भारतकोश
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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ
११४अध्यात्मरामायण[सर्ग ३

[मूल संस्कृत श्लोक]

जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्याख्या वृत्तयो बुद्धिजैर्गुणैः ।
तासां विलक्षणो राम त्वं साक्षी चिन्मयोऽव्ययः ॥

सृष्टिलीलां यदा कर्तुमीहसे रघुनन्दन ।
अङ्गीकरोषि मायां त्वं तदा वै गुणवानिव ॥३१॥

राम माया द्विधा भाति विद्याऽविद्येति ते सदा ।
प्रवृत्तिमार्गनिरता अविद्यावशवर्तिनः ।
निवृत्तिमार्गनिरता वेदान्तार्थविचारकाः ॥३२॥

त्वद्भक्तिनिरता ये च ते वै विद्यामयाः स्मृताः ।
अविद्यावशगा ये तु नित्यं संसारिणश्च ते ।
विद्याभ्यासरता ये तु नित्यमुक्तास्त एव हि ॥३३॥

लोके त्वद्भक्तिनिरतास्त्वन्मन्त्रोपासकाश्च ये ।
विद्या प्रादुर्भवेत्तेषां नेतरेषां कदाचन ॥३४॥

अतस्त्वद्भक्तिसम्पन्ना मुक्ता एव न संशयः ।
त्वद्भक्त्यमृतहीनानां मोक्षः स्वप्नेऽपि नो भवेत् ३५

किं राम बहुनोक्तेन सारं किञ्चिद्रवीमि ते ।
साधुसङ्गतिरेवात्र मोक्षहेतुरुदाहृता ॥३६॥

साधवः समचित्ता ये निःस्पृहा विगतैषिणः ।
दान्ताः प्रशान्तास्त्वद्भक्ता निवृत्ताखिलकामनाः ॥

इष्टप्राप्तिविपत्त्योश्च समाः सङ्गविवर्जिताः ।
संन्यस्ताखिलकर्माणः सर्वदा ब्रह्मतत्पराः ॥३८॥

यमादिगुणसम्पन्नाः सन्तुष्टा येनकेनचित् ।
सत्सङ्गमो भवेद्यर्हि त्वत्कथाश्रवणे रतिः ॥३९॥

समुदेति ततो भक्तिस्त्वयि राम सनातने ।
त्वद्भक्तावुपपन्नायां विज्ञानं विपुलं स्फुटम् ॥४०॥

उदेति मुक्तिमार्गोऽयमाद्यश्चतुरसेवितः ।
तस्माद्राघव सद्भक्तिस्त्वयि मे प्रेमलक्षणा ॥४१॥


[हिन्दी अनुवाद]

हे राम ! बुद्धिके सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणोंसे ही प्राणीकी क्रमशः जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति ये तीन अवस्थाएँ होती हैं, पर आप इन तीनोंसे सर्वथा पृथक्, इनके साक्षी, चिन्स्वरूप और अविनाशी हैं ॥ ३० ॥ हे रघुनन्दन ! जिस समय आप संसार-रूपी लीलाका विस्तार करना चाहते हैं उस समय मायाको अंगीकार कर गुणवान्-से हो जाते हैं ॥ ३१ ॥ हे राम ! आपकी यह माया सदा विद्या और अविद्या दो रूपसे भासती है । जो लोग प्रवृत्ति-मार्गमें लगे रहते हैं वे अविद्याके वशीभूत हैं और जो वेदान्तार्थका विचार करनेवाले, निवृत्ति-परायण और आपकी भक्तिमें निरत हैं वे विद्वान् समझे जाते हैं । इनमेंसे जो अविद्याके वशीभूत हैं वे सदा जन्म-मरणरूप संसारमें फँसे रहते हैं और जो विद्याभ्यासी हैं वे ही नित्यमुक्त हैं ॥ ३२-३३ ॥ संसारमें जो लोग आपकी भक्तिमें तत्पर और आपहीके मन्त्रकी उपासना करनेवाले होते हैं उन्हींके अन्तःकरणमें विद्याका प्रादुर्भाव होता है और किसीको नहीं ॥ ३४ ॥ अतः जो पुरुष आपकी भक्तिसे सम्पन्न हैं वे निस्सन्देह मुक्त ही हैं, आपकी भक्तिरूप अमृतके बिना स्वप्नमें भी मोक्ष नहीं हो सकता ॥ ३५ ॥ हे राम ! और अधिक क्या कहूँ ? इस विषयमें जो सार बात है वह तुम्हें बताये देता हूँ—संसारमें साधुसंग ही मोक्षका मुख्य कारण कहा गया है ॥ ३६ ॥ संसारमें जो लोग सम्पद्-विपद्में समान-चित्त, स्पृहारहित, पुत्र-वित्तादिकी ईषणाओंसे रहित, इन्द्रियोंका दमन करने-वाले, शान्तचित्त, आपके भक्त, सम्पूर्ण कामनाओंसे शून्य, इष्ट तथा अनिष्टकी प्राप्तिमें समान रहनेवाले, संगहीन, समस्त कर्मोंका त्याग करनेवाले, सर्वदा ब्रह्म-परायण रहनेवाले, यम आदि गुणोंसे सम्पन्न तथा जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहनेवाले होते हैं वे ही साधु कहलाते हैं । जिस समय ऐसे साधु पुरुषोंका संग होता है तो आपके कथा-श्रवणमें प्रेम हो जाता है ॥ ३७-३९ ॥ हे राम ! तदनन्तर आप सनातन पुरुषमें भक्ति हो जाती है, तथा आपकी भक्ति हो जानेपर आपका स्फुट तथा प्रचुर ज्ञान प्राप्त होता है । यही चतुर-जनसेवित मुक्तिका आद्य मार्ग है । अतः हे राघव ! आपमें मेरी सर्वदा प्रेमलक्षणा भक्ति बनी रहे और हे हरे !

सर्ग ३ ] अरण्यकाण्ड ११५


सदा भूयाद्धरे सङ्गस्त्वद्भक्तेषु विशेषतः ।
अद्य मे सफलं जन्म भवत्सन्दर्शनादभूत् ॥४२॥
अद्य मे क्रतवः सर्वे बभूवुः सफलाः प्रभो ।
दीर्घकालं मया तप्तमनन्यमतिना तपः ।
तस्यैह तपसो राम फलं तव यदर्चनम् ॥४३॥
सदा मे सीतया सार्धं हृदये वस राघव ।
गच्छतस्तिष्ठतो वापि स्मृतिः स्यान्मे सदा त्वयि ॥

मुझे अधिकतर आपके भक्तोंका संग प्राप्त हो । हे नाथ ! आज आपके दर्शनोंसे मेरा जन्म सफल हो गया ॥ ४०–४२ ॥ हे प्रभो ! आज मेरे सम्पूर्ण यज्ञ सफल हो गये । मैंने बहुत समयसे अनन्य भावसे तपस्या की है । हे राम ! आज जो मैंने आपकी प्रत्यक्ष पूजा की यह उस तपस्याका ही फल है ॥ ४३ ॥ हे राघव ! सीताके सहित आप सर्वदा मेरे हृदयमें निवास करें; मुझे चलते-फिरते सदा आपका स्मरण बना रहे ॥४४॥


इति स्तुत्वा रमानाथमगस्त्यो मुनिसत्तमः ।
ददौ चापं महेन्द्रेण रामार्थे स्थापितं पुरा ॥४५॥
अक्षय्यौ बाणतूणीरौ खड्गो रत्नविभूषितः ।
जहि राघव भूभारभूतं राक्षसमण्डलम् ॥४६॥
यदर्थमवतीर्णोऽसि मायया मनुजाकृतिः ।
इतो योजनयुग्मे तु पुण्यकाननमण्डितः ॥४७॥
अस्ति पञ्चवटीनाम्ना आश्रमो गौतमीतटे ।
नेतव्यस्तत्र ते कालः शेषो रघुकुलोद्वह ॥४८॥
तत्रैव बहुकार्याणि देवानां कुरु सत्पते ॥४९॥

लक्ष्मीपति श्रीरघुनाथजीकी इस प्रकार स्तुति कर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजीने उन्हें पूर्वकालमें रामहीके लिये इन्द्रका दिया हुआ धनुष, बाणोंसे भरे हुए कभी खाली न होनेवाले दो तरकश तथा एक रत्नजटित खड्ग दिया और कहा—"हे राघव ! पृथिवीके भाररूप राक्षसोंका संहार करो ॥ ४५-४६ ॥ जिसके लिये आपने माया-मानव-रूपसे अवतार लिया है । यहाँसे दो योजनकी दूरीपर गौतमी नदीके किनारे पवित्र वनसे सुशोभित एक पञ्चवटी नामक आश्रम है । हे रघुनाथजी ! आप अपना शेष काल वहीं व्यतीत करें । हे सत्पते ! वहीं रहकर आप देवताओंके बहुत-से कार्य सिद्ध करें" ॥ ४७–४९ ॥


श्रुत्वा तदागस्त्यसुभाषितं वचः
स्तोत्रं च तत्त्वार्थसमन्वितं विभुः ।
मुनिं समाभाष्य मुदान्वितो ययौ
प्रदर्शितं मार्गमशेषविद्वरिः ॥५०॥

तदनन्तर सर्वज्ञ भगवान् राम अगस्त्यजीका यह मनोहर भाषण और तत्त्वार्थगर्भित स्तोत्र सुन उनसे बातचीत कर प्रसन्नतापूर्वक उनके दिखाये हुए मार्गसे चले ॥ ५० ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥

अरण्यकाण्ड - सर्ग ४: पञ्चवटीमें निवास और लक्ष्मणजीको उपदेश

११६अध्यात्मरामायण[ सर्ग ४

चतुर्थ सर्ग

पञ्चवटीमें निवास और लक्ष्मणजीको उपदेश।

श्रीमहादेव उवाच
मार्गे व्रजन्ददर्शाथ शैलशृङ्गमिव स्थितम् ।<br>वृद्धं जटायुषं रामः किमेतदिति विस्मितः ॥१॥श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! मार्गमें जाते हुए श्रीरामचन्द्रजीने पर्वत-शिखरके समान बैठे हुए वृद्ध जटायुको देखा। उसे देखकर उनको बड़ा आश्चर्य हुआ कि 'यह क्या है ?' ॥ १ ॥ तब वे लक्ष्मणजीसे बोले—"सौमित्रे ! मेरा धनुष लाओ। देखो, सामने यह राक्षस बैठा है; मैं ऋषियोंको भक्षण करनेवाले इस दुष्टको अभी मारे डालता हूँ" ॥ २ ॥
धनुरानय सौमित्रे राक्षसोऽयं पुरः स्थितः ।<br>इत्याह लक्ष्मणं रामो हनिष्याम्यृषिभक्षकम् ॥२॥
तच्छ्रुत्वा रामवचनं गृध्रराड् भयपीडितः ।<br>वधार्होऽहं न ते राम पितुस्तेऽहं प्रियः सखा ॥३॥रामका यह वचन सुन गृध्रराजने भयसे व्यथित होकर कहा—"राम ! मैं तुम्हारेद्वारा मारे जाने योग्य नहीं हूँ । मैं तुम्हारे पिताका प्रिय सखा जटायु नामक गृध्र हूँ । तुम्हारा कल्याण हो, मैं तो तुम्हारा हितकारी हूँ ॥ ३-४ ॥ तुम्हारी ही हित-कामनासे मैं पञ्चवटीमें रहूँगा। किसी समय जब आपके साथ लक्ष्मणजी भी मृगयाके लिये वनमें चले जायँगे तो मैं जनकनन्दिनी सीताजीकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करूँगा।" गृध्रराजके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने स्नेहपूर्वक कहा— ॥५-६॥ "हे गृध्रराज महाराज ! ठीक है, इस पासके वनमें ही रहते हुए आप समीपवर्ती होकर अवश्य हमारा हित-साधन करें" ॥ ७ ॥
जटायुर्नाम भद्रं ते गृध्रोऽहं प्रियकृत्तव ॥४॥
पञ्चवट्यामहं वत्स्ये तवैव प्रियकाम्यया ।<br>मृगयायां कदाचित्तु प्रयाते लक्ष्मणेऽपि च ॥५॥
सीता जनककन्या मे रक्षितव्या प्रयत्नतः ।<br>श्रुत्वा तद्गृध्रवचनं रामः सस्नेहमब्रवीत् ॥६॥
साधु गृध्र महाराज तथैव कुरु मे प्रियम् ।<br>अत्रैव मे समीपस्थो नातिदूरे वने वसन् ॥७॥
इत्यामन्त्रितमालिङ्ग्य ययौ पञ्चवटीं प्रभुः ।<br>लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया रघुनन्दनः ॥८॥इस प्रकार अपनी सम्मति दे भगवान् राम जटायुको आलिङ्गनकर भाई लक्ष्मण और सीताके सहित पञ्चवटीको गये ॥ ८ ॥ गौतमीके तटपर पहुँचकर उन्होंने बुद्धिमान् लक्ष्मणजीसे पञ्चवटीमें एक विशाल कुटी बनवायी ॥ ९ ॥ वहाँ वे सब गङ्गाके उत्तर तटपर कदम्ब, पनस और आम्र आदि फलवाले वृक्षोंसे युक्त एक रोग-रहित जन्य-शून्य एकान्त स्थानमें बस गये। श्रीरामचन्द्रजी बुद्धिमान् लक्ष्मणके सहित जनकात्मजा सीताका मनोरंजन करते हुए उस देवलोकके समान सुरम्य स्थानमें दूसरे इन्द्रके समान सुखपूर्वक रहने लगे। राम-सेवामें जिनका चित्त लगा हुआ है वे लक्ष्मणजी नित्यप्रति उन्हें कन्द-मूल-फल लाकर देते और रात्रिके समय धनुष-बाण लेकर चारों ओर घूमकर रक्षा करते हुए जागा करते ॥१०-१३॥ वे
गत्वा ते गौतमीतीरं पञ्चवट्यां सुविस्तरम् ।<br>मन्दिरं कारयामास लक्ष्मणेन सुबुद्धिना ॥९॥
तत्र ते न्यवसन्सर्वे गङ्गाया उत्तरे तटे ।<br>कदम्बपनसाम्रादिफलवृक्षसमाकुले ॥१०॥
विविक्ते जनसम्बाधवर्जिते नीरुजस्थले ।<br>विनोदयन् जनकजां लक्ष्मणेन विपश्चिता ॥११॥
अध्युवास सुखं रामो देवलोक इवापरः ।<br>कन्दमूलफलादीनि लक्ष्मणेाऽनुदिनं तयोः ॥१२॥
आनीय प्रददौ रामसेवातातपरमानसः ।<br>धनुर्बाणधरो नित्यं रात्रौ जागर्ति सर्वतः ॥१३॥

