अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
पृष्ठ 152, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ७ ] अरण्यकाण्ड [ १२९
| मारीचस्तद्वचः श्रुत्वा स्वात्मन्येवान्वचिन्तयत् ।३५। <br><br> यदि मां राघवो हन्यात्तदा मुक्तो भवार्णवात्। <br> मां हन्याद्यदि चेद्दुष्टस्तदा मे निरयो ध्रुवम् ॥३६॥ <br><br> इति निश्चित्य मरणं रामादुत्थाय वेगतः। <br> ऽब्रवीद्रावणं राजन्करोम्याज्ञां तव प्रभो ॥३७॥ <br><br> इत्युक्त्वा रथमास्थाय गतो रामाश्रमं प्रति। <br> शुद्धजाम्बूनदप्रख्यो मृगोऽभूद्रौप्यविन्दुकः॥३८॥ <br> रत्नशृङ्गो मणिखुरो नीलरत्नविलोचनः। <br> विद्युत्प्रभो विमुग्धास्यो विचचार वनान्तरे ॥३९॥ <br> रामाश्रमपदस्यान्ते सीतादृष्टिपथे चरन् ॥४०॥ <br><br> क्षणं च धावत्यवतिष्ठते क्षणं <br> समीपमागत्य पुनर्भयावृतः। <br> एवं स मायामृगवेषरूपधृक् <br> चचार सीतां परिमोहयन्खलः ॥४१॥ | उसका यह कथन सुनकर मारीचने मन-ही-मन सोचा— ॥३३-३५॥ 'यदि श्रीरघुनाथजीने मुझे मारा तो मैं संसार-सागरसे पार हो जाऊँगा और जो कहीं इस दुष्टने मुझे मार दिया तो निश्चय ही मुझे नरकमें पड़ना होगा' ॥ ३६ ॥ इस प्रकार श्रीरामके हाथसे ही अपना मरना निश्चय कर वह शीघ्रतासे उठा और रावणसे बोला—"हे राजन् ! हे प्रभो ! मैं आपकी आज्ञा पालन करूँगा" ॥ ३७ ॥ <br><br> ऐसा कह वह (रावणके) रथपर चढ़कर श्रीरामचन्द्रके आश्रममें आया और चाँदीकी बूँदोंके सहित शुद्ध सुवर्ण-वर्ण विचित्र मृग-रूप धारण किया ॥ ३८ ॥ उसके सींग रत्नमय, खुर मणिमय और नेत्र नीलरत्नमय थे। इस प्रकार बिजलीकी-सी छटा और मनोहर मुखवाला वह मृग रामचन्द्रजीके आश्रमके पास सीताजीके सामने वनमें विचरने लगा ॥ ३९-४० ॥ किसी क्षण तो वह चौकड़ी मारने लगता और कभी पास आकर भयसे ठिठक जाता। इस प्रकार वह दुष्ट मायामृगरूप धारणकर सीताजीको मोहित करता हुआ घूमने लगा ॥ ४१ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
सप्तम सर्ग
मारीचवध और सीताहरण।
| श्रीमहादेव उवाच <br><br> अथ रामोऽपि तत्सर्वं ज्ञात्वा रावणचेष्टितम्। <br> उवाच सीतामेकान्ते शृणु जानकि मे वचः ॥ १ ॥ <br> रावणो भिक्षुरूपेण आगमिष्यति तेऽन्तिकम्। <br> त्वं तु छायां त्वदाकारां स्थापयित्वोटजे विश ॥२॥ <br> अग्नावदृश्यरूपेण वर्षं तिष्ठ ममाज्ञया। <br> रावणस्य वधान्ते मां पूर्ववत्प्राप्स्यसे शुभे ॥ ३ ॥ <br> श्रुत्वा रामोदितं वाक्यं सापि तत्र तथाकरोत्। | श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! इधर श्रीरामचन्द्रजीने भी रावणका सारा षड्यन्त्र जानकर एकान्तमें श्रीजानकीजीसे कहा—"हे सीते ! मैं जो कुछ कहता हूँ वह सुनो ॥ १ ॥ हे शुभे ! रावण तुम्हारे पास भिक्षुका रूप धारण कर आयेगा, अतः तुम अपने ही समान आकृतिवाली अपनी छायाको कुटीमें छोड़कर अग्निमें प्रवेश कर जाओ, और मेरी आज्ञासे वहाँ अदृश्यरूपसे एक वर्ष रहो। तदनन्तर, रावणके मारे जानेपर तुम मुझे पूर्ववत् पा लोगी" ॥ २-३ ॥ रामचन्द्रजीके वचन सुनकर सीताजीने भी वैसा ही किया। |
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