अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १०६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १ |
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[संस्कृत श्लोक]
ततः सीता समालिङ्ग्य प्रशशंस रघूत्तमम् ॥३४॥
ततो दुन्दुभयो नेदुर्दिवि देवगणैरिताः । ननृतुश्चाप्सरा हृष्टा जगुर्गन्धर्वकिन्नराः ॥३५॥
विराधकायादतिसुन्दराकृति- र्विभ्राजमानो विमलाम्बरावृतः । प्रतप्तचामीकरचारुभूषणो व्यदृश्यताग्रे गगने रवैर्यथा ॥३६॥
प्रणम्य शमं प्रणतार्तिहारिणं भवप्रवाहोपरमं घृणाकरम् । प्रणम्य भूयः प्रणनाम दण्डवत्- प्रपन्नसर्वार्तिहरं प्रसन्नधीः ॥३७॥
विराध उवाच
श्रीराम राजीवदलायताक्ष विद्याधरोऽहं विमलप्रकाशः । दुर्वाससाऽकारणकोपमूर्त्तिना शप्तः पुरा सोऽद्य विमोचितस्त्वया ॥३८॥
इतः परं त्वच्चरणारविन्दयोः स्मृतिः सदा मेऽस्तु भवोपशान्तये । त्वन्नामसङ्कीर्तनमेव वाणी करोतु मे कर्णपुटं त्वदीयम् ॥३९॥
कथामृतं पातु करद्वयं ते पादारविन्दार्चनमेव कुर्यात् । शिरश्च ते पादयुगप्रणामं करोतु नित्यं भवदीयमेवम् ॥४०॥
नमस्तुभ्यं भगवते विशुद्धज्ञानमूर्तये । आत्मारामय रामाय सीतारामाय वेधसे ॥४१॥
प्रपन्नं पाहि मां राम यास्यामि त्वदनुज्ञया । देवलोकं रघुश्रेष्ठ माया मां मावृणोतु ते ॥४२॥
इति विज्ञापितस्तेन प्रसन्नो रघुनन्दनः । ददौ वरं तदा प्रीतो विराघाय महामतिः ॥४३॥
[हिन्दी अनुवाद]
उसे मरा देख श्रीसीताजीने रघुश्रेष्ठ भगवान् रामका आलिंगनकर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥३३-३४॥
उस समय आकाशमें देवगण दुन्दुभी बजाने लगे, अप्सराएँ प्रसन्नतापूर्वक नाचने लगीं और गन्धर्व तथा किन्नरगण गाने लगे ॥ ३५॥
इसी समय विराधके मृत शरीरसे आकाशस्थित सूर्यदेवके समान एक सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित और तपाये हुए सुवर्णालंकारोंसे सुसज्जित अति सुन्दर पुरुष प्रकट हुआ ॥३६॥ उस पुरुषने शरणागत जनोंका दुःख दूर करनेवाले, संसार-सागरसे पार करनेवाले, दयामय श्रीरामचन्द्रजीको प्रसन्नचित्तसे प्रणाम कर उन प्रसन्नचित्त और शरणागतोंके सकल दुःख दूर करनेवाले प्रभुको फिर भी दण्डके समान पृथिवीपर लोटकर बारम्बार प्रणाम किया ॥ ३७ ॥
विराध बोला—हे कमलदललोचन श्रीराम ! मैं विमलतेजोमय विद्याधर हूँ । मुझे पूर्वकालमें बिना कारण ही क्रोध करनेवाले श्रीदुर्वासाजीने शाप दिया था सो आज आपने मुझे शाप-मुक्त कर दिया ॥ ३८ ॥
अब आप ऐसी कृपा करें जिससे भविष्यमें मुझे संसार-बन्धनको दूर करनेवाली आपके चरणारविन्दोंकी स्मृति सर्वदा बनी रहे, मेरी वाणी सर्वदा आपका नामसंकीर्तन करती रहे, कान आपका कथामृत पान करते रहें, हाथ आपके चरणकमलोंका पूजन करते रहें और इसी प्रकार शिर आपके चरणयुगलोंमें प्रणाम करता रहे॥ ३९-४० ॥ हे विशुद्धज्ञानस्वरूप भगवन् ! आपको नमस्कार है । आप आत्मारूपसे सबमें रमण करनेवाले होनेसे राम हैं, (अपनी मायाके सहित विराजमान होनेसे युगलमूर्ति) श्रीसीता-राम हैं और संसारके रचनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ ४१ ॥
हे राम ! मैं आपकी शरण हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये । हे रघुश्रेष्ठ ! आपकी आज्ञासे मैं देवलोकको जा रहा हूँ; आप ऐसी कृपा कीजिये जिससे आपकी माया मुझे आच्छादित न करे ॥ ४२ ॥
विराधके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर महामति श्रीरघुनाथजीने उसे प्रसन्न होकर यह वर दिया-॥ ४३ ॥