सर्ग ४ ] अरण्यकाण्डे ११७


स्नानं कुर्वन्त्यनुदिनं त्रयस्ते गौतमीजले ।<br>उभयोर्मध्यगा सीता कुरुते च गमागमौ ॥ १४ ॥तीनों ही नित्यप्रति गौतमीमें स्नान किया करते थे । उस समय सीताजी उन दोनोंके बीचमें रहकर आया-जाया करती थीं ॥ १४ ॥
आनीय सलिलं नित्यं लक्ष्मणः प्रीतमानसः ।<br>सेवृतेऽहरहः प्रीत्या एवमासन् सुखं त्रयः ॥ १५ ॥लक्ष्मणजी प्रसन्नचित्तसे नित्यप्रति जल लाकर भक्तिपूर्वक उनकी सेवा किया करते थे। इस प्रकार वे तीनों वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥ १५॥
एकदा लक्ष्मणो राममेकान्ते समुपास्थितम् ।<br>विनयावनतो भूत्वा पप्रच्छ परमेश्वरम् ॥ १६ ॥एक दिन लक्ष्मणजीने एकान्तमें बैठे हुए परमात्मा श्रीरामके पास जाकर नम्रतापूर्वक पूछा-॥ १६ ॥
भगवन् श्रोतुमिच्छामि मोक्षस्यैकान्तिकीं गतिम् ।<br>त्वत्तः कमलपत्राक्ष सङ्क्षेपाद्वक्तुमर्हसि ॥ १७ ॥"भगवन् ! मैं आपके मुखारविन्दसे मोक्षका अन्यभिचारी निश्चित साधन सुनना चाहता हूँ; अतः हे कमलनयन ! आप उसका संक्षेपसे वर्णन कीजिये ॥ १७ ॥
ज्ञानं विज्ञानसहितं भक्तिवैराग्यवृंहितम् ।<br>आचक्ष्व मे रघुश्रेष्ठ वक्ता नान्योऽस्ति भूतले ॥ १८ ॥हे रघुश्रेष्ठ ! आप मुझे भक्ति और वैराग्यसे सना हुआ विज्ञानयुक्त ज्ञान सुनाइये; संसारमें आपके अतिरिक्त इस विषयका सुनानेवाला और कोई नहीं है ॥" ॥ १८॥
श्रीराम उवाचश्रीरामजी बोले—
शृणु वक्ष्यामि ते वत्स गुह्याद्गुह्यतरं परम् ।<br>यद्विज्ञाय नरो जहात्सद्यो वैकल्पिकं भ्रमम् ॥ १९ ॥वत्स ! सुन, मैं तुझे गुह्यसे भी गुह्य परम रहस्य सुनाता हूँ जिसके जान लेनेपर मनुष्य तुरन्त ही विकल्पजनित ( संसाररूप ) भ्रमसे मुक्त हो जाता है ॥ १९ ॥
आदौ मायास्वरूपं ते वक्ष्यामि तदनन्तरम् ।<br>ज्ञानस्य साधनं पश्चाज्ज्ञानं विज्ञानसंयुतम् ॥ २० ॥प्रथम मैं तुमसे मायाका स्वरूप कहूँगा, तत्पश्चात् ज्ञानका साधन बताऊँगा और फिर विज्ञानके सहित ज्ञानका वर्णन करूँगा ॥ २० ॥
ज्ञेयं च परमात्मानं यज्ज्ञात्वा मुच्यते भयात् ।<br>अनात्मनि शरीरादावात्मबुद्धिस्तु या भवेत् ॥ २१ ॥इनके अतिरिक्त ज्ञेय परमात्माका भी स्वरूप बतलाऊँगा जिसके जान लेनेपर मनुष्य संसार-भयसे मुक्त हो जाता है । शरीरादि अनात्मपदार्थोंमें जो आत्मबुद्धि होती है उसीको माया कहते हैं ।
सैव माया तयैवासौ संसारः परिकल्प्यते ।<br>रूपे द्वे निश्चिते पूर्वं मायायाः कुलन्दन ॥ २२ ॥उसीके द्वारा इस संसारकी कल्पना हुई है । हे कुलन्दन ! मायाके पहले-पहल दो रूप माने गये हैं ॥ २१-२२ ॥
विक्षेपावरणे तत्र प्रथमं कल्पयेज्जगत् ।<br>लिङ्गाद्यद्ब्रह्मपर्यन्तं स्थूलसूक्ष्मविभेदतः ॥ २३ ॥एक विक्षेप, दूसरा आवरण। इनमेंसे पहली विक्षेप-शक्ति ही महत्तत्त्वसे लेकर ब्रह्मातक समस्त संसारकी स्थूल और सूक्ष्म भेदसे कल्पना करती है ॥ २३ ॥
अपरं त्वखिलं ज्ञानरूपमावृत्य तिष्ठति ।<br>मायया कल्पितं विश्वं परमात्मनि केवले ॥ २४ ॥और दूसरी आवरण-शक्ति सम्पूर्ण ज्ञानको आवरण करके स्थित रहती है । यह सम्पूर्ण विश्व रज्जुमें सर्प-भ्रमके समान शुद्ध परमात्मामें मायासे कल्पित है; विचार करनेपर यह कुछ भी नहीं ठहरता ।
रज्जौ भुजङ्गवद् भ्रान्त्या विचारे नास्ति किञ्चन ।<br>श्रूयते दृश्यते यद्यत्स्मर्यते वा नरैः सदा ॥ २५ ॥मनुष्य जो कुछ सर्वदा सुनते, देखते और स्मरण करते हैं, वह सब स्वप्न और मनोरथोंके समान असत्य हैं।
असदेव हि तत्सर्वं यथा स्वप्नमनोरथौ ।<br>देह एव हि संसारवृक्षमूलं दृढं स्मृतम् ॥ २६ ॥शरीर ही इस संसाररूप वृक्षकी दृढ़ मूल है ॥ २४-२६ ॥ उसीके कारण पुत्र-
११८अध्यात्मरामायणं[ सर्ग ४

तन्मूलः पुत्रदारादिबन्धः किं तेऽन्यथात्मनः॥२७॥
देहस्तु स्थूलभूतानां पञ्च तन्मात्रपञ्चकम् ।
अहंकारश्च बुद्धिश्च इन्द्रियाणि तथा दश ॥२८॥
चिदाभासो मनश्चैव मूलप्रकृतिरेव च ।
एतत्क्षेत्रमिति ज्ञेयं देह इत्यभिधीयते ॥२९॥
एतैर्विलक्षणो जीवः परमात्मा निरामयः ।
तस्य जीवस्य विज्ञाने साधनान्यपि मे शृणु ॥३०॥
जीवश्च परमात्मा च पर्यायो नात्र भेदधीः ।
मानाभावस्तथा दम्भहिंसादिपरिवर्जनम् ॥३१॥
पराक्षेपादिसहनं सर्वत्रावक्रता तथा ।
मनोवाक्कायसद्भक्त्या सद्गुरोः परिसेवनम् ॥३२॥
बाह्याभ्यन्तरसंशुद्धिः स्थिरता सत्क्रियादिषु ।
मनोवाक्कायदण्डश्च विषयेषु निरीहता ॥३३॥
निरहङ्कारता जन्मजराद्यालोचनं तथा ।
असक्तिः स्नेहशून्यत्वं पुत्रदारधनादिषु ॥३४॥
इष्टानिष्टागमे नित्यं चित्तस्य समता तथा ।
मयि सर्वात्मके रामे ह्यनन्यविषया मतिः ॥३५॥
जनसम्बाधरहितशुद्धदेशनिषेवणम् ।
प्राकृतैर्जनसङ्गैश्च ह्यरतिः सर्वदा भवेत् ॥३६॥
आत्मज्ञाने सदोद्योगो वेदान्तार्थालोकनम् ।
उक्तैरेतैर्भवेज्ज्ञानं विपरीतैर्विपर्ययः ॥३७॥
बुद्धिप्राणमनोदेहाहंकृतिभ्यो विलक्षणः ।
चिदात्माऽहं नित्यशुद्धो बुद्ध एवेति निश्चयम्॥३८॥
येन ज्ञानेन संवित्ते तज्ज्ञानं निश्चितं च मे ।
विज्ञानं च तदैवैतत्साक्षादनुभवेद्यदा ॥३९॥
आत्मा सर्वत्र पूर्णः स्याच्चिदानन्दात्मकोऽव्ययः ।
बुद्ध्याद्युपाधिरहितः परिणामादिवर्जितः ॥४०॥

कलत्रादिका बन्धन है, नहीं तो आत्माका इनसे क्या सम्बन्ध है ॥ २७ ॥ पाँच स्थूल भूत, पञ्च तन्मात्राएँ, अहंकार, बुद्धि, दश-इन्द्रियाँ, चिदाभास, मन और मूल-प्रकृति इन सबके समूहको क्षेत्र समझना चाहिये; इसीको शरीर भी कहते हैं ॥ २८-२९ ॥ निरामय परमात्मा-रूप जीव इन सबसे पृथक् है । अब मैं उस जीवको जाननेके कुछ साधन भी बताता हूँ ( सावधान होकर ) सुनो ॥ ३० ॥

जीव और परमात्मा यह पर्याय शब्द हैं—दोनोंका अभिप्राय एक ही है; अतः इसमें भेद-बुद्धि नहीं करनी चाहिये । अभिमानसे दूर रहना, दम्भ और हिंसा आदिका त्याग करना ॥ ३१ ॥ दूसरोंके किये हुए आक्षेपादिको सहन करना, सर्वत्र सरल भाव रखना, मन, वचन और शरीरके द्वारा सच्ची भक्तिसे सद्गुरुकी सेवा करना ॥ ३२ ॥ बाह्य और आन्तरिक शुद्धि रखना, सत्कर्मोंमें तत्पर रहना, मन, वाणी और शरीरका संयम करना, विषयोंमें प्रवृत्त न होना ॥ ३३ ॥ अहंकारशून्य रहना, जन्म, मृत्यु, रोग और बुढ़ापे आदिके कष्टोंका विचार करना, पुत्र, स्त्री और धन आदिमें राग तथा स्नेह न करना ॥ ३४ ॥ इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिमें चित्तको सदा समान रखना, मुझ सर्वात्मा राममें अनन्य बुद्धि रखना ॥ ३५॥ जनसमूहसे शून्य पवित्र देशमें रहना, संसारी लोगोंसे सर्वदा उदासीन रहना ॥ ३६ ॥ आत्मज्ञानका सदा उद्योग करना तथा वेदान्तके अर्थका विचार करना—इन उक्त साधनोंसे तो ज्ञान प्राप्त होता है और इनके विपरीत आचरण करनेसे विपरीत फल ( अज्ञान ) मिलता है ॥ ३७ ॥

