अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| ११० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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| त्वं सर्वभूतहृदयेषु कृतालयोऽपि<br>त्वन्मन्त्रजाप्यविमुखेषु तनोषि मायाम्<br>त्वन्मन्त्रसाधनपरेष्वपयाति माया<br>सेवानुरूपफलदोऽसि यथा महीपः ॥ २९ ॥ | मान हैं, तथापि जो लोग आपके मन्त्रजापसे विमुख हैं उन्हें आप अपनी मायासे मोहित करते हैं और जो उस मन्त्रके जापमें तत्पर हैं उनकी माया दूर हो जाती है। इस प्रकार राजाके समान आप सबको उनकी सेवाके अनुसार फल देनेवाले हैं ॥ २९ ॥ हे ईश ! वास्तवमें एकमात्र आप ही इस विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके कारण हैं; तथापि मुग्धचित्त पुरुषोंको त्रिगुणमयी मायाके कारण ब्रह्मा, विष्णु और महादेव आदि विविध रूपोंमें भासते हैं; जिस प्रकार जलके पात्रोंमें प्रतिबिम्बित होनेसे सूर्य अनेक होकर भासता है ॥ ३० ॥ हे राम ! आप अज्ञान-से सर्वथा परे हैं। तथापि आपके चरणकमलोंको आज मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। (इससे विदित होता है कि) सबके साक्षी होनेसे आप असत्पुरुषोंको अगोचर होकर भी जिनका चित्त आपके मन्त्रजापसे शुद्ध हो गया है उनपर सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ ३१ ॥ हे राम ! आप रूपरहित हैं, तथापि अपने ही माया-विलाससे धारण किये आपके मनोहर मनुष्य-वेष-धारी स्वरूपको मैं देख रहा हूँ। आपका यह रूप करोड़ों कामदेवोंके समान कान्तिमान् है और कमनीय धनुर्बाण धारण किये है। आपका हृदय दयार्द्र तथा मुख मनोहर मुसकानयुक्त है ॥ ३२ ॥ जो सीताजीसे युक्त हैं, कृष्णमृगचर्म धारण किये हैं, सर्वथा अजेय हैं, जिनके चरणकमल नित्य श्रीसुमित्रानन्दनसे सेवित हैं और जिनकी नीलकमलके समान आभा है उन अनन्तगुणसम्पन्न शान्तमूर्ति सौभाग्यस्वरूप श्रीरामचन्द्रजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ ३३ ॥ हे राम ! जो लोग आपके स्वरूपको देश-काल आदि समस्त उपाधियोंसे रहित और चिद्घन प्रकाशस्वरूप जानते हैं, वे भले ही वैसा ही जानें; किन्तु मेरे हृदयमें तो, आज जो प्रत्यक्षरूपसे मुझे दिखायी दे रहा है, यही रूप भासमान होता रहे। इसके अतिरिक्त मुझे और किसी रूप की इच्छा नहीं है ॥ ३४ ॥ |
| विश्वस्य सृष्टिलयसंस्थितिहेतुरेक-<br>स्त्वं मायया त्रिगुणया विधिरीशविष्णू<br>भासीश मोहितधियां विविधाकृतिस्त्वं<br>यद्वद्रविः सलिलपात्रगतो ह्यनेकः ॥ ३० ॥ | |
| प्रत्यक्षतोऽद्य भवतश्चरणारविन्दं<br>पश्यामि राम तमसः परतः स्थितस्य ।<br>दृक्प्रत्यस्त्वमसतामविगोचरोऽपि<br>त्वन्मन्त्रपूतहृदयेषु सदा प्रसन्नः ॥ ३१ ॥ | |
| पश्यामि राम तव रूपमरूपिणोऽपि<br>मायाविडम्बनकृतं सुमनुष्यवेषम् ।<br>कन्दर्पकोटिसुभगं कमनीयचाप-<br>बाणं दयार्द्रहृदयं स्मितचारुवक्त्रम् ॥ ३२ ॥ | |
| सीतासमेतमजिनाम्बरमप्रधृष्यं<br>सौमित्रिणा नियतसेवितपादपद्मम् ।<br>नीलोत्पलद्युतिमनन्तगुणं प्रशान्तं<br>तद्भागधेयमनिशं प्रणमामि रामम् ॥ ३३ ॥ | |
| जानन्तु राम तव रूपमशेषदेश-<br>कालाद्युपाधिरहितं घनचित्रप्रकाशम् ।<br>प्रत्यक्षतोऽद्य मम गोचरमेतदेव<br>रूपं विभातु हृदये न परं विकाङ्क्षे ॥ ३४ ॥ | |
| इत्येवं स्तुवतस्तस्य रामः सस्मितमब्रवीत् ।<br>मुने जानामि ते चित्तं निर्मलं मदुपासनात् ॥ ३५ ॥<br>अतोऽहमागतो द्रष्टुं मदृते नान्यसाधनम् ।<br>मन्मन्त्रोपासका लोके मामेव शरणं गताः ॥ ३६ ॥ | सुतीक्ष्णके इस प्रकार स्तुति करनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे मुसकाकर कहा—"हे मुने ! मैं यह जानता हूँ कि तुम्हारा चित्त मेरी उपासनासे निर्मल हो गया है ॥ ३५ ॥ और तुम्हारा मेरे अतिरिक्त और कोई साधन नहीं है, इसीलिये मैं तुम्हें देखनेके लिये आया हूँ। संसारमें जो लोग मेरे मन्त्रकी उपासना करते हैं और |