अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| १२२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ |
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| क्रोधाद्राम किमर्थं मां भ्रामयस्यानवस्थितः ।<br>इदानीमेव तां सीतां भक्षयामि तवाग्रतः ॥१८॥ | बोली—"हे राम ! तुम बड़े चञ्चलचित्त हो, मुझे क्यों इधर-उधर घुमा रहे हो ? मैं अभी तुम्हारे सामने ही इस सीताको खाये जाती हूँ" ॥१८॥ |
| इत्युक्त्वा विकटाकारा जानकीमनुधावति ।<br>ततो रामाज्ञया खड्गमादाय परिगृह्य ताम् ॥१९॥<br>चिच्छेद नासां कर्णौ च लक्ष्मणो लघुविक्रमः ।<br>ततो घोरध्वनिं कृत्वा रुधिराक्तवपुर्द्रुतम् ॥२०॥<br>क्रन्दमाना पपाताग्रे खरस्य परुषाक्षरा ।<br>किमेतदिति तामाह खरः खरतराक्षरः ॥२१॥<br>केनैवं कारितासि त्वं मृत्योर्वक्त्रानुवर्तिना ।<br>वद मे तं वधिष्यामि कालकल्पमपि क्षणात् ॥२२॥ | ऐसा कह वह विकट रूप धारण कर जानकीजीकी ओर दौड़ी। तब लक्ष्मणजीने रामचन्द्रजीकी आज्ञासे उसे पकड़कर बड़ी फुर्तीसे खड्ग लेकर उसके नाक-कान काट डाले। तदनन्तर वह घोर शब्द करती हुई रुधिरमें लथपथ हो बड़ी शीघ्रतासे जाकर गिरी और कठोर शब्द करती खरके सामने गिर पड़ी। उसे देखकर तीक्ष्ण ध्वनिवाले खरने कहा—"यह क्या बात है ॥१९-२१॥ अरी, मृत्युके मुखमें जानेवाले किस दुष्टने तेरी यह दशा की है ? तू बतला तो सही, वह कालके समान भी बली क्यों न हो, मैं उसे क्षणभरमें ही मार डालूँगा" ॥२२॥ |
| तमाह राक्षसी रामः सीतालक्ष्मणसंयुतः ।<br>दण्डकं निर्भयं कुर्वन्नास्ते गोदावरीतटे ॥२३॥<br>मामेवं कृतवांस्तस्य भ्राता तेनैव चोदितः ।<br>यदि त्वं कुलजातोऽसि वीरोऽसि जहि तौ रिपू ॥२४॥<br>तयोस्तु रुधिरं पास्ये भक्षयैतौ सुदुर्मदौ ।<br>नो चेत्प्राणान्परित्यज्य यास्यामि यमसादनम् ॥२५॥ | तब राक्षसी शूर्पणखाने उससे कहा—"यहाँ सीता और लक्ष्मणके सहित राम दण्डकारण्यको निर्भय करता हुआ गोदावरीके तटपर रहता है ॥२३॥ उसीकी प्रेरणासे उसके भाई लक्ष्मणने मेरी यह गति की है। यदि तुम बड़े कुलीन और वीर हो तो उन दोनों शत्रुओंको मार डालो ॥२४॥ तुम उन दोनों मदोन्मत्तोंको खा जाओ और मैं उन दोनोंका रुधिर पीऊँगी। नहीं तो अपने प्राणोंको छोड़कर यमलोकको चली जाऊँगी" ॥२५॥ |
| तच्छ्रुत्वा त्वरितं प्रागात्खरः क्रोधेन मूर्च्छितः ।<br>चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम् ॥२६॥<br>चोदयामास रामस्य समीपं वधकाङ्क्षया ।<br>खरश्च त्रिशिराश्चैव दूषणश्चैव राक्षसः ॥२७॥<br>सर्वे रामं ययुः शीघ्रं नानाप्रहरणोद्यताः ।<br>श्रुत्वा कोलाहलं तेषां रामः सौमित्रिमब्रवीत् ॥२८॥ | शूर्पणखाका यह कथन सुनकर खर क्रोधसे अधीर हो तुरन्त (युद्धके लिये) चला और रामको मारनेके लिये उसने बड़े पराक्रमी चौदह सहस्र राक्षस उनके पास भेजे। राक्षसराज खर, दूषण और त्रिशिरा—ये सभी नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर रामके पास आये। उनका कोलाहल सुन श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा—॥२६-२८॥ |
| श्रूयते विपुलः शब्दो नूनमायान्ति राक्षसाः ।<br>भविष्यति महद्युद्धं नूनमद्य मया सह ॥२९॥<br>सीतां नीत्वा गुहां गत्वा तत्र तिष्ठ महाबल ।<br>हन्तुमिच्छाम्यहं सर्वान् राक्षसान् घोररूपिणः ॥३०॥ | "लक्ष्मण ! देखो, बड़ा कोलाहल सुनायी पड़ रहा है, मालूम होता है निश्चय ही राक्षसगण आ रहे हैं; अवश्य ही आज मेरे साथ उनका घोर युद्ध होगा ॥२९॥ अतः हे महाबल ! तुम सीताको लेकर किसी पर्वतकी कन्दरामें चले जाओ। आज मैं इन समस्त घोररूप राक्षसोंका वध करना चाहता हूँ ॥३०॥ |