जिस शुद्ध ज्ञानसे ऐसा बोध होता है कि मैं बुद्धि, प्राण, मन, देह और अहंकार आदिसें विलक्षण नित्य शुद्ध बुद्ध चेतन आत्मा हूँ वही मेरे मतसे निश्चित ज्ञान है । जिस समय इसका साक्षात् अनुभव होता है उस समय इसीको विज्ञान कहते हैं ॥ ३८-३९ ॥ आत्मा सर्वत्र पूर्ण, चिदानन्दस्वरूप, अविनाशी, बुद्धि आदि उपाधियोंसे शून्य तथा परिणामादि विकारोंसे रहित है ॥ ४० ॥ यह अपने प्रकाशसे देह आदि

सर्ग ४ ] अरण्यकाण्ड १११


स्वप्रकाशेन देहादीन् भासयन्ननपावृतः ।
एक एवाद्वितीयश्च सत्यज्ञानादिलक्षणः ॥४१॥
असङ्गः स्वप्रभो द्रष्टा विज्ञानेनावगम्यते ।
आचार्यशास्त्रोपदेशादैक्यज्ञानं यदा भवेत् ॥४२॥
आत्मनोर्जीवपरयोर्मूलाविद्या तदैव हि ।
लीयते कार्यकारणैः सहैव परमात्मनि ॥४३॥
साऽवस्था मुक्तिरित्युक्ता ह्युपचारोऽयमात्मनि ।
इदं मोक्षस्वरूपं ते कथितं रघुनन्दन ॥४४॥
ज्ञानविज्ञानवैराग्यसहितं मे परात्मनः ।
किन्त्वेतद्दुर्लभं मन्ये मद्भक्तिविमुखात्मनाम् ॥४५॥
चक्षुष्मतामपि यथा रात्रौ सम्यङ् न दृश्यते ।
पदं दीपसमेतानां दृश्यते सम्यगेव हि ॥४६॥
एवं मद्भक्तियुक्तानामात्मा सम्यक् प्रकाशते ।
मद्भक्तेः कारणं किञ्चिद्वक्ष्यामि शृणु तत्त्वतः ॥४७॥

मद्भक्तसङ्गो मत्सेवा मद्भक्तानां निरन्तरम् ।
एकादश्युपवासादि मम पर्वानुमोदनम् ॥४८॥
मत्कथाश्रवणे पाठे व्याख्याने सर्वदा रतिः ।
मत्पूजापरिनिष्ठा च मम नामानुकीर्तनम् ॥४९॥
एवं सततयुक्तानां भक्तिरव्यभिचारिणी ।
मयि सञ्जायते नित्यं ततः किमवशिष्यते ॥५०॥
अतो मद्भक्तियुक्तस्य ज्ञानं विज्ञानमेव च ।
वैराग्यं च भवेच्छीघ्रं ततो मुक्तिमवाप्नुयात् ॥५१॥

कथितं सर्वमेतत्ते तव प्रश्नानुसारतः ।
अस्मिन्मनः समाधाय यस्तिष्ठेत्स तु मुक्तिभाक् ॥५२॥
न वक्तव्यमिदं यत्नान्मद्भक्तिविमुखाय हि ।


उपाधियोंको प्रकाशित करता हुआ भी स्वयं आवरण-शून्य, एक, अद्वितीय और सत्य ज्ञान आदि लक्षणोंवाला तथा संगरहित, स्वप्रकाश और सबका साक्षी है—ऐसा विज्ञानसे जाना जाता है। जिस समय मनुष्यको आचार्य और शास्त्रके उपदेशसे जीवात्मा और परमात्माकी एकताका ज्ञान होता है उसी समय मूला अविद्या अपने कार्य और साधनोंके सहित परमात्मामें लीन हो जाती है ॥ ४१-४३ ॥ अविद्याकी इस लयावस्थाको ही मोक्ष कहते हैं, आत्मामें यह (बन्ध और मोक्ष) केवल उपचारमात्र है (वास्तवमें आत्माकी बन्धावस्था और मुक्तावस्था नहीं है वह तो सदा ही मुक्त है) हे रघुनन्दन लक्ष्मण ! तुम्हें मैंने यह ज्ञान, विज्ञान और वैराग्यके सहित परमात्मारूप अपना मोक्षस्वरूप सुनाया । किन्तु जो लोग मेरी भक्तिसे विमुख हैं उनके लिये मैं इसे अत्यन्त दुर्लभ मानता हूँ ॥ ४४-४५ ॥

जिस प्रकार नेत्र होते हुए भी लोग रात्रिके समय अन्धकारमें भली प्रकार नहीं देख सकते, दीपक होनेपर ही उस समय मार्ग दिखायी देता है, उसी प्रकार मेरी भक्तिसे युक्त पुरुषोंको ही आत्माका सम्यक् साक्षात्कार होता है । अब मैं अपनी भक्तिके कुछ वास्तविक उपाय बताता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ ४६-४७ ॥

"मेरे भक्तका संग करना, निरन्तर मेरी और मेरे भक्तोंकी सेवा करना, एकादशी आदिका व्रत करना, मेरे पर्व दिनोंको मनाना ॥ ४८ ॥ मेरी कथाके सुनने, पढ़ने और उसकी व्याख्या करनेमें सदा प्रेम करना, मेरी पूजामें तत्पर रहना, मेरा नाम-कीर्तन करना" ॥ ४९ ॥ इस प्रकार जो निरन्तर मुझमें लगे रहते हैं उनकी मुझमें अविचल भक्ति हो जाती है। फिर बाकी ही क्या रहता है ? ॥ ५० ॥ अतः ( यह निश्चित बात है कि) मेरी भक्तिसे युक्त पुरुषको ज्ञान, विज्ञान और वैराग्य आदिकी शीघ्र प्राप्ति होती है और फिर वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ५१ ॥

इस प्रकार मैंने तुम्हारे प्रश्नानुसार यह सम्पूर्ण रहस्य तुम्हें सुना दिया । जो व्यक्ति अपने चित्तको इसमें समाहित करके रहता है वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ५२ ॥ अतः हे लक्ष्मण ! मेरी भक्तिसे विमुख पुरुषोंसे

अरण्यकाण्ड - सर्ग ५: शूर्पणखाको दण्ड, खर आदि राक्षसोंका वध

१२० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ५]


[चतुर्थ सर्ग (समाप्ति)]

संस्कृत: मद्भक्ताय प्रदातव्यमाहूयापि प्रयत्नतः ॥५३॥
य इदं तु पठेन्नित्यं श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
अज्ञानपटलध्वान्तं विधूयपरिमूच्यते ॥५४॥
भक्तानां मम योगिनां सुविमल-
    स्वान्तातिशान्तात्मनां
मत्सेवाभिरतात्मनां च विमल-
    ज्ञानात्मनां सर्वदा ।
सङ्गं यः कुरुते सदोद्यतमति-
    स्तत्सेवनानन्यधी-
र्मोक्षस्तस्य करे स्थितोऽहमर्निशं
    दृश्यो भवे नान्यथा ॥५५॥

हिन्दी अनुवाद:
इसे सावधानीपूर्वक न कहना चाहिये और मेरे भक्तोंको (इस प्रकारका मौका न लगे तो) प्रयत्नपूर्वक बुलाकर भी यह रहस्य सुनाना चाहिये ॥ ५३ ॥

जो पुरुष इसे श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सदैव पढ़ेगा वह अज्ञानान्धकार-रूप परदेको हटाकर मुक्त हो जायगा ॥ ५४ ॥

जो पुरुष मेरी सेवामें अनुरक्त-चित्त, निर्मल-हृदय, शान्तात्मा, विमलज्ञानसम्पन्न और मेरे परम भक्त योगिजनोंका संग अनन्य बुद्धिसे सर्वदा उनकी सेवामें तत्पर रहकर करता है, मुक्ति उसके सदैव करतलगत रहती है और मैं सर्वदा उसकी दृष्टिके सम्मुख विराजमान रहता हूँ । इसके अतिरिक्त और किसी उपायसे मेरा दर्शन नहीं हो सकता ॥ ५५ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चम सर्ग

शूर्पणखाको दण्ड, खर आदि राक्षसोंका वध और शूर्पणखाका रावणके पास जाना ।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
तस्मिन् काले महारण्ये राक्षसी कामरूपिणी ।<br>विचचार महासत्त्वा जनस्थाननिवासिनी ॥१॥हे पार्वति ! उस समय उस घोर वनमें जनस्थानकी रहनेवाली एक महाबलवती इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली राक्षसी वृमा करती थी ॥ १ ॥
एकदा गौतमीतीरे पञ्चवट्याः समीपतः ।<br>पद्मवज्राङ्कुशाङ्कानि पदानि जगतीपतेः ॥२॥<br>दृष्ट्वा कामपरीतात्मा पादसौन्दर्यमोहिता ।<br>पश्यन्ती सा शनैरायाद्राघवस्य निवेशनम् ॥३॥एक दिन पञ्चवटीके पास गौतमी नदीके तीरपर जगत्पति श्रीरामचन्द्रजीके पद्म, वज्र और अंकुश आदिके चिह्नोंसे युक्त चरण-चिह्नोंको देखकर वह उनके सौन्दर्यसे मोहित होकर कामासक्त हुई उन्हें देखती-देखती धीरे-धीरे रघुनाथजीके आश्रममें चली आयी ॥ २-३ ॥
तत्र सा तं रमानाथं सीतया सह संस्थितम् ।<br>कन्दर्पसदृशं रामं दृष्ट्वा कामविमोहिता ॥४॥<br>राक्षसी राघवं प्राह कस्य त्वं कः किमाश्रमे ।<br>युक्तो जटावल्कलाद्यैः साध्यं किं तेऽत्र मे वद ॥५॥वहाँ आकर कामदेवके समान अति सुन्दर लक्ष्मीपति श्रीरामचन्द्रजीको सीताजीके साथ बैठे देखकर वह कामातुरा राक्षसी रघुनाथजीसे बोली— "तुम किसके पुत्र हो ? तुम्हारा क्या नाम है ? इस आश्रममें जटा-वल्कलादि धारण कर क्यों रहते हो ? यहाँ रहकर तुम क्या प्राप्त करना चाहते हो ? सो मुझे बताओ ॥ ४-५ ॥ मैं राक्षसराज महात्मा रावणकी...
सर्ग ५]अरण्यकाण्ड१२१
अहं शूर्पणखा नाम राक्षसी कामरूपिणी ।<br>भगिनी राक्षसेन्द्रस्य रावणस्य महात्मनः ॥ ६ ॥<br>खरेण सहिता भ्रात्रा वसाम्यत्रैव कानने ।<br>राज्ञा दत्तं च मे सर्वं मुनिभक्षा वसाम्यहम् ॥ ७ ॥<br>त्वां तु वेदितुमिच्छामि वद मे वदतां वर ।<br>तामाह रामनामाहमयोध्याधिपतेः सुतः ॥ ८ ॥<br>एषा मे सुन्दरी भार्या सीता जनकनन्दिनी ।<br>स तु भ्राता कनीयान्मे लक्ष्मणोऽतीव सुन्दरः ॥ ९ ॥<br>किं कृत्यं ते मया ब्रूहि कार्यं भुवनसुन्दरि ।<br>इति रामवचः श्रुत्वा कामार्ता साऽब्रवीदिदम् ॥ १० ॥<br>एहि राम मया सार्धं रमस्व गिरिकानने ।<br>कामार्ताऽहं न शक्नोमि त्यक्तुं त्वां कमलेक्षणम् ॥ ११ ॥वहिन कामरूपिणी राक्षसी शूर्पणखा हूँ ॥ ६ ॥ मैं अपने भाई खरके साथ इसी वनमें रहती हूँ । राजाने मुझे इस सम्पूर्ण वनका अधिकार सौंप दिया है, अतः मैं मुनियोंको खाती हुई यहाँ रहती हूँ ॥ ७ ॥ हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ ! मैं तुम्हारे विषयमें जानना चाहती हूँ, अतः तुम मुझे अपना नाम-धाम आदि बताओ । तब भगवान्ने उससे कहा— "मैं अयोध्यापति राजा दशरथका राम नामक पुत्र हूँ ॥ ८ ॥ यह सुन्दरी मेरी भार्या जनकनन्दिनी सीता है तथा वह अति सुन्दर कुमार मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है ॥ ९ ॥ हे त्रिभुवनसुन्दरि ! बताओ, मैं तुम्हारा क्या कार्य करूँ ?" रामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर कामातुरा शूर्पणखा बोली—॥ १० ॥ "राम ! चलो (किसी) गिरि-गुहामें चलकर मेरे साथ रमण करो। इस समय मैं कामातुरा हूँ, अतः आप कमलनयनको छोड़ नहीं सकती" ॥ ११ ॥
रामः सीतां कटाक्षेण पश्यन् सस्मितमब्रवीत् ।<br>भार्या ममैषा कल्याणी विद्यते ह्यनपायिनी ॥ १२ ॥<br>त्वं तु सापत्न्यदुःखेन कथं स्थास्यसि सुन्दरि ।<br>बहिरास्ते मम भ्राता लक्ष्मणोऽतीव सुन्दरः ॥ १३ ॥<br>तवानुरूपो भविता पतिस्तेनैव सञ्चर ।<br>इत्युक्ता लक्ष्मणं प्राह पतिर्मे भव सुन्दर ॥ १४ ॥<br>भ्रातुराज्ञां पुरस्कृत्य सङ्गच्छाद्योऽद्य माचिरम् ।तब रामचन्द्रजीने नेत्रोंसे सीताजीकी ओर संकेत करके मुसकाकर कहा— "हे सुन्दरि ! मेरी तो यह मंगलमयी भार्या जीवित है ॥ १२ ॥ इसके रहते हुए तुम जन्मभर सौतकी डाहसे जलती हुई किस प्रकार सुखपूर्वक रह सकोगी ? बाहर मेरा अत्यन्त सुन्दर छोटा भाई लक्ष्मण विराजमान है ॥ १३ ॥ वह तुम्हारा योग्य पति होगा, तुम उसीके साथ (वन-पर्वतादिमें) विहार करो।" रामचन्द्रजीके इस प्रकार कहनेपर शूर्पणखाने लक्ष्मणजीसे जाकर कहा— "हे सुन्दर ! तुम मेरे पति हो जाओ ॥ १४ ॥ तथा अपने भाईकी आज्ञा मानकर चलो, आज हम और तुम परस्पर संगमन करें, देरी न करो।"
इत्याह राक्षसी घोरा लक्ष्मणं काममोहिता ॥ १५ ॥<br>तामाह लक्ष्मणः साध्वि दासोऽहं तस्य धीमतः ।<br>दासी भविष्यसि त्वं तु ततो दुःखतरं नु किम् ॥ १६ ॥<br>तमेव गच्छ भद्रं ते स तु राजाऽखिलेश्वरः ।<br>तच्छ्रुत्वा पुनरप्यागाद्राघवं दुष्टमानसा ॥ १७ ॥उस काममोहिता राक्षसीने जब लक्ष्मणजीसे इस प्रकार कहा ॥ १५ ॥ तो वे उससे बोले, "साध्वि ! मैं तो उन बुद्धिमान् भगवान् रामका दास हूँ । मुझे अपना पति बनानेसे तुम्हें भी उनकी दासी बनना पड़ेगा । तुम्हारे लिये इससे अधिक दुःखकी और क्या बात होगी ? ॥ १६ ॥ तुम्हारा कल्याण हो, तुम उन्हींके पास जाओ, वे महाराज सबके स्वामी हैं।" यह सुनकर वह दुष्टचित्ता राक्षसी फिर रघुनाथजीके पास आयी ॥ १७ ॥ और क्रोधपूर्वक
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१६

