भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ५]अरण्यकाण्ड१२१
अहं शूर्पणखा नाम राक्षसी कामरूपिणी ।<br>भगिनी राक्षसेन्द्रस्य रावणस्य महात्मनः ॥ ६ ॥<br>खरेण सहिता भ्रात्रा वसाम्यत्रैव कानने ।<br>राज्ञा दत्तं च मे सर्वं मुनिभक्षा वसाम्यहम् ॥ ७ ॥<br>त्वां तु वेदितुमिच्छामि वद मे वदतां वर ।<br>तामाह रामनामाहमयोध्याधिपतेः सुतः ॥ ८ ॥<br>एषा मे सुन्दरी भार्या सीता जनकनन्दिनी ।<br>स तु भ्राता कनीयान्मे लक्ष्मणोऽतीव सुन्दरः ॥ ९ ॥<br>किं कृत्यं ते मया ब्रूहि कार्यं भुवनसुन्दरि ।<br>इति रामवचः श्रुत्वा कामार्ता साऽब्रवीदिदम् ॥ १० ॥<br>एहि राम मया सार्धं रमस्व गिरिकानने ।<br>कामार्ताऽहं न शक्नोमि त्यक्तुं त्वां कमलेक्षणम् ॥ ११ ॥वहिन कामरूपिणी राक्षसी शूर्पणखा हूँ ॥ ६ ॥ मैं अपने भाई खरके साथ इसी वनमें रहती हूँ । राजाने मुझे इस सम्पूर्ण वनका अधिकार सौंप दिया है, अतः मैं मुनियोंको खाती हुई यहाँ रहती हूँ ॥ ७ ॥ हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ ! मैं तुम्हारे विषयमें जानना चाहती हूँ, अतः तुम मुझे अपना नाम-धाम आदि बताओ । तब भगवान्ने उससे कहा— "मैं अयोध्यापति राजा दशरथका राम नामक पुत्र हूँ ॥ ८ ॥ यह सुन्दरी मेरी भार्या जनकनन्दिनी सीता है तथा वह अति सुन्दर कुमार मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है ॥ ९ ॥ हे त्रिभुवनसुन्दरि ! बताओ, मैं तुम्हारा क्या कार्य करूँ ?" रामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर कामातुरा शूर्पणखा बोली—॥ १० ॥ "राम ! चलो (किसी) गिरि-गुहामें चलकर मेरे साथ रमण करो। इस समय मैं कामातुरा हूँ, अतः आप कमलनयनको छोड़ नहीं सकती" ॥ ११ ॥
रामः सीतां कटाक्षेण पश्यन् सस्मितमब्रवीत् ।<br>भार्या ममैषा कल्याणी विद्यते ह्यनपायिनी ॥ १२ ॥<br>त्वं तु सापत्न्यदुःखेन कथं स्थास्यसि सुन्दरि ।<br>बहिरास्ते मम भ्राता लक्ष्मणोऽतीव सुन्दरः ॥ १३ ॥<br>तवानुरूपो भविता पतिस्तेनैव सञ्चर ।<br>इत्युक्ता लक्ष्मणं प्राह पतिर्मे भव सुन्दर ॥ १४ ॥<br>भ्रातुराज्ञां पुरस्कृत्य सङ्गच्छाद्योऽद्य माचिरम् ।तब रामचन्द्रजीने नेत्रोंसे सीताजीकी ओर संकेत करके मुसकाकर कहा— "हे सुन्दरि ! मेरी तो यह मंगलमयी भार्या जीवित है ॥ १२ ॥ इसके रहते हुए तुम जन्मभर सौतकी डाहसे जलती हुई किस प्रकार सुखपूर्वक रह सकोगी ? बाहर मेरा अत्यन्त सुन्दर छोटा भाई लक्ष्मण विराजमान है ॥ १३ ॥ वह तुम्हारा योग्य पति होगा, तुम उसीके साथ (वन-पर्वतादिमें) विहार करो।" रामचन्द्रजीके इस प्रकार कहनेपर शूर्पणखाने लक्ष्मणजीसे जाकर कहा— "हे सुन्दर ! तुम मेरे पति हो जाओ ॥ १४ ॥ तथा अपने भाईकी आज्ञा मानकर चलो, आज हम और तुम परस्पर संगमन करें, देरी न करो।"
इत्याह राक्षसी घोरा लक्ष्मणं काममोहिता ॥ १५ ॥<br>तामाह लक्ष्मणः साध्वि दासोऽहं तस्य धीमतः ।<br>दासी भविष्यसि त्वं तु ततो दुःखतरं नु किम् ॥ १६ ॥<br>तमेव गच्छ भद्रं ते स तु राजाऽखिलेश्वरः ।<br>तच्छ्रुत्वा पुनरप्यागाद्राघवं दुष्टमानसा ॥ १७ ॥उस काममोहिता राक्षसीने जब लक्ष्मणजीसे इस प्रकार कहा ॥ १५ ॥ तो वे उससे बोले, "साध्वि ! मैं तो उन बुद्धिमान् भगवान् रामका दास हूँ । मुझे अपना पति बनानेसे तुम्हें भी उनकी दासी बनना पड़ेगा । तुम्हारे लिये इससे अधिक दुःखकी और क्या बात होगी ? ॥ १६ ॥ तुम्हारा कल्याण हो, तुम उन्हींके पास जाओ, वे महाराज सबके स्वामी हैं।" यह सुनकर वह दुष्टचित्ता राक्षसी फिर रघुनाथजीके पास आयी ॥ १७ ॥ और क्रोधपूर्वक
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