भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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११२अध्यात्मरामायणे[ सर्ग ३

ब्रह्मर्षिभिर्देवर्षिभिः सेवितं मुनिमन्दिरैः ।
सर्वतोऽलङ्कृतं साक्षाद्ब्रह्मलोकमिवापरम् ॥ ४ ॥
बहिरेवाश्रमस्याथ स्थित्वा रामोऽब्रवीन्मुनिम् ।
सुतीक्ष्ण गच्छ त्वं शीघ्रमागतं मां निवेदय ॥ ५ ॥
अगस्त्यमुनिवर्याय सीतया लक्ष्मणेन च ।
महाप्रसाद इत्युक्त्वा सुतीक्ष्णः प्रययौ गुरोः ॥ ६ ॥
आश्रमं त्वरया तत्र ऋषिसङ्घैस्समावृतम् ।
उपविष्टं रामभक्तैर्विशेषेण समायुतम् ॥ ७ ॥
व्याख्यातारममन्त्रार्थं शिष्येभ्यश्चातिभक्तितः ।
दृष्ट्वावागस्त्यं मुनिश्रेष्ठं सुतीक्ष्णः प्रययौ मुनेः ॥८॥
दण्डवत्प्रणिपत्याह विनयावनतः सुधीः ।
रामो दाशरथिर्ब्रह्मन् सीतया लक्ष्मणेन च ।
आगतो दर्शनार्थं ते बहिस्तिष्ठति साञ्जलिः ॥ ९ ॥

अगस्त्य उवाच

शीघ्रमानय भद्रं ते रामं मम हृदि स्थितम् ।
तमेव ध्यायमानोऽहं काङ्क्षमाणोऽत्र संस्थितः ॥१०॥
इत्युक्त्वा स्वयमुत्थाय मुनिभिः सहितो द्रुतम् ।
अभ्यगात्परया भक्त्या गत्वा राममथाब्रवीत् ॥११॥
आगच्छ राम भद्रं ते दिष्ट्या तेऽद्य समागमः ।
प्रियातिथिर्मम प्राप्तोऽस्यद्य मे सफलं दिनम् ॥१२॥
रामोऽपि मुनिमायान्तं दृष्ट्वा हर्षसमाकुलः ।
सीतया लक्ष्मणेनापि दण्डवत्पतितो भुवि ॥१३॥
द्रुतमुत्थाप्य मुनिराड्रागमालिङ्ग्य भक्तितः ।
तद्गात्रस्पर्शजाह्लादस्रवन्नेत्रजलाकुलः ॥१४॥
गृहीत्वा करमेकेन करेण रघुनन्दनम् ।
जगाम स्वाश्रमं हृष्टो मनसा मुनिपुङ्गवः ॥१५॥
सुखोपविष्टं सम्पूज्य पूजया बहुविस्तरम् ।
भोजयित्वा यथान्यायं भोज्यैर्वन्यैरनेकधा ॥१६॥


हिन्दी अनुवाद

था ॥ ३ ॥ वह ब्रह्मर्षियों और देवर्षियोंसे सेवित था । तथा उसके चारों ओर उन ऋषियोंके आश्रम सुशोभित थे । इस प्रकार वह साक्षात् दूसरे ब्रह्मलोकके समान जान पड़ता था ॥ ४ ॥ आश्रमके बाहर रहकर श्रीरामचन्द्रजीने सुतीक्ष्ण मुनिसे कहा—"हे सुतीक्ष्ण ! तुम शीघ्र ही मुनिवर अगस्त्यजीके पास जाकर उन्हें सीता और लक्ष्मणके सहित मेरे आनेकी सूचना दो।" तब सुतीक्ष्ण 'बड़ी प्रसन्नताकी बात है' ऐसा कह शीघ्रतासे गुरुजीके आश्रममें गये । वहाँ जाकर सुतीक्ष्णने देखा कि मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य मुनिमण्डलीसे—विशेषतया रामभक्तोंसे घिरे हुए बैठे हैं और अत्यन्त भक्तिपूर्वक अपने शिष्योंको राममन्त्रकी व्याख्या सुना रहे हैं । यह देखकर सुतीक्ष्ण उनके पास गये ॥ ५-८ ॥ उन्हें विनयपूर्वक दण्डवत्-प्रणामकर सुबुद्धि सुतीक्ष्णने कहा—"ब्रह्मन् ! दशरथकुमार श्रीराम सीता और लक्ष्मणके साथ आपके दर्शनोंके लिये आये हैं और अञ्जलि बाँधे आश्रमके बाहर खड़े हैं" ॥ ९ ॥

अगस्त्यजी बोले— वत्स ! तुम्हारा कल्याण हो ! तुम शीघ्र ही मेरे हृदयस्थित भगवान् रामको ले आओ । मैं उनके दर्शनोंकी इच्छासे उन्हींका ध्यान करता हुआ यहाँ रहता हूँ ॥ १० ॥ ऐसा कह वे शीघ्र ही मुनियोंके साथ उठकर स्वयं श्रीरामचन्द्रजीके पास आये और उनसे अत्यन्त भक्तिपूर्वक बोले—॥ ११ ॥ "हे राम ! आइये, आपका कल्याण हो । आज बड़े भाग्यसे आपका समागम हुआ है । आजका दिन सफल है, आज मुझे मेरे प्रिय अतिथि प्राप्त हुए हैं" ॥ १२ ॥

मुनीश्वरको आते देख श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण और सीताके सहित पृथिवीपर दण्डके समान लेट गये ॥ १३ ॥ तब मुनिराजने तुरन्त ही रामको उठाकर प्रेमपूर्वक हृदयसे लगा लिया और उनके शरीर-स्पर्शसे प्राप्त हुए आनन्दसे उनके नेत्रोंमें जल भर आया ॥ १४ ॥

तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजी एक हाथसे श्रीरघुनाथजीका हाथ पकड़कर उन्हें प्रसन्न-मनसे अपने आश्रममें ले आये ॥ १५ ॥ और उन्हें सुखपूर्वक आसनपर बैठाकर उनकी विधि-विधानसे बड़ी पूजा की तथा समयानुकूल नाना प्रकारके वन्य... ॥ १६ ॥