१२२अध्यात्मरामायण[ सर्ग ५
क्रोधाद्राम किमर्थं मां भ्रामयस्यानवस्थितः ।<br>इदानीमेव तां सीतां भक्षयामि तवाग्रतः ॥१८॥बोली—"हे राम ! तुम बड़े चञ्चलचित्त हो, मुझे क्यों इधर-उधर घुमा रहे हो ? मैं अभी तुम्हारे सामने ही इस सीताको खाये जाती हूँ" ॥१८॥
इत्युक्त्वा विकटाकारा जानकीमनुधावति ।<br>ततो रामाज्ञया खड्गमादाय परिगृह्य ताम् ॥१९॥<br>चिच्छेद नासां कर्णौ च लक्ष्मणो लघुविक्रमः ।<br>ततो घोरध्वनिं कृत्वा रुधिराक्तवपुर्द्रुतम् ॥२०॥<br>क्रन्दमाना पपाताग्रे खरस्य परुषाक्षरा ।<br>किमेतदिति तामाह खरः खरतराक्षरः ॥२१॥<br>केनैवं कारितासि त्वं मृत्योर्वक्त्रानुवर्तिना ।<br>वद मे तं वधिष्यामि कालकल्पमपि क्षणात् ॥२२॥ऐसा कह वह विकट रूप धारण कर जानकीजीकी ओर दौड़ी। तब लक्ष्मणजीने रामचन्द्रजीकी आज्ञासे उसे पकड़कर बड़ी फुर्तीसे खड्ग लेकर उसके नाक-कान काट डाले। तदनन्तर वह घोर शब्द करती हुई रुधिरमें लथपथ हो बड़ी शीघ्रतासे जाकर गिरी और कठोर शब्द करती खरके सामने गिर पड़ी। उसे देखकर तीक्ष्ण ध्वनिवाले खरने कहा—"यह क्या बात है ॥१९-२१॥ अरी, मृत्युके मुखमें जानेवाले किस दुष्टने तेरी यह दशा की है ? तू बतला तो सही, वह कालके समान भी बली क्यों न हो, मैं उसे क्षणभरमें ही मार डालूँगा" ॥२२॥
तमाह राक्षसी रामः सीतालक्ष्मणसंयुतः ।<br>दण्डकं निर्भयं कुर्वन्नास्ते गोदावरीतटे ॥२३॥<br>मामेवं कृतवांस्तस्य भ्राता तेनैव चोदितः ।<br>यदि त्वं कुलजातोऽसि वीरोऽसि जहि तौ रिपू ॥२४॥<br>तयोस्तु रुधिरं पास्ये भक्षयैतौ सुदुर्मदौ ।<br>नो चेत्प्राणान्परित्यज्य यास्यामि यमसादनम् ॥२५॥तब राक्षसी शूर्पणखाने उससे कहा—"यहाँ सीता और लक्ष्मणके सहित राम दण्डकारण्यको निर्भय करता हुआ गोदावरीके तटपर रहता है ॥२३॥ उसीकी प्रेरणासे उसके भाई लक्ष्मणने मेरी यह गति की है। यदि तुम बड़े कुलीन और वीर हो तो उन दोनों शत्रुओंको मार डालो ॥२४॥ तुम उन दोनों मदोन्मत्तोंको खा जाओ और मैं उन दोनोंका रुधिर पीऊँगी। नहीं तो अपने प्राणोंको छोड़कर यमलोकको चली जाऊँगी" ॥२५॥
तच्छ्रुत्वा त्वरितं प्रागात्खरः क्रोधेन मूर्च्छितः ।<br>चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम् ॥२६॥<br>चोदयामास रामस्य समीपं वधकाङ्क्षया ।<br>खरश्च त्रिशिराश्चैव दूषणश्चैव राक्षसः ॥२७॥<br>सर्वे रामं ययुः शीघ्रं नानाप्रहरणोद्यताः ।<br>श्रुत्वा कोलाहलं तेषां रामः सौमित्रिमब्रवीत् ॥२८॥शूर्पणखाका यह कथन सुनकर खर क्रोधसे अधीर हो तुरन्त (युद्धके लिये) चला और रामको मारनेके लिये उसने बड़े पराक्रमी चौदह सहस्र राक्षस उनके पास भेजे। राक्षसराज खर, दूषण और त्रिशिरा—ये सभी नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर रामके पास आये। उनका कोलाहल सुन श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा—॥२६-२८॥
श्रूयते विपुलः शब्दो नूनमायान्ति राक्षसाः ।<br>भविष्यति महद्युद्धं नूनमद्य मया सह ॥२९॥<br>सीतां नीत्वा गुहां गत्वा तत्र तिष्ठ महाबल ।<br>हन्तुमिच्छाम्यहं सर्वान् राक्षसान् घोररूपिणः ॥३०॥"लक्ष्मण ! देखो, बड़ा कोलाहल सुनायी पड़ रहा है, मालूम होता है निश्चय ही राक्षसगण आ रहे हैं; अवश्य ही आज मेरे साथ उनका घोर युद्ध होगा ॥२९॥ अतः हे महाबल ! तुम सीताको लेकर किसी पर्वतकी कन्दरामें चले जाओ। आज मैं इन समस्त घोररूप राक्षसोंका वध करना चाहता हूँ ॥३०॥

सर्ग ५ ]अरण्यकाण्ड१२३


अत्र किञ्चिन्न वक्तव्यं शापितोऽसि ममोपरि।<br>तथेति सीतामादाय लक्ष्मणो गह्वरं ययौ ॥३१॥तुम्हें मेरी सौगन्ध है, इस विषयमें तुम और कुछ न कहना।” तब लक्ष्मणजी 'जो आज्ञा' कह सीताजीको लेकर एक गिरिगुहामें चले गये ॥ ३१ ॥
रामः परिकरं बद्ध्वा धनुरादाय निष्ठुरम् ।<br>तूणीरावक्षयशरौ बद्ध्वायत्तोऽभवत्प्रभुः ॥३२॥तब श्रीरामचन्द्रजीने अपनी कमर कसी और कठोर धनुष तथा दो अक्षय बाणवाले तरकश बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ ३२ ॥
तत आगत्य रक्षांसि रामस्योपरि चिक्षिपुः ।<br>आयुधानि विचित्राणि पाषाणान्पादपानपि ॥३३॥तदनन्तर राक्षसगण वहाँ आकर रामके ऊपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र, पत्थर और वृक्षादिकी वर्षा करने लगे ॥ ३३ ॥
तानि चिच्छेद रामोऽपि लीलया तिलशः क्षणात् ।<br>ततो बाणसहस्रेण हत्वा तान् सर्वराक्षसान् ॥३४॥<br>खरं त्रिशिरसं चैव दूषणं चैव राक्षसम् ।<br>जघान प्रहरार्धेन सर्वानैव रघूत्तमः ॥३५॥श्रीरामचन्द्रजीने एक क्षणमात्रमें लीलासे ही उन अस्त्र-शस्त्रादिको तिल-तिल करके काट डाला । फिर सहस्रों बाणोंसे उन सम्पूर्ण राक्षसोंको मारकर खर, दूषण और त्रिशिराको भी मार डाला । इस प्रकार रघुवंशियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने आधे पहरमें ही उन समस्त राक्षसोंका संहार कर दिया ॥ ३४-३५॥
लक्ष्मणोऽपि गुहामध्यात्सीतामादाय राघवे ।<br>समर्प्य राक्षसान्दृष्ट्वा हतान्विस्मयमाययौ ॥३६॥तब श्रीलक्ष्मणजीने गुहामेंसे सीताजीको लाकर श्रीरघुनाथजीको सौंप दिया । उस समय सम्पूर्ण राक्षसोंको मरे हुए देख वे बड़े विस्मित हुए ॥ ३६ ॥
सीता रामं समालिङ्ग्य प्रसन्नमुखपङ्कजा ।<br>शस्त्रव्रणानि चाङ्गेषु ममार्ज जनकात्मजा ॥३७॥जनकनन्दिनी श्रीसीताजीने प्रसन्नमुखसे श्रीरामचन्द्रजीका आलिंगन किया और उनके शरीरमें हुए घावोंपर हाथ फेरने लगीं ॥ ३७ ॥
साऽपि दुद्राव दृष्ट्वा तान्हतान् राक्षसपुङ्गवान् ।<br>लङ्कां गत्वा सभामध्ये क्रोशन्ती पादसन्निधौ ॥३८॥<br>रावणस्य पपातोर्व्यां भगिनी तस्य रक्षसः ।<br>दृष्ट्वा तां रावणः प्राह भगिनीं भयविह्वलाम् ॥३९॥उन सम्पूर्ण श्रेष्ठ राक्षसोंको मरे देख राक्षसराज रावणकी बहिन शूर्पणखा दौड़ती हुई लंकामें पहुँची और राजसभामें पहुँचकर रोती हुई रावणके पैरोंके समीप पृथ्वीपर गिर पड़ी। अपनी बहिनको इस प्रकार भयभीत देखकर रावण बोला-॥३८-३९॥ “अरी
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वत्से त्वं विरूपकरणं तव ।<br>कृतं शक्रेण वा भद्रे यमेन वरुणेन वा ॥४०॥<br>कुबेरेणाथवा ब्रूहि भस्मीकुर्यां क्षणेन तम् ।वत्से ! उठ, खड़ी हो । बता तो सही तुझे किसने विरूपा किया है ? हे भद्रे ! यह इन्द्रका काम है, अथवा यम, वरुण और कुबेरमेंसे किसीने किया है ? बता, एक क्षणमें ही मैं उसे भस्म कर डालूँगा।”
राक्षसी तमुवाचेदं त्वं प्रमत्तो विमूढधीः ॥४१॥<br>पानासक्तः स्त्रीविजितः षण्ढः सर्वत्र लक्ष्यसे ।<br>चारचक्षुर्विहीनस्त्वं कथं राजा भविष्यसि ॥४२॥तब राक्षसी शूर्पणखाने उससे कहा-"तुम बड़े ही उन्मत्त और मूढबुद्धि हो ॥ ४०-४१ ॥ तुम मद्यपानमें आसक्त, स्त्रीके वशीभूत और सब प्रकार नपुंसक-जैसे दिखायी पड़ते हो । तुम्हारे चर (खुफिया पुलिस) रूप नेत्र नहीं है; फिर तुम राजा
१२४अध्यात्मरामायण[सर्ग ५

