिणी (तलाई) थी ॥ १५॥ वह कमलवन और शीतल जलसे अति सुन्दर दीख पड़ती थी । उन्होंने उसके निकट जाकर उसका शीतल जल पान किया ॥ १६ ॥ और कुछ देरकेलिये जलके किनारे वृक्षकी छायामें बैठ गये । उसी समय उन्होंने एक महा बलवान् और भयानक राक्षस आता देखा ॥ १७ ॥ उसका मुख तीक्ष्ण दाढ़ोंसे पूर्ण था, वह अपनी गर्जनासे अत्यन्त भय उत्पन्न करता था और उसके बाँयें कन्धेपर एक त्रिशूल रखा था जिसमें बहुत-से मनुष्य बिंधे हुए थे ॥ १८ ॥ वह बहुत-से जंगली हाथी, सिंह और भैंसोंको खाता हुआ आ रहा था । उसे देखकर श्रीरामचन्द्रजीने प्रत्यञ्चा चढ़ाये हुए अपने धनुषको उठाकर लक्ष्मणजीसे कहा—॥ १९ ॥ “भाई ! देखो, हमारे सामने यह भीरु पुरुषोंको डरानेवाला उग्ररूप महाकाय राक्षस आ रहा है ॥ २० ॥ तुम धनुषपर बाण चढ़ाकर सावधान हो जाओ; जानकि ! तुम डरना मत !” ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी धनुषपर