अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
पृष्ठ 136, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ३ ] अरण्यकाण्ड ११३
सुखोपविष्टमेकान्ते रामं शशिनिभाननम् ।
कृताञ्जलिरुवाचेदमगस्त्यो भगवानृषिः ॥ १७॥
त्वदागमनमेवाहं प्रतीक्षन्समवस्थितः ।
यदा क्षीरसमुद्रान्ते ब्रह्मणा प्रार्थितः पुरा ॥ १८॥
भूमेर्भारापनुत्त्यर्थं रावणस्य वधाय च ।
तदादि दर्शनाकाङ्क्षी तव राम तपश्चरन् ।
वसामि मुनिभिः सार्धं त्वामेव परिचिन्तयन् ॥ १९॥
सृष्टेः प्रागेक एवासीन्निर्विकल्पोऽनुपाधिकः ।
त्वदाश्रया त्वद्विषया माया ते शक्तिरुच्यते ॥ २०॥
त्वामेव निर्गुणं शक्तिरावृणोति यदा तदा ।
अव्याकृतमिति प्राहुर्वेदान्तपरिनिष्ठिताः ॥ २१॥
मूलप्रकृतिरित्येके प्राहुर्मायेति केचन ।
अविद्या संसृतिर्बन्ध इत्यादि बहुधोच्यते ॥ २२॥
त्वया संक्षोभ्यमाणा सा महत्तत्त्वं प्रसूयते ।
महत्तत्त्वादहङ्कारस्त्वया सञ्चोदितादभूत् ॥ २३॥
अहङ्कारो महत्तत्त्वसंवृतस्त्रिविधोऽभवत् ।
सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्चेति भण्यते ॥ २४॥
तामसात्सूक्ष्मतन्मात्राण्यासन् भूतान्यतः परम् ।
स्थूलानि क्रमशो राम क्रमोत्तरगुणानि ह ॥ २५॥
राजसानीन्द्रियाण्येव सात्त्विका देवता मनः ।
तेभ्योऽभवत्सूत्ररूपं लिङ्गं सर्वगतं महत् ॥ २६॥
ततो विराट्समुत्पन्नः स्थूलाद् भूतकदम्बकात् ।
विराजः पुरुषात्सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ २७॥
देवतिर्यङ्मनुष्याश्च कालकर्मक्रमेण तु ।
त्वं रजोगुणतो ब्रह्मा जगतः सर्वकारणम् ॥ २८॥
सत्त्वाद्द्विष्णुस्त्वमेवास्य पालकः सद्भिरुच्यते ।
लये रुद्रस्त्वमेवास्य त्वन्मायागुणभेदतः ॥ २९॥
इस प्रकार एकान्तमें सुखपूर्वक बैठे हुए चन्द्रवदन श्रीरामचन्द्रजीसे भगवान् अगस्त्य मुनिने हाथ जोड़कर कहा—॥ १७ ॥ हे राम ! पूर्वकालमें जिस समय क्षीरसमुद्रके समीप ब्रह्माजीने आपसे भूमिके भार उतारनेके लिये रावणका वध करनेकी प्रार्थना की थी, तभीसे आपके दर्शनोंकी इच्छासे मैं तपस्या करता हुआ और आपहीका चिन्तन करता हुआ आपके आनेकी प्रतीक्षा में यहाँ मुनियोंके साथ रहता हूँ ॥ १८-१९॥ सृष्टि-के आरम्भमें विकल्प और उपाधिसे रहित आप अकेले ही थे, (उस समय और कुछ भी नहीं था)। आपके आश्रय रहनेवाली तथा आपहीको विषय करनेवाली माया आपकी ही शक्ति कही जाती है ॥ २० ॥ जिस समय यह माया-शक्ति आप निर्गुणको ढँक लेती है उस समय वेदान्तनिष्ठ पुरुष इसे 'अव्याकृत' कहते हैं ॥ २१ ॥ कोई इसे 'मूलप्रकृति' कहते हैं और कोई माया; तथा यही अविद्या, संसृति और बन्धन आदि अनेक नामोंसे पुकारी जाती है ॥ २२ ॥ आपके द्वारा क्षुभित होनेपर इस शक्तिसे महत्तत्त्व उत्पन्न होता है और महत्तत्त्वसे आपहीकी प्रेरणासे अहंकार प्रकट हुआ है ॥ २३ ॥ महत्तत्त्वसे ओतप्रोत वह अहंकार तीन प्रकारका हुआ; जो सात्त्विक, राजस और तामस कहलाता है ॥ २४ ॥ हे राम ! तामस अहंकारसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ हुईं और इन सूक्ष्म तन्मात्राओंसे इनके गुणानुसार क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ये पाँच स्थूल भूत हुए ॥ २५ ॥ राजस अहंकारसे दश इन्द्रियाँ और सात्त्विक अहंकारसे इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवता तथा मन उत्पन्न हुए; और इन सबसे मिलकर समष्टि-सूक्ष्म-शरीररूप हिरण्यगर्भ हुआ, जिसका दूसरा नाम सूत्रात्मा भी है ॥ २६॥ फिर स्थूल भूतसमूहसे विराट् उत्पन्न हुआ तथा विराट् पुरुषसे यह सम्पूर्ण स्थावर-जंगम संसार प्रकट हुआ ॥ २७ ॥ हे जगदीश्वर ! कालक्रमसे आप ही देव, तिर्यक् और मनुष्य आदि योनियोंमें प्रकट हुए हैं। अपने मायिक गुणोंके भेदसे आप ही रजोगुणद्वारा जगत्कर्ता ब्रह्माजी, सत्त्वगुणद्वारा जगत्की रक्षा करनेवाले विष्णु और तमोगुणसे उसका लय करनेवाले. भगवान् रुद्र हुए हैं, ऐसा सत्पुरुष कहते हैं ॥ २८-२९॥