खरश्च निहतः सङ्ख्ये दूषणस्त्रिशिरास्तथा ।<br>चतुर्दश सहस्राणि राक्षसानां महात्मनाम् ॥४३॥<br>निहतानि क्षणेनैव रामेणासुरशत्रुणा ।<br>जनस्थानमशेषेण मुनीनां निर्भयं कृतम् ।<br>न जानासि विमूढस्त्वमत एव मयोच्यते ॥४४॥ | कैसे रह सकोगे ? ॥४२॥ युद्धमें खर मारा गया तथा दूषण और त्रिशिरा आदि चौदह सहस्र मुख्य-मुख्य राक्षसोंको असुरशत्रु रामने एक क्षणमें ही मार डाला और सारे जनस्थानको मुनीश्वरोंके लिये सर्वथा निर्भय कर दिया । इतना उत्पात हो जानेपर भी तुम्हें अभीतक कुछ पता ही नहीं है इसीलिये मैं कहती हूँ कि 'तुम मूढ़ हो' ॥४३-४४॥ रावण उवाच | **रावण बोला—**अरी तू बता तो, वह राम कौन है ? उसने किसलिये और किस प्रकार इन राक्षसोंको मारा ? तू सब बात विस्तारपूर्वक कह, मैं उसका मूलोच्छेद कर डालूँगा ॥४५॥ को वा रामः किमर्थं वा कथं तेनासुरा हताः ।<br>सम्यक्कथय मे तेषां मूलघातं करोम्यहम् ॥४५॥ | शूर्पणखोवाच | **शूर्पणखा बोली—**एक दिन जनस्थानसे मैं गौतमीके किनारे जा रही थी, वहाँ पूर्वकालमें मुनिजनोंसे सेवित एक पञ्चवटी नामक आश्रम है ॥४६॥ उस आश्रममें मैंने जटा-वल्कलादिसे सुशोभित धनुर्बाणधारी कमलनयन शोभाधाम रामको देखा ॥४७॥ उसका छोटा भाई लक्ष्मण भी उसीके समान रूपवान् है तथा उसकी विशाललोचना भार्या भी रूपमें साक्षात् दूसरी लक्ष्मी-जैसी ही है ॥४८॥ हे राजन् ! देव, गन्धर्व, नाग और मनुष्य आदिमेंसे किसीकी भी स्त्री ऐसी रूपवती न देखी है और न सुनी है । वह शुभलक्षणा अपनी कान्तिसे सम्पूर्ण वनको प्रकाशित कर रही थी ॥४९॥ हे अनघ ! उसे तुम्हारी पत्नी बनानेके लिये मैंने लानेका प्रयत्न किया था, इसीसे रामके भाई लक्ष्मणने मेरी नाक काट डाली ॥५०॥ फिर रामकी प्रेरणासे महाबली लक्ष्मणने मेरे कान भी काट लिये । तब मैं अत्यन्त दुःखसे रोती हुई खरके पास गयी ॥५१॥ उसने भी अपने राक्षस-सेनापतियोंके साथ तुरन्त जाकर रामसे युद्ध ठाना; किन्तु उस बलशाली रामने एक क्षणमें ही वे समस्त भीमविक्रम राक्षस नष्ट कर दिये । हे प्रभो ! मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि यदि रामके मनमें आ जाय तो वह निस्सन्देह आधे निमेषमें ही सम्पूर्ण त्रिलोकीको भस्म कर सकता है । किन्तु यदि उसकी स्त्री सीता तुम्हारी भार्या हो जाय तो तुम्हारा जीवन सफल हो जायगा ॥५२–५४॥ जनस्थानादहं याता कदाचिद्गौतमीतटे ।<br>तत्र पञ्चवटी नाम पुरा मुनिजनाश्रया ॥४६॥<br>तत्राश्रमे मया दृष्टो रामो राजीवलोचनः ।<br>धनुर्बाणधरः श्रीमान् जटावल्कलमण्डितः ॥४७॥<br>कनीयाननुजस्तस्य लक्ष्मणोऽपि तथाविधः ।<br>तस्य भार्या विशालाक्षी रूपिणी श्रीरिवापरा ॥४८॥<br>देवगन्धर्वनागानां मनुष्याणां तथाविधा ।<br>न दृष्टा न श्रुता राजन्द्योतयन्ती वनं शुभा ॥४९॥<br>आनेतुमहमद्युक्ता तां भार्यार्थं तदानघ ।<br>लक्ष्मणो नाम तद्भ्राता चिच्छेद मम नासिकाम्॥५०॥<br>कर्णौ च नोदितस्तेन रामेण स महाबलः ।<br>ततोऽहमतिदुःखेन रुदती खरमन्वगाम् ॥५१॥<br>सोऽपि रामं समासाद्य युद्धं राक्षसयूथपैः ।<br>ततः क्षणेन रामेण तेनैव बलशालिना ॥५२॥<br>सर्वे तेन विनष्टा वै राक्षसा भीमविक्रमाः ।<br>यदि रामो मनः कुर्यात्त्रैलोक्यं निमिषार्धतः ॥५३॥<br>भस्मीकुर्यान्न सन्देह इति भाति मम प्रभो ।<br>यदि सा तव भार्या स्यात्सफलं तव जीवितम् ॥५४॥ |

सर्ग ५ ]
अरण्यकाण्ड
१२५


अतो यतस्व राजेन्द्र यथा ते वल्लभा भवेत् ।<br>सीता राजीवपत्राक्षी सर्वलोकैकसुन्दरी ॥५५॥<br>साक्षाद्रामस्य पुरतः स्थातुं त्वं न क्षमः प्रभो ।<br>मायया मोहयित्वा तु प्राप्स्यसे तां रघूत्तमम् ॥५६॥अतः हे राजेन्द्र ! तुम ऐसा प्रयत्न करो जिससे सम्पूर्ण लोकोंमें एकमात्र सुन्दरी कमलनयनी सीता तुम्हारी प्राणप्रिया हो जाय ॥५५॥ हे प्रभो ! तुम रामके सामने साक्षात् न ठहर सकोगे, इसलिये उन रघुश्रेष्ठको किसी प्रकार मायाजालसे मोहित कर तुम उसे प्राप्त कर सकते हो ॥५६॥
श्रुत्वा तत्सूक्तवाक्यैश्च दानमानादिभिस्तथा ।<br>आश्वास्य भगिनीं राजा प्रविवेश स्वकं गृहम् ।<br>तत्र चिन्तापरो भूत्वा निद्रां रात्रौ न लब्धवान् ५७यह सुनकर राक्षसराज रावणने सुन्दर वाक्यों और दान-मानादिसे बहिन शूर्पणखाको धैर्य बँधाकर अपने अन्तःपुरमें प्रवेश किया, किन्तु वहाँ चिन्ताके कारण उसे रात्रिको नींद नहीं आयी ॥५७॥ वह सोचने लगा—
एकेन रामेण कथं मनुष्य-<br>मात्रेण नष्टः सबलः खरो मे ।<br>भ्राता कथं मे बलवीर्यदर्प-<br>युतो विनष्टो वत राघवेण ॥५८॥‘बड़े आश्चर्यकी बात है, अकेले मनुष्यमात्र रघुवंशी रामने बल-वीर्य और साहससम्पन्न मेरे भाई खरको दल-बलके सहित कैसे मार डाला ? ॥५८॥
यद्वा न रामो मनुजः परेशो<br>मां हन्तुकामः सबलं बलौघैः ।<br>सम्प्राथितोऽयं द्रुहिणेन पूर्वं<br>मनुष्यरूपोऽद्य रघोः कुलेऽभूत् ॥५९॥अथवा यह राम मनुष्य नहीं हैं, साक्षात् परमात्माने ही पूर्वकालमें की हुई ब्रह्माकी प्रार्थनासे मेरी बल-वीर्य-सम्पन्न सेनाके सहित मुझे मारनेके लिये इस समय रघुवंशमें मनुष्यरूपसे अवतार लिया है ॥५९॥
वध्यो यदि स्यां परमात्मनाहं<br>वैकुण्ठराज्यं परिपालयेहम् ।<br>नो चेदिदं राक्षसराज्यमेव<br>भोक्ष्ये चिरं राममतो व्रजामि ॥६०॥किन्तु मुझे रामके पास अवश्य चलना चाहिये, क्योंकि यदि उन परमात्माद्वारा मैं मारा गया तब तो मैं वैकुण्ठका राज्य भोगूँगा नहीं तो चिरकालपर्यन्त राक्षसोंका राज्य तो भोगूँगा ही' ॥६०॥
इत्थं विचिन्त्याखिलराक्षसेन्द्रो<br>रामं विदित्वा परमेश्वरं हरिम् ।<br>विरोधयुद्धचैव हरिं प्रयामि<br>द्रुतं न भक्त्या भगवान्प्रसीदेत् ॥६१॥सम्पूर्ण राक्षसोंके स्वामी रावणने इस प्रकार विचारकर भगवान् रामको साक्षात् परमात्मा हरि जानकर यह निश्चय किया कि मैं विरोध-बुद्धिसे ही उनके पास जाऊँगा क्योंकि भक्तिके द्वारा भगवान् (मुझसे) शीघ्र प्रसन्न नहीं हो सकते ॥६१॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥५॥

अरण्यकाण्ड - सर्ग ६: रावणका मारीचके पास जाना

१२६अध्यात्मरामायणं[ सर्ग ६

षष्ठ सर्ग

रावणका मारीचके पास जाना ।


श्रीमहादेव उवाच**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! रात्रिके समय इस प्रकार विचारकर प्रातःकाल होनेपर रावण रथमें सवार हुआ और अपने मन-ही-मन एक कार्य निश्चय कर वह समुद्रके दूसरे तटपर मारीचके घर गया । वहाँ मारीच मुनियोंके समान जटा-वल्कलादि धारण-कर प्राकृत गुणोंके प्रकाशक निर्गुण भगवान्‌का ध्यान कर रहा था । समाधि भंग होनेपर उसने रावणको अपने घर आया देखा ॥ १–३ ॥
विचिन्त्यैवं निशायां स प्रभाते रथमास्थितः ।<br>रावणो मनसा कार्यमेकं निश्चित्य बुद्धिमान् ॥१॥<br>ययौ मारीचसदनं परं पारमुदन्वतः ।<br>मारीचस्तत्र मुनिवज्जटावल्कलधारकः ॥२॥<br>ध्यायन् हृदि परात्मानं निर्गुणं गुणभासकम् ।<br>समाधिविरमेऽपश्यद्रावणं गृहमागतम् ॥३॥
द्रुतमुत्थाय चालिङ्ग्य पूजयित्वा यथाविधि ।<br>कृतातिथ्यं सुखासीनं मारीचो वाक्यमब्रवीत् ॥४॥रावणको देखते ही वह शीघ्रतासे उठ खड़ा हुआ और उससे गले मिलकर उसकी विधिपूर्वक पूजा की । तथा आतिथ्य-सत्कारके अनन्तर जब रावण स्वस्थ होकर बैठा तो मारीच उससे बोला—॥ ४ ॥
समागमनमेतत्ते रथेनैकेन रावण ।<br>चिन्तापर इवाभासि हृदि कार्यं विचिन्तयन् ॥५॥“हे रावण ! इस समय तुम अकेले ही रथमें बैठकर आये हो और तुम्हारा चित्त किसी कार्यके विचारमें चिन्ताग्रस्त-सा प्रतीत होता है ॥ ५ ॥
ब्रूहि मे नहि गोप्यं चेत्करवाणि तव प्रियम् ।<br>न्याय्यं चेद् ब्रूहि राजेन्द्र वृजिनं मां स्पृशेन्न हि ॥६॥यदि गोपनीय न हो तो मुझे वह कार्य बताइये । हे राजेन्द्र ! यदि उसके करनेमें मुझे पाप न लगे और वह न्यायानुतूल हो तो कहो, मैं तुम्हारा वह प्रिय कार्य अवश्य करूँगा” ॥ ६ ॥
रावण उवाच**रावण बोला—**कहते हैं राजा दशरथ अयोध्यापुरी-का अधिपति है, उसका ज्येष्ठ पुत्र सत्यपराक्रमी राम है ॥ ७ ॥
अस्ति राजा दशरथः साकेताधिपतिः किल ।<br>रामनामा सुतस्तस्य ज्येष्ठः सत्यपराक्रमः ॥७॥
विवासयामास सुतं वनं वनजनप्रियम् ।<br>भार्यया सहितं भ्रात्रा लक्ष्मणेन समन्वितम् ॥८॥उस अपने मुनिजनप्रिय पुत्रको दशरथने स्त्री और छोटे भाई लक्ष्मणके सहित वनमें भेज दिया है ॥ ८ ॥
स आस्ते विपिने घोरे पञ्चवट्याश्रमे शुभे ।<br>तस्य भार्या विशालाक्षी सीता लोकविमोहिनी ॥९॥इस समय वह घोर दण्डकारण्यके पञ्चवटी नामक शुभ आश्रममें रहता है । सुना है, उसकी भार्या विशाल-नयना सीता त्रिलोकीको मोहित करनेवाली है ॥ ९ ॥
रामो निरपराधान्मे राक्षसान् भीमविक्रमान् ।<br>खरं च हत्वा विपिने सुखमास्तेऽतिनिर्भयः ॥१०॥वह राम, मेरे बड़े पराक्रमी निरपराध राक्षसोंको भाई खरके सहित मारकर उस तपोवनमें निर्भयता-पूर्वक बड़े आनन्दसे रहता है ॥ १० ॥
भगिन्याः शूर्पणखाया निर्दोषायाश्च नासिकाम् ।<br>कर्णौ चिच्छेद दुष्टात्मा वने तिष्ठति निर्भयः ॥११॥मेरी बहिन शूर्पणखाने उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ा था किन्तु उस दुष्टने उसके नाक-कान काट डाले और अब निर्भयतापूर्वक उस वनमें रहता है ॥ ११ ॥
अतस्त्वया सहायेन गत्वा तत्राणवल्लभाम् ।<br>आनयिष्यामि विपिने रहिते राघवेण ताम् ॥१२॥इसलिये अब तुम्हारी सहायतासे मैं रामके तपोवनमें न रहनेपर उसकी प्राणप्रिया सीताको ले आना चाहता हूँ ॥ १२ ॥

