अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ४ ] अरण्यकाण्ड १११
स्वप्रकाशेन देहादीन् भासयन्ननपावृतः ।
एक एवाद्वितीयश्च सत्यज्ञानादिलक्षणः ॥४१॥
असङ्गः स्वप्रभो द्रष्टा विज्ञानेनावगम्यते ।
आचार्यशास्त्रोपदेशादैक्यज्ञानं यदा भवेत् ॥४२॥
आत्मनोर्जीवपरयोर्मूलाविद्या तदैव हि ।
लीयते कार्यकारणैः सहैव परमात्मनि ॥४३॥
साऽवस्था मुक्तिरित्युक्ता ह्युपचारोऽयमात्मनि ।
इदं मोक्षस्वरूपं ते कथितं रघुनन्दन ॥४४॥
ज्ञानविज्ञानवैराग्यसहितं मे परात्मनः ।
किन्त्वेतद्दुर्लभं मन्ये मद्भक्तिविमुखात्मनाम् ॥४५॥
चक्षुष्मतामपि यथा रात्रौ सम्यङ् न दृश्यते ।
पदं दीपसमेतानां दृश्यते सम्यगेव हि ॥४६॥
एवं मद्भक्तियुक्तानामात्मा सम्यक् प्रकाशते ।
मद्भक्तेः कारणं किञ्चिद्वक्ष्यामि शृणु तत्त्वतः ॥४७॥
मद्भक्तसङ्गो मत्सेवा मद्भक्तानां निरन्तरम् ।
एकादश्युपवासादि मम पर्वानुमोदनम् ॥४८॥
मत्कथाश्रवणे पाठे व्याख्याने सर्वदा रतिः ।
मत्पूजापरिनिष्ठा च मम नामानुकीर्तनम् ॥४९॥
एवं सततयुक्तानां भक्तिरव्यभिचारिणी ।
मयि सञ्जायते नित्यं ततः किमवशिष्यते ॥५०॥
अतो मद्भक्तियुक्तस्य ज्ञानं विज्ञानमेव च ।
वैराग्यं च भवेच्छीघ्रं ततो मुक्तिमवाप्नुयात् ॥५१॥
कथितं सर्वमेतत्ते तव प्रश्नानुसारतः ।
अस्मिन्मनः समाधाय यस्तिष्ठेत्स तु मुक्तिभाक् ॥५२॥
न वक्तव्यमिदं यत्नान्मद्भक्तिविमुखाय हि ।
उपाधियोंको प्रकाशित करता हुआ भी स्वयं आवरण-शून्य, एक, अद्वितीय और सत्य ज्ञान आदि लक्षणोंवाला तथा संगरहित, स्वप्रकाश और सबका साक्षी है—ऐसा विज्ञानसे जाना जाता है। जिस समय मनुष्यको आचार्य और शास्त्रके उपदेशसे जीवात्मा और परमात्माकी एकताका ज्ञान होता है उसी समय मूला अविद्या अपने कार्य और साधनोंके सहित परमात्मामें लीन हो जाती है ॥ ४१-४३ ॥ अविद्याकी इस लयावस्थाको ही मोक्ष कहते हैं, आत्मामें यह (बन्ध और मोक्ष) केवल उपचारमात्र है (वास्तवमें आत्माकी बन्धावस्था और मुक्तावस्था नहीं है वह तो सदा ही मुक्त है) हे रघुनन्दन लक्ष्मण ! तुम्हें मैंने यह ज्ञान, विज्ञान और वैराग्यके सहित परमात्मारूप अपना मोक्षस्वरूप सुनाया । किन्तु जो लोग मेरी भक्तिसे विमुख हैं उनके लिये मैं इसे अत्यन्त दुर्लभ मानता हूँ ॥ ४४-४५ ॥
जिस प्रकार नेत्र होते हुए भी लोग रात्रिके समय अन्धकारमें भली प्रकार नहीं देख सकते, दीपक होनेपर ही उस समय मार्ग दिखायी देता है, उसी प्रकार मेरी भक्तिसे युक्त पुरुषोंको ही आत्माका सम्यक् साक्षात्कार होता है । अब मैं अपनी भक्तिके कुछ वास्तविक उपाय बताता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ ४६-४७ ॥
"मेरे भक्तका संग करना, निरन्तर मेरी और मेरे भक्तोंकी सेवा करना, एकादशी आदिका व्रत करना, मेरे पर्व दिनोंको मनाना ॥ ४८ ॥ मेरी कथाके सुनने, पढ़ने और उसकी व्याख्या करनेमें सदा प्रेम करना, मेरी पूजामें तत्पर रहना, मेरा नाम-कीर्तन करना" ॥ ४९ ॥ इस प्रकार जो निरन्तर मुझमें लगे रहते हैं उनकी मुझमें अविचल भक्ति हो जाती है। फिर बाकी ही क्या रहता है ? ॥ ५० ॥ अतः ( यह निश्चित बात है कि) मेरी भक्तिसे युक्त पुरुषको ज्ञान, विज्ञान और वैराग्य आदिकी शीघ्र प्राप्ति होती है और फिर वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ५१ ॥
इस प्रकार मैंने तुम्हारे प्रश्नानुसार यह सम्पूर्ण रहस्य तुम्हें सुना दिया । जो व्यक्ति अपने चित्तको इसमें समाहित करके रहता है वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ५२ ॥ अतः हे लक्ष्मण ! मेरी भक्तिसे विमुख पुरुषोंसे