अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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[मूल संस्कृत श्लोक]
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्याख्या वृत्तयो बुद्धिजैर्गुणैः ।
तासां विलक्षणो राम त्वं साक्षी चिन्मयोऽव्ययः ॥
सृष्टिलीलां यदा कर्तुमीहसे रघुनन्दन ।
अङ्गीकरोषि मायां त्वं तदा वै गुणवानिव ॥३१॥
राम माया द्विधा भाति विद्याऽविद्येति ते सदा ।
प्रवृत्तिमार्गनिरता अविद्यावशवर्तिनः ।
निवृत्तिमार्गनिरता वेदान्तार्थविचारकाः ॥३२॥
त्वद्भक्तिनिरता ये च ते वै विद्यामयाः स्मृताः ।
अविद्यावशगा ये तु नित्यं संसारिणश्च ते ।
विद्याभ्यासरता ये तु नित्यमुक्तास्त एव हि ॥३३॥
लोके त्वद्भक्तिनिरतास्त्वन्मन्त्रोपासकाश्च ये ।
विद्या प्रादुर्भवेत्तेषां नेतरेषां कदाचन ॥३४॥
अतस्त्वद्भक्तिसम्पन्ना मुक्ता एव न संशयः ।
त्वद्भक्त्यमृतहीनानां मोक्षः स्वप्नेऽपि नो भवेत् ३५
किं राम बहुनोक्तेन सारं किञ्चिद्रवीमि ते ।
साधुसङ्गतिरेवात्र मोक्षहेतुरुदाहृता ॥३६॥
साधवः समचित्ता ये निःस्पृहा विगतैषिणः ।
दान्ताः प्रशान्तास्त्वद्भक्ता निवृत्ताखिलकामनाः ॥
इष्टप्राप्तिविपत्त्योश्च समाः सङ्गविवर्जिताः ।
संन्यस्ताखिलकर्माणः सर्वदा ब्रह्मतत्पराः ॥३८॥
यमादिगुणसम्पन्नाः सन्तुष्टा येनकेनचित् ।
सत्सङ्गमो भवेद्यर्हि त्वत्कथाश्रवणे रतिः ॥३९॥
समुदेति ततो भक्तिस्त्वयि राम सनातने ।
त्वद्भक्तावुपपन्नायां विज्ञानं विपुलं स्फुटम् ॥४०॥
उदेति मुक्तिमार्गोऽयमाद्यश्चतुरसेवितः ।
तस्माद्राघव सद्भक्तिस्त्वयि मे प्रेमलक्षणा ॥४१॥
[हिन्दी अनुवाद]
हे राम ! बुद्धिके सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणोंसे ही प्राणीकी क्रमशः जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति ये तीन अवस्थाएँ होती हैं, पर आप इन तीनोंसे सर्वथा पृथक्, इनके साक्षी, चिन्स्वरूप और अविनाशी हैं ॥ ३० ॥ हे रघुनन्दन ! जिस समय आप संसार-रूपी लीलाका विस्तार करना चाहते हैं उस समय मायाको अंगीकार कर गुणवान्-से हो जाते हैं ॥ ३१ ॥ हे राम ! आपकी यह माया सदा विद्या और अविद्या दो रूपसे भासती है । जो लोग प्रवृत्ति-मार्गमें लगे रहते हैं वे अविद्याके वशीभूत हैं और जो वेदान्तार्थका विचार करनेवाले, निवृत्ति-परायण और आपकी भक्तिमें निरत हैं वे विद्वान् समझे जाते हैं । इनमेंसे जो अविद्याके वशीभूत हैं वे सदा जन्म-मरणरूप संसारमें फँसे रहते हैं और जो विद्याभ्यासी हैं वे ही नित्यमुक्त हैं ॥ ३२-३३ ॥ संसारमें जो लोग आपकी भक्तिमें तत्पर और आपहीके मन्त्रकी उपासना करनेवाले होते हैं उन्हींके अन्तःकरणमें विद्याका प्रादुर्भाव होता है और किसीको नहीं ॥ ३४ ॥ अतः जो पुरुष आपकी भक्तिसे सम्पन्न हैं वे निस्सन्देह मुक्त ही हैं, आपकी भक्तिरूप अमृतके बिना स्वप्नमें भी मोक्ष नहीं हो सकता ॥ ३५ ॥ हे राम ! और अधिक क्या कहूँ ? इस विषयमें जो सार बात है वह तुम्हें बताये देता हूँ—संसारमें साधुसंग ही मोक्षका मुख्य कारण कहा गया है ॥ ३६ ॥ संसारमें जो लोग सम्पद्-विपद्में समान-चित्त, स्पृहारहित, पुत्र-वित्तादिकी ईषणाओंसे रहित, इन्द्रियोंका दमन करने-वाले, शान्तचित्त, आपके भक्त, सम्पूर्ण कामनाओंसे शून्य, इष्ट तथा अनिष्टकी प्राप्तिमें समान रहनेवाले, संगहीन, समस्त कर्मोंका त्याग करनेवाले, सर्वदा ब्रह्म-परायण रहनेवाले, यम आदि गुणोंसे सम्पन्न तथा जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहनेवाले होते हैं वे ही साधु कहलाते हैं । जिस समय ऐसे साधु पुरुषोंका संग होता है तो आपके कथा-श्रवणमें प्रेम हो जाता है ॥ ३७-३९ ॥ हे राम ! तदनन्तर आप सनातन पुरुषमें भक्ति हो जाती है, तथा आपकी भक्ति हो जानेपर आपका स्फुट तथा प्रचुर ज्ञान प्राप्त होता है । यही चतुर-जनसेवित मुक्तिका आद्य मार्ग है । अतः हे राघव ! आपमें मेरी सर्वदा प्रेमलक्षणा भक्ति बनी रहे और हे हरे !