सर्ग ६ ] अरण्यकाण्ड १२७


त्वं तु मायामृगो भूत्वा ह्याश्रमादपनेष्यसि ।<br>रामं च लक्ष्मणं चैव तदा सीतां हराम्यहम् ॥ १३॥<br>त्वं तु तावत्सहायं मे कृत्वा स्थास्यसि पूर्ववत् ।<br>इत्येवं भाषमाणं तं रावणं वीक्ष्य विस्मितः ॥ १४॥<br>केनेदमुपदिष्टं ते मूलघातकरं वचः ।<br>स एव शत्रुर्बध्यश्च यस्तवन्नाशं प्रतीक्षते ॥ १५॥<br>रामस्य पौरुषं स्मृत्वा चित्तमद्यापि रावण ।<br>बालोऽपि मां कौशिकस्य यज्ञसंरक्षणाय सः ॥ १६॥<br>आगतस्तिग्मपुङ्खेन पातयामास सागरे ।<br>योजनानां शतं रामस्तदादि भयविह्वलः ॥ १७॥<br>स्मृत्वा स्मृत्वा तदेवाहं रामं पश्यामि सर्वतः ॥ १८॥<br>दण्डकेऽपि पुनरप्यहं वने<br>$\hspace{1em}$पूर्ववैरमनुचिन्तयन् हृदि ।<br>तीक्ष्णशृङ्गमृगरूपमेकदा<br>$\hspace{1em}$मादृशैर्बहुभिरानृतोऽभ्ययाम् ॥ १९॥<br>राघवं जनकजासमन्वितं<br>$\hspace{1em}$लक्ष्मणेन सहितं त्वरान्वितः ।<br>आगतोऽहमथ हन्तुमुद्यतो<br>$\hspace{1em}$मां विलोक्य शरमेकमाक्षिपत् ॥ २०॥<br>तेन विद्धहृदयोऽहमुद्भ्रमन्<br>$\hspace{1em}$राक्षसेन्द्र पतितोऽस्मि सागरे ।<br>तत्प्रभृत्यहमिदं समाश्रितः<br>$\hspace{1em}$स्थानमूर्जितमिदं भयार्दितः ॥ २१॥<br>राममेव सततं विभावये<br>$\hspace{1em}$भीत भीत इव भोगराशितः ।<br>राजरत्नरमणीरथादिकं<br>$\hspace{1em}$श्रोत्रयोर्यदि गतं भयं भवेत् ॥ २२॥<br>राम आगत इहेति शङ्कया<br>$\hspace{1em}$बाह्यकार्यमपि सर्वमत्यजम् ।<br>निद्रया परिगतो यदा स्वपे<br>$\hspace{1em}$राममेव मनसाऽनुचिन्तयन् ॥ २३॥<br>स्वप्नदृष्टगतराघवं तदा<br>$\hspace{1em}$बोधितो विगतनिद्र आस्थितः ।तुम मायासे मृगरूप होकर राम और लक्ष्मणको आश्रमसे दूर ले जाना। उसी समय मैं सीताको हर लाऊँगा ॥ १३ ॥ इस प्रकार मेरी सहायता करके तुम फिर पूर्ववत् अपने आश्रममें आ रहना ।<br>$\hspace{1em}$रावणको इस प्रकार कहते देख मारीचने विस्मित होकर कहा—॥ १४ ॥ "रावण ! ये सर्वनाश करने-वाली बातें तुम्हें किसने बतायी हैं ? इस प्रकार जो कोई तुम्हारा नाश करना चाहता है, निश्चय ही वह तुम्हारा शत्रु है और वध करने योग्य है ॥ १५ ॥ हे रावण ! उनके बाल्यकालके पौरुषको याद करके, जब वे विश्वामित्रजीकी यज्ञ-रक्षाके लिये आये थे और उन्होंने एक बाणसे ही मुझे सौ योजन दूर समुद्रके तटपर फेंक दिया था, आजतक मेरा हृदय भयसे व्याकुल हो जाता है। बारम्बार उसी बातका स्मरण हो आनेसे मुझे सब ओर राम-ही-राम दिखलायी देने लगते हैं ॥ १६–१८ ॥ एक दिन अपने पूर्व-वैरका स्मरण कर मैं दण्डकारण्यमें भी अपने-जैसे बहुत-से मृगोंके साथ मिलकर एक तीखे सींगोंवाले मृगका रूप बनाकर गया था ॥ १९ ॥ जब मैं बड़ी फुर्तीसे सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरघुनाथजीको मारनेकी इच्छासे आगे बढ़ा तो मुझे देखकर उन्होंने केवल एक बाण छोड़ दिया ॥ २० ॥ हे राक्षसेन्द्र ! उसीसे हृदय विंध जानेके कारण मैं आकाशमें चक्कर काटता हुआ समुद्रमें आकर गिरा। तबसे मैं भयभीत होकर इस पवित्र स्थानमें आश्रम बनाकर बड़ी सावधानीसे रहता हूँ ॥ २१ ॥ राज, रत्न, रमणी और रथ आदि (भोग-सामग्रियोंके प्रथम अक्षर 'र') के कानोंमें पड़ते ही मुझे (रामकी याद आ जानेसे) भय उत्पन्न हो जाता है, इसलिये मैं भोग-समुदायसे भयभीत होकर निरन्तर 'राम' का ही ध्यान करता रहता हूँ ॥ २२ ॥ 'यहाँ राम न आ गये हों' इस आशंकासे मैंने समस्त बाह्य कार्य छोड़ दिये हैं। जिस समय मैं निद्राके वशीभूत होकर सोता हूँ उस समय मन-ही-मन रामका ही स्मरण करता रहता हूँ ॥ २३ ॥ इस प्रकार स्वप्नमें देखे हुए श्रीरघुनाथजीको जब निद्रा टूटनेपर जागता हूँ तब भी नहीं भूलता। अतः हे रावण ! तुम भी

अरण्यकाण्ड - सर्ग ७: मारीचवध और सीताहरण

१२८अध्यात्मरामायण[सर्ग ६

तद्भवानपि विमुच्य चाग्रहं
राघवं प्रति गृहं प्रयाहि भोः ॥२४॥
रक्ष राक्षसकुलं चिरागतं
तत्स्मृतौ सकलमेव नश्यति।
तव हितं वदतो मम भाषितं
परिगृहाण परात्मनि राघवे ॥२५॥
त्यज विरोधमतिं भज भक्तितः
परमकारुणिको रघुनन्दनः।
अहमशेषमिदं मुनिवाक्यतो-
ऽशृणवमादियुगे परमेश्वरः ॥२६॥
ब्रह्मणाऽर्थित उवाच तं हरिः
किं तवेप्सितमहं करवाणि तत्।
ब्रह्मणोक्तमरविन्दलोचन
त्वं प्रयाहि भुवि मानुषं वपुः।
दशरथात्मजभावमञ्जसा
जहि रिपुं दशकन्धरं हरे ॥२७॥
अतो न मानुषो रामः साक्षान्नारायणोऽव्ययः।
मायामानुषवेषेण वनं यातोऽतिनिर्भयः ॥२८॥
भूभारहरणार्थाय गच्छ तात गृहं सुखम्।
श्रुत्वा मारीचवचनं रावणः प्रत्यभाषत ॥२९॥
परमात्मा यदा रामः प्रार्थितो ब्रह्मणा किल।
मां हन्तुं मानुषो भूत्वा यत्नादिह समागतः ॥३०॥
करिष्यत्यचिरादेव सत्यसङ्कल्प ईश्वरः।
अतोऽहं यत्नतः सीतामानेष्याम्येव राघवात् ॥३१॥
वधे प्राप्ते रणे वीर प्राप्स्यामि परमं पदम्।
यद्वा रामं रणे हत्वा सीतां प्राप्स्यामि निर्भयः ॥३२॥
तदुत्तिष्ठ महाभाग विचित्रमृगरूपधृक्।
रामं सलक्ष्मणं शीघ्रमाश्रमादतिदूरतः ॥३३॥
आक्रम्य गच्छ त्वं शीघ्रं सुखं तिष्ठ यथा पुरा।
अतः परं चेद्यत्किञ्चिद्व्यापसे माद्विभीषणम् ॥३४॥
हनिष्याम्यसिनाऽनेन त्वामत्रैव न संशयः। | श्रीरामघवसे हठ छोड़कर अपने घर चले जाओ ॥ २४ ॥ और चिरकालसे बढ़े हुए अपने राक्षस-वंशकी रक्षा करो। श्रीरामचन्द्रजीसे बैर न करो, उनका तो (वैर-भावसे) स्मरण करनेसे भी सर्वस्व नष्ट हो जाता है। मैं तुम्हारे हितके लिये जो कुछ कहता हूँ वह मानो। तुम परमात्मा श्रीरघुनाथजीसे विरोध-बुद्धि छोड़ दो और भक्तिभावसे उनका भजन करो, क्योंकि श्रीरामचन्द्र-जी बड़े दयालु हैं। मैंने मुनीश्वरोंके मुखसे ये सभी बातें सुनी हैं कि सत्ययुगमें ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर परमात्मा श्रीहरिने कहा था कि तुम अपना मनोरथ बताओ, मैं उसे पूर्ण करूँगा। तब ब्रह्माजीने भगवान्‌से कहा—"हे कमललोचन हरे! आप मनुष्य-रूपसे पृथिवीमें अवतार लीजिये और शीघ्र ही दशरथ-नन्दन श्रीराम होकर देवद्रोही दशाननका वध कीजिये ॥२५-२७॥ अतः तुम निश्चय मानो, राम मनुष्य नहीं हैं; वे साक्षात् अव्ययपुरुष श्रीनारायण हैं, मायासे मनुष्यरूप होकर वे निर्भयतापूर्वक पृथिवीका भार उतारनेके लिये वनमें आये हैं। अतः हे तात! तुम सुखपूर्वक घर लौट जाओ।"<br><br>मारीचके ये वचन सुनकर रावण बोला—॥२८-२९॥ “यदि ब्रह्माकी प्रार्थनासे परमात्मा ही राम होकर मनुष्यरूपसे मुझे प्रयत्नपूर्वक मारनेके लिये यहाँ आये हैं, तो वे शीघ्र ही अवश्य वैसा ही करेंगे, क्योंकि ईश्वर सत्य-संकल्प हैं। इसलिये मैं अवश्य यत्नपूर्वक रघुनाथ-जीके पाससे सीताको ले आऊँगा ॥ ३०-३१॥ हे वीर! यदि मैं युद्धमें उनके हाथसे मारा गया तो परमपद प्राप्त करूँगा और यदि मैंने ही रामको रणक्षेत्रमें मार डाला तो निर्भयतापूर्वक सीताको पाऊँगा ॥ ३२ ॥ अतः हे महाभाग! उठो और शीघ्र ही विचित्र मृगरूप धारण कर राम और लक्ष्मणको आश्रमसे अति दूर ले जाओ, फिर पूर्ववत् अपने आश्रममें आकर सुखपूर्वक रहो। यदि मुझे भयभीत करनेके लिये अब और कुछ कहोगे तो निश्चय मानो, मैं अभी इसी खड्गसे तुम्हें यहीं मार डालूँगा।"

