अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १०८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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चितिं समारोहयदप्रमेयं<br>रामं ससीतं सहसा प्रणम्य ॥ ६ ॥<br>ध्यायंश्चिरं राममशेषहृत्स्थं<br>दूर्वादलश्यामलमम्बुजाक्षम् ।<br>चीराम्बरं स्निग्धजटाकलापं<br>सीतासहायं सहलक्ष्मणं तम् ॥ ७ ॥<br>को वा दयालुः स्मृतकामधेनु-<br>रन्यो जगत्त्यां रघुनायकादहो ।<br>स्मृतो मया नित्यमनन्यभाजा<br>ज्ञात्वा स्मृतिं मे स्वयमेव यातः ॥ ८ ॥<br>पश्यत्विदानीं देवेशो रामो दाशरथिः प्रभुः ।<br>दग्ध्वा स्वदेहं गच्छामि ब्रह्मलोकमकल्मषः ॥ ९ ॥<br>अयोध्यापतिर्मेऽस्तु हृदये राघवः सदा ।<br>यद्वामाङ्के स्थिता सीता मेघस्येव तडिल्लता ॥ १० ॥ | अप्रमेय भगवान् रामको प्रणामकर सहसा चितापर चढ़ गये ॥ ६ ॥ उस समय वे मन-ही-मन सर्वान्तर्यामी, दूर्वादलके समान श्यामवर्ण, कमलनयन, चीराम्बरधारी, स्निग्ध जटाजूटधारी श्रीरामचन्द्रजीका सीता और लक्ष्मणके सहित बहुत देरतक ध्यान करते रहे ॥ ७ ॥ (फिर मन-ही-मन कहने लगे—) "अहो ! इस संसारमें श्रीरघुनाथजीको छोड़कर स्मरण करनेवालेकी कामनाओं-को इस प्रकार पूर्ण करनेवाला और कौन दयालु है ? मैं अनन्य भावसे उनका नित्य स्मरण करता था । अतः मेरे स्मरणको जानकर वे स्वयं ही चले आये ॥ ८ ॥ दशरथनन्दन भगवान् राम ! मेरी ओर देखते रहिये, मैं अपना शरीर जलाकर अब निष्पाप होकर ब्रह्मलोकको जा रहा हूँ ॥ ९ ॥ मेरे हृदयमें सर्वदा अयोध्यापति श्रीरामचन्द्रजी विराजमान रहें, जिनके वामांकमें मेघमें बिजलीके समान श्रीसीताजी विराजमान हैं" ॥ १० ॥
इति रामं चिरं ध्यात्वा दृष्ट्वा च पुरतः स्थितम् ।<br>प्रज्वाल्य सहसा वह्निं दग्ध्वा पञ्चात्मकं वपुः ॥ ११ ॥<br>दिव्यदेहधरः साक्षाद्ययौ लोकपतेः पदम् । | इस प्रकार रामचन्द्रजीका बहुत देरतक ध्यान करते हुए तथा अपने सम्मुख विराजमान उनके दिव्य स्वरूपको देखते हुए मुनिवर शरभंगने अग्नि प्रज्वलित-कर अपना पाञ्चभौतिक शरीर जला डाला ॥ ११ ॥ नया दिव्य देह धारणकर साक्षात् ब्रह्मलोकको चले गये ।
ततो मुनिगणाः सर्वे दण्डकारण्यवासिनः ।<br>आजग्मू राघवं द्रष्टुं शरभङ्गनिवेशनम् ॥ १२ ॥<br>दृष्ट्वा मुनिसमूहं तं जानकीरामलक्ष्मणाः ।<br>प्रणेमुः सहसा भूमौ मायामानुषरूपिणः ॥ १३ ॥<br>आशीर्भरभिनन्द्याथ रामं सर्वहृदि स्थितम् ।<br>ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे धनुर्बाणधरं हरिम् ॥ १४ ॥<br>भूमेर्भारावताराय जातोऽसि ब्रह्मणाऽर्थितः ।<br>जानीमस्त्वां हरिं लक्ष्मीं जानकीं लक्ष्मणं तथा ॥ १५ ॥<br>शेषांशं शङ्खचक्रे द्वे भरतं सानुजं तथा ।<br>अतश्चादौ ऋषीणां त्वं दुःखं मोक्तुमिहार्हसि ॥ १६ ॥<br>आगच्छ यामो मुनिसेवितानि<br>वनानि सर्वाणि रघूत्तम क्रमात् । | तदनन्तर दण्डकारण्यवासी समस्त मुनिगण श्री-रघुनाथजीका दर्शन करनेके लिये शरभंग मुनिके आश्रमपर आये ॥ १२ ॥ मुनि-समाजको देखकर माया-मानव-रूप श्रीराम, सीता और लक्ष्मणने सहसा पृथिवीपर शिर रखकर उन्हें प्रणाम किया ॥ १३ ॥ उन मुनीश्वरोंने सर्वान्तर्यामी भगवान् रामका आशीर्वाद-द्वारा अभिनन्दन किया और फिर वे धनुर्बाणधारी श्रीहरिसे हाथ जोड़कर बोले— ॥ १४ ॥ "आपने ब्रह्माकी प्रार्थनासे पृथिवीका भार उतारनेके लिये अवतार लिया है । हम यह जानते हैं कि आप साक्षात् श्रीहरि, जानकीजी लक्ष्मी, लक्ष्मणजी शेषनाग और भरत-शत्रुघ्न भगवान्के शंख और चक्र हैं । इसलिये आप यहाँ सबसे पहले ऋषियोंका दुःख दूर करें ॥ १५-१६ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! आइये, सीता और लक्ष्मण-सहित आप हमारे साथ क्रमशः मुनीश्वरोंके समस्त