भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१२० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ५]


[चतुर्थ सर्ग (समाप्ति)]

संस्कृत: मद्भक्ताय प्रदातव्यमाहूयापि प्रयत्नतः ॥५३॥
य इदं तु पठेन्नित्यं श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
अज्ञानपटलध्वान्तं विधूयपरिमूच्यते ॥५४॥
भक्तानां मम योगिनां सुविमल-
    स्वान्तातिशान्तात्मनां
मत्सेवाभिरतात्मनां च विमल-
    ज्ञानात्मनां सर्वदा ।
सङ्गं यः कुरुते सदोद्यतमति-
    स्तत्सेवनानन्यधी-
र्मोक्षस्तस्य करे स्थितोऽहमर्निशं
    दृश्यो भवे नान्यथा ॥५५॥

हिन्दी अनुवाद:
इसे सावधानीपूर्वक न कहना चाहिये और मेरे भक्तोंको (इस प्रकारका मौका न लगे तो) प्रयत्नपूर्वक बुलाकर भी यह रहस्य सुनाना चाहिये ॥ ५३ ॥

जो पुरुष इसे श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सदैव पढ़ेगा वह अज्ञानान्धकार-रूप परदेको हटाकर मुक्त हो जायगा ॥ ५४ ॥

जो पुरुष मेरी सेवामें अनुरक्त-चित्त, निर्मल-हृदय, शान्तात्मा, विमलज्ञानसम्पन्न और मेरे परम भक्त योगिजनोंका संग अनन्य बुद्धिसे सर्वदा उनकी सेवामें तत्पर रहकर करता है, मुक्ति उसके सदैव करतलगत रहती है और मैं सर्वदा उसकी दृष्टिके सम्मुख विराजमान रहता हूँ । इसके अतिरिक्त और किसी उपायसे मेरा दर्शन नहीं हो सकता ॥ ५५ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अरण्यकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चम सर्ग

शूर्पणखाको दण्ड, खर आदि राक्षसोंका वध और शूर्पणखाका रावणके पास जाना ।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
तस्मिन् काले महारण्ये राक्षसी कामरूपिणी ।<br>विचचार महासत्त्वा जनस्थाननिवासिनी ॥१॥हे पार्वति ! उस समय उस घोर वनमें जनस्थानकी रहनेवाली एक महाबलवती इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली राक्षसी वृमा करती थी ॥ १ ॥
एकदा गौतमीतीरे पञ्चवट्याः समीपतः ।<br>पद्मवज्राङ्कुशाङ्कानि पदानि जगतीपतेः ॥२॥<br>दृष्ट्वा कामपरीतात्मा पादसौन्दर्यमोहिता ।<br>पश्यन्ती सा शनैरायाद्राघवस्य निवेशनम् ॥३॥एक दिन पञ्चवटीके पास गौतमी नदीके तीरपर जगत्पति श्रीरामचन्द्रजीके पद्म, वज्र और अंकुश आदिके चिह्नोंसे युक्त चरण-चिह्नोंको देखकर वह उनके सौन्दर्यसे मोहित होकर कामासक्त हुई उन्हें देखती-देखती धीरे-धीरे रघुनाथजीके आश्रममें चली आयी ॥ २-३ ॥
तत्र सा तं रमानाथं सीतया सह संस्थितम् ।<br>कन्दर्पसदृशं रामं दृष्ट्वा कामविमोहिता ॥४॥<br>राक्षसी राघवं प्राह कस्य त्वं कः किमाश्रमे ।<br>युक्तो जटावल्कलाद्यैः साध्यं किं तेऽत्र मे वद ॥५॥वहाँ आकर कामदेवके समान अति सुन्दर लक्ष्मीपति श्रीरामचन्द्रजीको सीताजीके साथ बैठे देखकर वह कामातुरा राक्षसी रघुनाथजीसे बोली— "तुम किसके पुत्र हो ? तुम्हारा क्या नाम है ? इस आश्रममें जटा-वल्कलादि धारण कर क्यों रहते हो ? यहाँ रहकर तुम क्या प्राप्त करना चाहते हो ? सो मुझे बताओ ॥ ४-५ ॥ मैं राक्षसराज महात्मा रावणकी...