सर्ग ७ ] अरण्यकाण्ड [ १२९


| मारीचस्तद्वचः श्रुत्वा स्वात्मन्येवान्वचिन्तयत् ।३५। <br><br> यदि मां राघवो हन्यात्तदा मुक्तो भवार्णवात्। <br> मां हन्याद्यदि चेद्दुष्टस्तदा मे निरयो ध्रुवम् ॥३६॥ <br><br> इति निश्चित्य मरणं रामादुत्थाय वेगतः। <br> ऽब्रवीद्रावणं राजन्करोम्याज्ञां तव प्रभो ॥३७॥ <br><br> इत्युक्त्वा रथमास्थाय गतो रामाश्रमं प्रति। <br> शुद्धजाम्बूनदप्रख्यो मृगोऽभूद्रौप्यविन्दुकः॥३८॥ <br> रत्नशृङ्गो मणिखुरो नीलरत्नविलोचनः। <br> विद्युत्प्रभो विमुग्धास्यो विचचार वनान्तरे ॥३९॥ <br> रामाश्रमपदस्यान्ते सीतादृष्टिपथे चरन् ॥४०॥ <br><br> क्षणं च धावत्यवतिष्ठते क्षणं <br> समीपमागत्य पुनर्भयावृतः। <br> एवं स मायामृगवेषरूपधृक् <br> चचार सीतां परिमोहयन्खलः ॥४१॥ | उसका यह कथन सुनकर मारीचने मन-ही-मन सोचा— ॥३३-३५॥ 'यदि श्रीरघुनाथजीने मुझे मारा तो मैं संसार-सागरसे पार हो जाऊँगा और जो कहीं इस दुष्टने मुझे मार दिया तो निश्चय ही मुझे नरकमें पड़ना होगा' ॥ ३६ ॥ इस प्रकार श्रीरामके हाथसे ही अपना मरना निश्चय कर वह शीघ्रतासे उठा और रावणसे बोला—"हे राजन् ! हे प्रभो ! मैं आपकी आज्ञा पालन करूँगा" ॥ ३७ ॥ <br><br> ऐसा कह वह (रावणके) रथपर चढ़कर श्रीरामचन्द्रके आश्रममें आया और चाँदीकी बूँदोंके सहित शुद्ध सुवर्ण-वर्ण विचित्र मृग-रूप धारण किया ॥ ३८ ॥ उसके सींग रत्नमय, खुर मणिमय और नेत्र नीलरत्नमय थे। इस प्रकार बिजलीकी-सी छटा और मनोहर मुखवाला वह मृग रामचन्द्रजीके आश्रमके पास सीताजीके सामने वनमें विचरने लगा ॥ ३९-४० ॥ किसी क्षण तो वह चौकड़ी मारने लगता और कभी पास आकर भयसे ठिठक जाता। इस प्रकार वह दुष्ट मायामृगरूप धारणकर सीताजीको मोहित करता हुआ घूमने लगा ॥ ४१ ॥ |


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥


सप्तम सर्ग

मारीचवध और सीताहरण।

| श्रीमहादेव उवाच <br><br> अथ रामोऽपि तत्सर्वं ज्ञात्वा रावणचेष्टितम्। <br> उवाच सीतामेकान्ते शृणु जानकि मे वचः ॥ १ ॥ <br> रावणो भिक्षुरूपेण आगमिष्यति तेऽन्तिकम्। <br> त्वं तु छायां त्वदाकारां स्थापयित्वोटजे विश ॥२॥ <br> अग्नावदृश्यरूपेण वर्षं तिष्ठ ममाज्ञया। <br> रावणस्य वधान्ते मां पूर्ववत्प्राप्स्यसे शुभे ॥ ३ ॥ <br> श्रुत्वा रामोदितं वाक्यं सापि तत्र तथाकरोत्। | श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! इधर श्रीरामचन्द्रजीने भी रावणका सारा षड्यन्त्र जानकर एकान्तमें श्रीजानकीजीसे कहा—"हे सीते ! मैं जो कुछ कहता हूँ वह सुनो ॥ १ ॥ हे शुभे ! रावण तुम्हारे पास भिक्षुका रूप धारण कर आयेगा, अतः तुम अपने ही समान आकृतिवाली अपनी छायाको कुटीमें छोड़कर अग्निमें प्रवेश कर जाओ, और मेरी आज्ञासे वहाँ अदृश्यरूपसे एक वर्ष रहो। तदनन्तर, रावणके मारे जानेपर तुम मुझे पूर्ववत् पा लोगी" ॥ २-३ ॥ रामचन्द्रजीके वचन सुनकर सीताजीने भी वैसा ही किया। |


१७

१३०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

मायासीतां वहिः स्थाप्य स्वयमन्तर्दधेऽनले ॥४॥ | वे मायामयी सीताको बाहर कुटीमें छोड़कर स्वयं अग्निमें अन्तर्धान हो गयीं ॥ ४ ॥ मायासीता तदाऽपश्यन्मृगं मायाविनिर्मितम् ।<br>हसन्ती राममभ्येत्य प्रोवाच विनयान्विता ॥ ५ ॥ | तत्र उस मायासीतान मायामय मृगको देखकर श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर हँसते हुए बड़ी नम्रतासे कहा—॥ ५ ॥ "हे राम ! यह रत्न-विभूषित विचित्र सुवर्ण-मृग देखिये । अहो ! इसके शरीरमें कैसे अद्भुत विन्दु हैं और यह कैसी निर्भयतासे विचर रहा है ? हे प्रभो ! आप इसे बाँधकर मुझे ला दीजिये; यह सुन्दर हरिण मेरा क्रीड़ामृग होने योग्य है" ॥ ६ ॥ पश्य राम मृगं चित्रं कनकं रत्नभूषितम् ।<br>विचित्रविन्दुभिर्युक्तं चरन्तमकुतोभयम् ।<br>बद्ध्वा देहि मम क्रीडामृगो भवतु सुन्दरः ॥ ६ ॥ तथेति धनुरादाय गच्छन् लक्ष्मणमब्रवीत् ।<br>रक्ष त्वमतियत्नेन सीतां मत्प्राणवल्लभाम् ॥ ७ ॥ | तत्र रामचन्द्रजीने 'बहुत अच्छा' कह अपना धनुष उठा लिया और जाते समय लक्ष्मणजीसे कहा— "लक्ष्मण ! तुम प्राण-प्रिया सीताकी यत्नपूर्वक देख-भाल करना ॥ ७ ॥ आजकल वनमें बड़े मायावी भयंकर राक्षस विचर रहे हैं। अतः तुम अनिन्दिता साध्वी सीताकी बहुत सावधान रहकर रक्षा करना" ॥ ८ ॥ मायिनः सन्ति विपिने राक्षसा घोरदर्शनाः ।<br>अतोऽत्रावहितः साध्वीं रक्ष सीतामनिन्दिताम् ॥८॥ लक्ष्मणो राममाहेदं देवोयं मृगरूपधृक् ।<br>मारीचोऽत्र न सन्देह एवंभूतो मृगः कुतः ॥ ९ ॥ | तव लक्ष्मणजीने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— "देव ! यह मृगरूपधारी मारीच है, इसमें सन्देह नहीं, क्योंकि भला मृग ऐसा कहाँ हो सकता है ?" ॥ ९ ॥ श्रीराम उवाच | **श्रीरामचन्द्रजी बोले—**यदि यह मारीच है तो, इसमें सन्देह नहीं, मैं इसे अवश्य मार डालूँगा । और यदि मृग ही है तो सीताका मन रखनेके लिये ले आऊँगा ॥ १० ॥ मैं अभी जाकर बहुत शीघ्र ही इस मृगको बाँधकर लिये आता हूँ, तबतक तुम सीताजीकी रखवाली करते हुए बहुत सावधान रहना ॥ ११ ॥ यदि मारीच एवायं तदा हन्मि न संशयः ।<br>मृगश्चेदानयिष्यामि सीताविश्रमहेतवे ॥१०॥ गमिष्यामि मृगं बध्वा ह्यानायिष्यामि सत्वरः ।<br>त्वं प्रयत्नेन सन्तिष्ठ सीतासंरक्षणोद्यतः ॥११॥ इत्युक्त्वा प्रययौ रामो मायामृगमलुद्रुतः ।<br>माया यदाश्रया लोकमोहिनी जगदाकृतिः ॥१२॥ | यह संसाररूपिणी जगन्मोहिनी माया जिनके आश्रित है वे रामचन्द्रजी ऐसा कह उस मायामृगके पीछे दौड़ते चले गये ॥ १२ ॥ वे निर्विकार चिदात्मा और सर्व-व्यापक होकर भी उस मृगके पीछे दौड़े, इससे यह वाक्य सर्वथा सत्य ही है कि 'भगवान् हरि बड़े भक्त-वत्सल हैं' ॥ १३ ॥ भगवान् सब कुछ जानते थे, तथापि सीताजीको प्रसन्न करनेके लिये वे मृगके पीछे गये। नहीं तो पूर्णकाम आत्मज्ञ भगवान् रामको मृग अथवा स्त्रीसे क्या काम था ? वह मृग कभी तो पास ही दिखलायी देने लगता, कभी एक क्षणमें ही दूर भागकर छिप जाता ॥ १४-१५॥ और फिर बहुत दूरीपर दिखलायी देता। इस प्रकार वह रामचन्द्रजीको बहुत दूर ले गया । निर्विकारश्चिदात्मापि पूर्णोऽपि मृगमन्वगात् ।<br>भक्तानुकम्पी भगवानिति सत्यं वचो हरिः ॥१३॥ कर्तुं सीताप्रियार्थाय जानन्नपि मृगं ययौ ।<br>अन्यथा पूर्णकामस्य रामस्य विदितात्मनः ॥१४॥ मृगेण वा स्त्रिया वापि किं कार्य परमात्मनः ।<br>कदाचिद्दृश्यतेऽभ्याशे क्षणं धावति लीयते॥१५॥<br>दृश्यते च ततो दूराद्देवं राममपाहरत् ।

सर्ग ७ ] अरण्यकाण्ड १३१


ततो रामोऽपि विज्ञाय राक्षसोऽयमिति स्फुटम् १६
विव्याध शरमादाय राक्षसं मृगरूपिणम् ।
पपात रुधिराक्तास्यो मारीचः पूर्वरूपधृक् ॥१७॥
हा हतोऽस्मि महाबाहो त्राहि लक्ष्मण मां द्रुतम् ।
इत्युक्त्वा रामवद्वाचा पपात रुधिराशनः ॥१८॥

यन्नामाज्ञोऽपि मरणे स्मृत्वा तत्साम्यमाप्नुयात् ।
किमुताग्रे हरिं पश्यंस्तेनैव निहतोऽसुरः ॥१९॥

तद्देहादुत्थितं तेजः सर्वलोकस्य पश्यतः ।
राममेवाविशद्देवा विस्मयं परमं ययुः ॥२०॥

किं कर्म कृत्वा किं प्राप्तः पातकी मुनिहिंसकः ।
अथवा राघवस्यायं महिमा नात्र संशयः ॥२१॥

रामबाणेन संविद्धः पूर्वं राममनुस्मरन् ।
भयात्सर्वं परित्यज्य गृहवित्तादिकं च यत् ॥२२॥
हृदि रामं सदा ध्यात्वा निर्धूताशेषकल्मषः ।
अन्ते रामेण निहतः पश्यन् राममवाप सः ॥२३॥

द्विजो वा राक्षसो वाऽपि पापी वा धार्मिकोऽपि वा
त्यजन्कलेवरं रामं स्मृत्वा यान्ति परं पदम् ॥२४॥

इति तेऽन्योन्यमाभाष्य ततो देवा दिवं ययुः ।

रामस्तच्चिन्तयामास म्रियमाणोऽसुराधमः ॥२५॥
हा लक्ष्मणेति मद्वाक्यमनुकुर्वन्ममार किम् ।
श्रुत्वा मद्वाक्यसदृशं वाक्यं सीताऽपि किं भवेत् २६
इति चिन्तापरीतात्मा रामो दूरान्न्यवर्तत ।

सीता तद्भाषितं श्रुत्वा मारीचस्य दुरात्मनः ॥२७॥
भीताऽतिदुःखसंविग्ना लक्ष्मणं त्विदमब्रवीत् ।
गच्छ लक्ष्मण वेगेन भ्राता तेऽसुरपीडितः ॥२८॥


तब रामचन्द्रजीने यह निश्चयपूर्वक जानकर कि यह राक्षस ही है, उस मृगरूप राक्षसको एक बाण छोड़कर बींध डाला । बाणके लगते ही मारीच अपना पूर्वरूप धारणकर लोहू भरे मुखसे पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ १६-१७ ॥ वह रक्तपायी दैत्य रामकी-सी बोलीमें यह कहता हुआ कि 'हे महाबाहो लक्ष्मण ! मैं मारा गया; मेरी शीघ्र ही रक्षा करो' पृथिवीपर गिरा ॥१८॥

