अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग ४ ] अरण्यकाण्डे ११७
| स्नानं कुर्वन्त्यनुदिनं त्रयस्ते गौतमीजले ।<br>उभयोर्मध्यगा सीता कुरुते च गमागमौ ॥ १४ ॥ | तीनों ही नित्यप्रति गौतमीमें स्नान किया करते थे । उस समय सीताजी उन दोनोंके बीचमें रहकर आया-जाया करती थीं ॥ १४ ॥ |
| आनीय सलिलं नित्यं लक्ष्मणः प्रीतमानसः ।<br>सेवृतेऽहरहः प्रीत्या एवमासन् सुखं त्रयः ॥ १५ ॥ | लक्ष्मणजी प्रसन्नचित्तसे नित्यप्रति जल लाकर भक्तिपूर्वक उनकी सेवा किया करते थे। इस प्रकार वे तीनों वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥ १५॥ |
| एकदा लक्ष्मणो राममेकान्ते समुपास्थितम् ।<br>विनयावनतो भूत्वा पप्रच्छ परमेश्वरम् ॥ १६ ॥ | एक दिन लक्ष्मणजीने एकान्तमें बैठे हुए परमात्मा श्रीरामके पास जाकर नम्रतापूर्वक पूछा-॥ १६ ॥ |
| भगवन् श्रोतुमिच्छामि मोक्षस्यैकान्तिकीं गतिम् ।<br>त्वत्तः कमलपत्राक्ष सङ्क्षेपाद्वक्तुमर्हसि ॥ १७ ॥ | "भगवन् ! मैं आपके मुखारविन्दसे मोक्षका अन्यभिचारी निश्चित साधन सुनना चाहता हूँ; अतः हे कमलनयन ! आप उसका संक्षेपसे वर्णन कीजिये ॥ १७ ॥ |
| ज्ञानं विज्ञानसहितं भक्तिवैराग्यवृंहितम् ।<br>आचक्ष्व मे रघुश्रेष्ठ वक्ता नान्योऽस्ति भूतले ॥ १८ ॥ | हे रघुश्रेष्ठ ! आप मुझे भक्ति और वैराग्यसे सना हुआ विज्ञानयुक्त ज्ञान सुनाइये; संसारमें आपके अतिरिक्त इस विषयका सुनानेवाला और कोई नहीं है ॥" ॥ १८॥ |
| श्रीराम उवाच | श्रीरामजी बोले— |
| शृणु वक्ष्यामि ते वत्स गुह्याद्गुह्यतरं परम् ।<br>यद्विज्ञाय नरो जहात्सद्यो वैकल्पिकं भ्रमम् ॥ १९ ॥ | वत्स ! सुन, मैं तुझे गुह्यसे भी गुह्य परम रहस्य सुनाता हूँ जिसके जान लेनेपर मनुष्य तुरन्त ही विकल्पजनित ( संसाररूप ) भ्रमसे मुक्त हो जाता है ॥ १९ ॥ |
| आदौ मायास्वरूपं ते वक्ष्यामि तदनन्तरम् ।<br>ज्ञानस्य साधनं पश्चाज्ज्ञानं विज्ञानसंयुतम् ॥ २० ॥ | प्रथम मैं तुमसे मायाका स्वरूप कहूँगा, तत्पश्चात् ज्ञानका साधन बताऊँगा और फिर विज्ञानके सहित ज्ञानका वर्णन करूँगा ॥ २० ॥ |
| ज्ञेयं च परमात्मानं यज्ज्ञात्वा मुच्यते भयात् ।<br>अनात्मनि शरीरादावात्मबुद्धिस्तु या भवेत् ॥ २१ ॥ | इनके अतिरिक्त ज्ञेय परमात्माका भी स्वरूप बतलाऊँगा जिसके जान लेनेपर मनुष्य संसार-भयसे मुक्त हो जाता है । शरीरादि अनात्मपदार्थोंमें जो आत्मबुद्धि होती है उसीको माया कहते हैं । |
| सैव माया तयैवासौ संसारः परिकल्प्यते ।<br>रूपे द्वे निश्चिते पूर्वं मायायाः कुलन्दन ॥ २२ ॥ | उसीके द्वारा इस संसारकी कल्पना हुई है । हे कुलन्दन ! मायाके पहले-पहल दो रूप माने गये हैं ॥ २१-२२ ॥ |
| विक्षेपावरणे तत्र प्रथमं कल्पयेज्जगत् ।<br>लिङ्गाद्यद्ब्रह्मपर्यन्तं स्थूलसूक्ष्मविभेदतः ॥ २३ ॥ | एक विक्षेप, दूसरा आवरण। इनमेंसे पहली विक्षेप-शक्ति ही महत्तत्त्वसे लेकर ब्रह्मातक समस्त संसारकी स्थूल और सूक्ष्म भेदसे कल्पना करती है ॥ २३ ॥ |
| अपरं त्वखिलं ज्ञानरूपमावृत्य तिष्ठति ।<br>मायया कल्पितं विश्वं परमात्मनि केवले ॥ २४ ॥ | और दूसरी आवरण-शक्ति सम्पूर्ण ज्ञानको आवरण करके स्थित रहती है । यह सम्पूर्ण विश्व रज्जुमें सर्प-भ्रमके समान शुद्ध परमात्मामें मायासे कल्पित है; विचार करनेपर यह कुछ भी नहीं ठहरता । |
| रज्जौ भुजङ्गवद् भ्रान्त्या विचारे नास्ति किञ्चन ।<br>श्रूयते दृश्यते यद्यत्स्मर्यते वा नरैः सदा ॥ २५ ॥ | मनुष्य जो कुछ सर्वदा सुनते, देखते और स्मरण करते हैं, वह सब स्वप्न और मनोरथोंके समान असत्य हैं। |
| असदेव हि तत्सर्वं यथा स्वप्नमनोरथौ ।<br>देह एव हि संसारवृक्षमूलं दृढं स्मृतम् ॥ २६ ॥ | शरीर ही इस संसाररूप वृक्षकी दृढ़ मूल है ॥ २४-२६ ॥ उसीके कारण पुत्र- |