भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ३ ] अरण्यकाण्डे १११


| निरपेक्षा नान्यगतास्तेषां दृश्योऽहमन्वहम् ।<br>स्तोत्रमेतत्पठेद्यस्तु त्वत्कृतं मत्प्रियं सदा ॥३७॥<br>सद्भक्तिर्मे भवेत्तस्य ज्ञानं च विमलं भवेत् ।<br>त्वं ममोपासनादेव विमुक्तोऽसीह सर्वतः ॥३८॥<br>देहान्ते मम सायुज्यं लप्स्यसे नात्र संशयः ।<br>गुरुं ते द्रष्टुमिच्छामि ह्यगस्त्यं मुनिनायकम् ।<br>किञ्चित्कालं तत्र वस्तुं मनो मे त्वरयत्यलम् ॥३९॥<br><br>सुतीक्ष्णोऽपि तथेत्याह श्वो गमिष्यसि राघव ।<br>अहमप्यागमिष्यामि चिराद्दृष्टो महामुनिः ॥४०॥<br>अथ प्रभाते मुनिना समेतो<br>रामः ससीतः सह लक्ष्मणेन ।<br>अगस्त्यसम्भाषणलोलमानसः<br>शनैरगस्त्यानुजमन्दिरं ययौ ॥४१॥ | मेरी ही शरणमें रहते हैं ॥ ३६ ॥ तथा नित्य निरपेक्ष और अनन्यगति रहते हैं, उन्हें मैं नित्यप्रति दर्शन देता हूँ। जो व्यक्ति तुम्हारे किये हुए इस मेरे प्रिय स्तोत्रका पाठ करता है ॥ ३७॥ उसे मेरी शुद्ध भक्ति और निर्मल ज्ञान प्राप्त होता है, तुम केवल मेरी उपासनासे इस जीवितावस्थामें ही सब प्रकार मुक्त हो गये हो ॥ ३८ ॥ शरीर छूटनेपर तुम निस्सन्देह मेरा सायुज्यपद प्राप्त करोगे। अब मैं तुम्हारे गुरु मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजीसे मिलना चाहता हूँ; मेरा चित्त उनके पास कुछ दिन रहनेके लिये उतावला हो रहा है” ॥ ३९ ॥<br><br>सुतीक्ष्णने कहा, “बहुत अच्छा, वहाँ कल चलिये । मैने भी मुनीश्वरको बहुत दिन हुए तब देखा था । अतः हे राघव ! मैं भी आपके साथ ही वहाँ चलूँगा” ॥ ४० ॥ प्रातःकाल होनेपर सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजी सुतीक्ष्ण मुनिको लेकर अगस्त्यजीसे वार्तालाप करनेके लिये उत्कण्ठित हो शनैः-शनैः उनके छोटे भाई ( अग्निजिह्व मुनि ) के आश्रमकी ओर चले ॥ ४१ ॥ |


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥


तृतीय सर्ग

मुनिवर अगस्त्यजीसे भेंट ।

| श्रीमहादेव उवाच<br>अथ रामः सुतीक्ष्णेन जानक्या लक्ष्मणेन च ।<br>अगस्त्यस्यानुजस्थानं मध्याह्ने समपद्यत ॥ १ ॥<br>तेन सम्पूजितः सम्यग्भुक्त्वा मूलफलादिकम् ।<br>परेद्युः प्रातरुत्थाय जग्मुस्तेऽगस्त्यमण्डलम् ॥ २ ॥<br>सर्वर्तुफलपुष्पाढ्यं नानामृगगणैर्युतम् ।<br>पक्षिसङ्घैश्च विविधैर्नादितं नन्दनोपमम् ॥ ३ ॥ | श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! उस दिन मध्याह्नके समय श्रीरामचन्द्रजी सुतीक्ष्ण, सीता और लक्ष्मणके साथ अगस्त्य मुनिके छोटे भाई अग्निजिह्व मुनिके आश्रममें पहुँचे ॥ १ ॥ उन्होंने उनकी भली प्रकार पूजा की फिर उनके दिये हुए कन्द-मूल-फल आदि खाकर, दूसरे दिन प्रातःकाल उठते ही अगस्त्य मुनिके आश्रमको चले ॥ २ ॥<br><br>वह आश्रम समस्त ऋतुओंके फल और पुष्पोंसे परिपूर्ण, विविध वन्य पशुओंसे सेवित तथा नाना प्रकारके पक्षियोंसे गुञ्जायमान नन्दनवनके समान सुशोभित |