मरण-समयमें जिनके नामका स्मरण करनेसे अज्ञ-जन भी जिनके समान हो जाते हैं उन्हीं हरिंको देखते-देखते उन्हींके हाथसे मरे हुए उस राक्षसके विषयमें तो कहना ही क्या है ? ॥ १९ ॥ उसके शरीरसे निकला हुआ तेज सबके देखते-देखते श्रीराममें ही समा गया । यह देखकर देवताओंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥२०॥ वे कहने लगे—"अहो ! इस मुनिजनहिंसक पापी निशाचरने कैसे-कैसे कुकर्म किये और फिर कैसी शुभ गति प्राप्त की । निस्सन्देह यह श्रीरघुनाथजीकी ही महिमा है ॥ २१ ॥ रामके बाणसे बींधे जानेपर यह पहलेसे ही भयसे अपना सब गृह और धन आदि छोड़ें रामचन्द्रजीके स्मरणमें लगा हुआ था ॥ २२ ॥ निरन्तर रामका ध्यान करनेसे इसके सारे पाप नष्ट हो गये थे, तथा अन्तमें यह रामको देखते-देखते उन्हींके हाथसे मारा भी गया; इसलिये इसने रामहीको प्राप्त कर लिया ॥ २३ ॥ जो श्रीरामका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ते हैं, वे ब्राह्मण हों या राक्षस, पापी हों या धार्मिक—परम पदको ही प्राप्त होते हैं" ॥ २४ ॥ परस्पर इस प्रकार कहते हुए फिर देवगण स्वर्गको चले गये ।

तब रामचन्द्रजी सोचने लगे कि 'इस अधम राक्षसने मरते समय मेरी-सी बोलीमें 'हा लक्ष्मण !' कहकर प्राण क्यों छोड़े ? इन मेरे-से वाक्योंको सुनकर सीताकी क्या दशा होगी ?' ॥ २५-२६ ॥ इस प्रकार चिन्ता करते हुए राम बड़ी दूरसे लौटे ।

इधर सीताने दुरात्मा मारीचका वह शब्द सुनकर अत्यन्त भय और दुःखसे व्याकुल हो लक्ष्मणसे यों कहा—"लक्ष्मण ! तुम बहुत शीघ्र जाओ, तुम्हारे भाई राक्षसोंसे कष्ट पा रहे हैं ॥ २७-२८ ॥ क्या

१३२अध्यात्मरामायण[सर्ग ७

हा लक्ष्मणेति वचनं भ्रातुस्ते न शृणोषि किम् ।
तामाह लक्ष्मणो देवि रामवाक्यं न तद्भवेत् ॥ २९ ॥
यः कश्चिद्राक्षसो देवि म्रियमाणोऽब्रवीद्वचः ।
रामस्त्रैलोक्यमपि यः क्रुद्धो नाशयति क्षणात् ॥ ३० ॥
स कथं दीनवचनं भाषतेऽमरपूजितः ।
क्रुद्धा लक्ष्मणमालोक्य सीता वाष्पविलोचना ॥ ३१ ॥
प्राह लक्ष्मण दुर्बुद्धे भ्रातुर्व्यसनमिच्छसि ।
प्रेषितो भरतेनैव रामनाशाभिकाङ्क्षिणा ॥ ३२ ॥
मां नेतुमागतोऽसि त्वं रामनाशे उपस्थिते ।
न प्राप्स्यसे त्वं मामद्य पश्य प्राणांस्त्यजाम्यहम् ॥
न जानातीदृशं रामस्त्वां भार्याहरणोद्यतम् ।
रामादन्यं न स्पृशामि त्वां वा भरतमेव वा ॥ ३४ ॥

इत्युक्त्वा वध्यमाना सा स्वबाहुभ्यां रुरोद ह ।
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणः कर्णौ पिधायातीव दुःखितः ३५
मामेवं भाषसे चण्डि धिक् त्वां नाशमुपैष्यसि ।
इत्युक्त्वा वनदेवीभ्यः समर्प्य जनकात्मजाम् ॥ ३६ ॥
ययौ दुःखादतिसंविग्नो राममेव शनैः शनैः ।
ततोऽन्तरं समालोक्य रावणो भिक्षुवेषधृक् ॥ ३७ ॥
सीतासमीपमगमत्स्फुरद्दण्डकमण्डलुः ।
सीता तमवलोक्याशु नत्वा सम्पूज्य भक्तितः । ३८ ।
कन्दमूलफलादीनि दत्त्वा स्वागतमब्रवीत् ।
मुने भुङ्क्ष्व फलादीनि विश्रमस्व यथासुखम् ॥ ३९ ॥
इदानीमेव भर्ता मे ह्यागमिष्यति ते प्रियम् ।
करिष्यति विशेषेण तिष्ठ त्वं यदि रोचते ॥ ४० ॥


हिन्दी अनुवाद:

तुम अपने भाईका 'हा लक्ष्मण' यह वाक्य नहीं सुनते ?"

लक्ष्मणजीने कहा—"देवि ! यह वाक्य श्रीरामचन्द्रजीका नहीं है ॥ २९ ॥ किसी राक्षसने मरते-मरते ये वचन कहे हैं । जो रामजी क्रोधित होनेपर एक क्षणमें सम्पूर्ण त्रिलोकीको भी नष्ट कर सकते हैं ॥ ३० ॥ वे देववन्दित प्रभु भला ऐसा दीन-वचन कैसे बोल सकते हैं ?"

तब सीताजीने नेत्रोंमें जल भरकर क्रोधपूर्वक लक्ष्मणजीकी ओर देखते हुए कहा—"रे लक्ष्मण ! क्या तू अपने भाईको विपत्तिमें पड़े देखना चाहता है ? अरे दुर्बुद्धे ! मालूम होता है, तुझे रामका नाश चाहनेवाले भरतने ही भेजा है ॥ ३१-३२ ॥ क्या तू रामके नष्ट हो जानेपर मुझे ले जानेके लिये ही आया है, किन्तु तू मुझे पा न सकेगा । देख मैं अभी प्राण त्याग किये देती हूँ ॥ ३३ ॥ राम तुझे इस प्रकार स्त्रीहरणके लिये उद्यत नहीं जानते थे । रामके अतिरिक्त मैं भरत या तुझे किसीको भी नहीं छू सकती" ॥ ३४ ॥

ऐसा कहकर वे अपनी भुजाओंसे छाती पीटती हुई रोने लगीं । उनके ऐसे कठोर शब्द सुन लक्ष्मणजीने अति दुःखित हो अपने दोनों कान मूँद लिये और कहा—"हे चण्डि ! तुम्हें धिक्कार है, तुम मुझे ऐसी बातें कह रही हो ! इससे तुम नष्ट हो जाओगी ।" ऐसा कह लक्ष्मणजी सीताको वनदेवियोंको सौंपकर दुःखसे अत्यन्त खिन्न हो धीरे-धीरे रामके पास चले ।

इसी समय सूना देखकर रावण भिक्षुका वेष बना दण्ड-कमण्डलु घुमाता हुआ सीताके पास आया । सीताने उसे देखकर तुरन्त ही प्रणाम किया और भक्तिपूर्वक उसका पूजन कर कन्द-मूल-फल आदि देकर स्वागत करते हुए कहा—"हे मुने ! ये फल आदि पाकर सुखपूर्वक विश्राम कीजिये । अभी थोड़ी देरमें ही मेरे पतिदेव आते होंगे । यदि आपकी इच्छा हो तो कुछ देर ठहरिये । वे आपका कुछ विशेष सत्कार कर सकेंगे" ॥ ३५-४० ॥

सर्ग ७ ]अरण्यकाण्डे१३३
भिक्षुरुवाच<br>का त्वं कमलपत्राक्षि को वा भर्ता तवानघे ।<br>किमर्थमत्र ते वासो वने राक्षससेविते ।<br>ब्रूहि भद्रे ततः सर्वं स्ववृत्तान्तं निवेदये ॥४१॥भिक्षु बोला— हे कमलोचने ! तुम कौन हो ? तुम्हारे पति कौन हैं ? हे अनघे ! इस राक्षससेवित वनमें तुम क्यों रहती हो ? हे कल्याणि ! ये सब बातें बताओ, तब मैं भी तुम्हें अपना सारा वृत्तान्त सुनाऊँगा ॥४१॥
सीतोवाच<br>अयोध्याधिपतिः श्रीमान् राजा दशरथो महान् ।<br>तस्य ज्येष्ठः सुतो रामः सर्वलक्षणलक्षितः ॥४२॥<br>तस्याहं धर्मतः पत्नी सीता जनकनन्दिनी ।<br>तस्य भ्राता कनीयांश्च लक्ष्मणो भ्रातृवत्सलः ॥४३॥<br>पितुराज्ञां पुरस्कृत्य दण्डके वस्तुमागतः ।<br>चतुर्दश समास्त्वां तु ज्ञातुमिच्छामि मे वद ॥४४॥सीताजी बोलीं— हे भिक्षो ! श्रीमान् महाराज दशरथ अयोध्याके राजा थे, उनके ज्येष्ठ पुत्र सर्व-सुलक्षणसम्पन्न राम हैं ॥४२॥ मैं जनकनन्दिनी सीता उन्हींकी धर्मपत्नी हूँ । उनका छोटा भाई लक्ष्मण है । वह अपने भाईका अत्यन्त स्नेही है ॥४३॥ (हम दोनोंके साथ) श्रीरामचन्द्रजी पिताकी आज्ञासे चौदह वर्ष दण्डकारण्यमें रहनेके लिये आये हैं । अब मैं तुम्हारे विषयमें जानना चाहती हूँ, तुम भी मुझे अपना परिचय दो ॥४४॥
भिक्षुरुवाच<br>पौलस्त्यतनयोऽहं तु रावणो राक्षसाधिपः ।<br>त्वत्कामपरितप्तोऽहं त्वां नेतुं पुरमागतः ॥४५॥<br>मुनिवेषेण रामेण किं करिष्यसि मां भज ।<br>भुङ्क्ष्व भोगान्मया सार्धं त्यज दुःखं वनोद्भवम् ४६भिक्षु बोला— मैं पुलस्त्यनन्दन विश्रवाका पुत्र राक्षसराज रावण हूँ । मैं तुम्हें पानेकी इच्छासे सन्तप्त था; अतः इस समय तुम्हें ले जानेके लिये यहाँ आया हूँ ॥४५॥ उस मुनिवेषधारी रामसे तुम्हें क्या मिलेगा । तुम मुझसे प्रेम करो और इन वनवासके दुःखोंसे छूटकर मेरे साथ नाना प्रकारके भोग भोगो ॥४६॥
श्रुत्वा तद्वचनं सीता भीता किञ्चिदुवाच तम् ।<br>यद्येवं भाषसे मां त्वं नाशमेष्यसि राघवात् ॥४७॥<br>आगमिष्यति रामोऽपि क्षणं तिष्ठ सहानुजः ।<br>मां को धर्षयितुं शक्तो हरेर्भार्यां शशो यथा ॥४८॥<br>रामवाणैर्विभिन्नस्त्वं पतिष्यसि महीतले ।<br>इति सीताचचः श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥४९॥<br>स्वरूपं दर्शयामास महापर्वतसन्निभम् ।<br>दशास्यं विंशतिभुजं कालमेघसमद्युतिम् ॥५०॥<br>तद्दृष्ट्वा वनदेव्यश्च भूतानि च वितत्रसुः ।<br>ततो विदार्य धरणीं नखैरुद्धृत्य बाहुभिः ॥५१॥उसके ये वचन सुनकर सीताजीने कुछ डरते हुए उससे कहा—"यदि तू मुझसे ऐसी बात कहेगा तो रामचन्द्रजी तुझे नष्ट कर देंगे ॥४७॥ जरा ठहर तो, भाईके सहित श्रीरामचन्द्रजी अभी आते होंगे ! मेरे साथ कौन बलात्कार कर सकता है ? क्या सिंह-पत्नी-के साथ खरहा भी बलप्रयोग कर सकता है ? ॥४८॥ रामजीके बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर तू अभी पृथिवीतलपर सोवेगा।" सीताजीके ऐसे वचन सुनकर रावणने क्रोधाकुल हो अपना महापर्वताकार रूप दिख-लाया, जिसके दश मुख और बीस भुजाएँ थीं तथा जिसकी काले मेघके समान आभा थी ॥४९-५०॥ उस भयंकर रूपको देखकर वनदेवियाँ और वन्य जीव भयभीत हो गये। तब रावणने (सीताजीके पैरोंके नीचेकी) पृथिवीको नखोंसे खोदकर*उन्हें अपने हाथोंसे उठा लिया

* वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड सर्ग १३ में रावण कहता है कि एक बार मैंने पुञ्जिकस्थली नामकी अप्सराको आकाशमार्गसे ब्रह्माजीके पास जाते देखा । तब मैंने कामातुर हो उसे बलात्कारसे वस्त्रहीन कर उसके साथ सम्भोग किया । जब उसने यह बात ब्रह्माजीसे जाकर कही तो उन्होंने मुझे शाप दिया कि 'यदि तू आजसे किसी स्त्रीसे बलात्कार करेगा तो तेरे मस्तकके सौ टुकड़े हो जायँगे ।' मालूम होता है इस शापके भयसे ही रावणने सीताजीको स्पर्श नहीं किया । किन्हीं-किन्हींका मत है कि रावणको इसी प्रकारका शाप कुबेरपुत्र नलकूबरने दिया था ।