भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

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सर्ग ८ ]अरण्यकाण्ड१३९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उपरमपरं परात्मभूतं<br>सततमहं प्रणतोऽस्मि रामचन्द्रम् ॥४४॥श्रीरामचन्द्रजीकी मैं निरन्तर वन्दना करता हूँ ॥ ४४ ॥
निरवधिसुखमिन्दिराकटाक्षं<br>क्षपितसुरेन्द्रचतुर्मुखादिदुःखम् ।<br>नरवरमनिशं नतोऽस्मि रामं<br>वरदमहं वरचापबाणहस्तम् ॥४५॥जो असीम आनन्दमय और श्रीकमलादेवीके कटाक्षके आश्रय हैं तथा जो ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवगणोंका दुःख दूर करनेवाले हैं उन धनुष-बाणधारी वरदायक नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ ४५ ॥
त्रिभुवनकमनीयरूपमीड्यं<br>रविशतभासुरमीहितप्रदानम् ।<br>शरणदमनिशं सुरागमूले<br>कृतनिलयं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥४६॥जो त्रिलोकीमें सबसे अधिक रूपवान् हैं, सबके स्तुत्य हैं, सैकड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी हैं तथा वाञ्छित फल देनेवाले हैं उन शरणप्रद और रागाश्रित हृदयमें रहनेवाले श्रीरघुनाथजीको मैं अहर्निश प्रणाम करता हूँ ॥ ४६ ॥
भवविपिनदवाग्निनामधेयं<br>भवमुखदैवतदैवतं दयालुम् ।<br>दनुजपतिसहस्रकोटिनाशं<br>रवितनयासदृशं हरिं प्रपद्ये ॥४७॥जिनका नाम संसाररूप वनके लिये दावानलके समान है, जो महादेव आदि देवताओंके भी पूज्य देव हैं तथा जो करोड़ों दानवेन्द्रोंका दलन करनेवाले और श्रीयमुनाजीके समान श्यामवर्ण हैं उन दयामय श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ ॥४७॥
अविरतभवभावनातिदूरं<br>भवविमुखैर्मुनिभिः सदैव दृश्यम् ।<br>भवजलधिसुतारणाङ्घ्रिपोतं<br>शरणमहं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥४८॥जो संसारमें निरन्तर वासना रखनेवालोंसे अत्यन्त दूर हैं और संसारसे उपराम मुनिजनोंके सदैव दृष्टिगोचर रहते हैं तथा जिनके चरणरूप पोत (जहाज) संसारसागरसे पार करनेवाले हैं उन रघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४८ ॥
गिरिशगिरिसुतामनोनिवासं<br>गिरिवरधारिणमीहिताभिरामम् ।<br>सुरवरदनुजेन्द्रसेविताङ्घ्रिं<br>सुरवरदं रघुनायकं प्रपद्ये ॥४९॥जो श्रीमहादेव और पार्वतीजीके मन-मन्दिरमें निवास करते हैं, जिनकी लीलाएँ अति मनोहारिणी हैं तथा देव और असुरपतिगण जिनके चरण-कमलोंकी सेवा करते हैं उन गिरिवरधारी सुरवरदायक रघुनायककी मैं शरण लेता हूँ ॥ ४९ ॥
परधनपरदारवर्जितानां<br>परगुणभूतिषु तुष्टमानसानाम् ।<br>परहितनिरतात्मनां सुसेव्यं<br>रघुवरमम्बुजलोचनं प्रपद्ये ॥५०॥जो परधन और परस्त्रीसे सदा दूर रहते हैं तथा पराये गुण और परायी विभूतिको देखकर प्रसन्न होते हैं उन निरन्तर परोपकार-परायण महात्माओंसे सुसेवित कमलनयन श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ५० ॥
स्मितरुचिरविकासिताननाब्ज-<br>मतिसुलभं सुरराजनीलनीलम् ।<br>सितजलरुहचारुनेत्रशोभं<br>रघुपतिमीशगुरोर्गुरुं प्रपद्ये ॥५१॥जिनका मुखकमल मनोहर मुसकानसे सुशोभित हो रहा है, जो भक्तोंके लिये अति सुलभ हैं, जिनके शरीरकी कान्ति इन्द्रनीलमणिके समान सुन्दर नीलवर्ण है; तथा जिनके मनोहर नेत्र श्वेत कमलकी-सी शोभावाले हैं उन महादेवजीके परम गुरु श्रीरघुनाथजीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ५१ ॥
हरिकमलजशम्भुरूपभेदा-<br>त्त्वमिह विभासि गुणत्रयानुवृत्तः ।हे प्रभो ! जलसे भरे हुए पात्रोंमें जैसे एक ही सूर्य प्रतिबिम्बित होता है वैसे ही सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणोंकी वृत्तिके कारण
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