अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १२८ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ६ |
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तद्भवानपि विमुच्य चाग्रहं
राघवं प्रति गृहं प्रयाहि भोः ॥२४॥
रक्ष राक्षसकुलं चिरागतं
तत्स्मृतौ सकलमेव नश्यति।
तव हितं वदतो मम भाषितं
परिगृहाण परात्मनि राघवे ॥२५॥
त्यज विरोधमतिं भज भक्तितः
परमकारुणिको रघुनन्दनः।
अहमशेषमिदं मुनिवाक्यतो-
ऽशृणवमादियुगे परमेश्वरः ॥२६॥
ब्रह्मणाऽर्थित उवाच तं हरिः
किं तवेप्सितमहं करवाणि तत्।
ब्रह्मणोक्तमरविन्दलोचन
त्वं प्रयाहि भुवि मानुषं वपुः।
दशरथात्मजभावमञ्जसा
जहि रिपुं दशकन्धरं हरे ॥२७॥
अतो न मानुषो रामः साक्षान्नारायणोऽव्ययः।
मायामानुषवेषेण वनं यातोऽतिनिर्भयः ॥२८॥
भूभारहरणार्थाय गच्छ तात गृहं सुखम्।
श्रुत्वा मारीचवचनं रावणः प्रत्यभाषत ॥२९॥
परमात्मा यदा रामः प्रार्थितो ब्रह्मणा किल।
मां हन्तुं मानुषो भूत्वा यत्नादिह समागतः ॥३०॥
करिष्यत्यचिरादेव सत्यसङ्कल्प ईश्वरः।
अतोऽहं यत्नतः सीतामानेष्याम्येव राघवात् ॥३१॥
वधे प्राप्ते रणे वीर प्राप्स्यामि परमं पदम्।
यद्वा रामं रणे हत्वा सीतां प्राप्स्यामि निर्भयः ॥३२॥
तदुत्तिष्ठ महाभाग विचित्रमृगरूपधृक्।
रामं सलक्ष्मणं शीघ्रमाश्रमादतिदूरतः ॥३३॥
आक्रम्य गच्छ त्वं शीघ्रं सुखं तिष्ठ यथा पुरा।
अतः परं चेद्यत्किञ्चिद्व्यापसे माद्विभीषणम् ॥३४॥
हनिष्याम्यसिनाऽनेन त्वामत्रैव न संशयः। | श्रीरामघवसे हठ छोड़कर अपने घर चले जाओ ॥ २४ ॥ और चिरकालसे बढ़े हुए अपने राक्षस-वंशकी रक्षा करो। श्रीरामचन्द्रजीसे बैर न करो, उनका तो (वैर-भावसे) स्मरण करनेसे भी सर्वस्व नष्ट हो जाता है। मैं तुम्हारे हितके लिये जो कुछ कहता हूँ वह मानो। तुम परमात्मा श्रीरघुनाथजीसे विरोध-बुद्धि छोड़ दो और भक्तिभावसे उनका भजन करो, क्योंकि श्रीरामचन्द्र-जी बड़े दयालु हैं। मैंने मुनीश्वरोंके मुखसे ये सभी बातें सुनी हैं कि सत्ययुगमें ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर परमात्मा श्रीहरिने कहा था कि तुम अपना मनोरथ बताओ, मैं उसे पूर्ण करूँगा। तब ब्रह्माजीने भगवान्से कहा—"हे कमललोचन हरे! आप मनुष्य-रूपसे पृथिवीमें अवतार लीजिये और शीघ्र ही दशरथ-नन्दन श्रीराम होकर देवद्रोही दशाननका वध कीजिये ॥२५-२७॥ अतः तुम निश्चय मानो, राम मनुष्य नहीं हैं; वे साक्षात् अव्ययपुरुष श्रीनारायण हैं, मायासे मनुष्यरूप होकर वे निर्भयतापूर्वक पृथिवीका भार उतारनेके लिये वनमें आये हैं। अतः हे तात! तुम सुखपूर्वक घर लौट जाओ।"<br><br>मारीचके ये वचन सुनकर रावण बोला—॥२८-२९॥ “यदि ब्रह्माकी प्रार्थनासे परमात्मा ही राम होकर मनुष्यरूपसे मुझे प्रयत्नपूर्वक मारनेके लिये यहाँ आये हैं, तो वे शीघ्र ही अवश्य वैसा ही करेंगे, क्योंकि ईश्वर सत्य-संकल्प हैं। इसलिये मैं अवश्य यत्नपूर्वक रघुनाथ-जीके पाससे सीताको ले आऊँगा ॥ ३०-३१॥ हे वीर! यदि मैं युद्धमें उनके हाथसे मारा गया तो परमपद प्राप्त करूँगा और यदि मैंने ही रामको रणक्षेत्रमें मार डाला तो निर्भयतापूर्वक सीताको पाऊँगा ॥ ३२ ॥ अतः हे महाभाग! उठो और शीघ्र ही विचित्र मृगरूप धारण कर राम और लक्ष्मणको आश्रमसे अति दूर ले जाओ, फिर पूर्ववत् अपने आश्रममें आकर सुखपूर्वक रहो। यदि मुझे भयभीत करनेके लिये अब और कुछ कहोगे तो निश्चय मानो, मैं अभी इसी खड्गसे तुम्हें यहीं मार डालूँगा।"