अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग ९ ] अरण्यकाण्ड १४१
| शिरःपादविहीनोऽयं यस्य वक्षसि चाननम् ॥ ५ ॥<br>बाहुभ्यां लभ्यते यद्यत्तत्तद्भक्षन् स्थितो ध्रुवम् ।<br>आवामप्येतयोर्बाह्वोर्मध्ये सङ्कलितौ ध्रुवम् ॥ ६ ॥<br>गन्तुमन्यत्र मार्गो न दृश्यते रघुनन्दन ।<br>किं कर्तव्यमितोऽस्माभिरिदानीं भक्षयेत्स नौ ॥७॥<br>लक्ष्मणस्तमुवाचेदं किं विचारेण राघव ।<br>आवामेकैकमन्यग्रौ छिन्द्यावास्य भुजौ ध्रुवम् ॥८॥<br>तथेति रामः खड्गेन भुजं दक्षिणमाच्छिनत् ।<br>तथैव लक्ष्मणो वामं चिच्छेद भुजमञ्जसा ॥ ९ ॥<br>ततोऽतिविस्मितो दैत्यः कौ युवां सुरपुङ्गवौ ।<br>मद्वाहुच्छेदकौ लोके दिवि देवेषु वा कुतः ॥१०॥ | इस राक्षसको देखो; यह शिर-पैरसे रहित है और इसकी छातीमें ही मुँह है ॥ ५ ॥ अपनी भुजाओंसे ही इसे जो कुछ मिल जाता है उसीको खाकर यह जीवित रहता है। हम भी निश्चय ही इसकी भुजाओंके बीचमें फँस गये हैं ॥ ६ ॥ हे रघुनन्दन ! इनके चंगुलमेंसे निकलनेका हमें कोई मार्ग दिखायी नहीं देता; अब हमें क्या करना चाहिये ? (जल्दी विचार करो नहीं तो) यह हमें अभी खा जायगा" ॥ ७ ॥<br>लक्ष्मणजीने कहा—"हे राघव ! इसमें अधिक विचारनेकी क्या बात है ? हम दोनों सावधान होकर अभी इसकी एक-एक भुजा काट डालें" ॥ ८ ॥ रामचन्द्रजीने कहा 'बहुत ठीक', और खड्ग निकालकर उसकी दायीं भुजा काट डाली। वैसे ही लक्ष्मणजीने भी तुरन्त ही उसकी बायीं भुजा उड़ा दी ॥ ९ ॥<br>तब उस दैत्यराजने अति विस्मयपूर्वक कहा—"मेरी भुजाओंको काटनेवाले तुम कौन देवश्रेष्ठ हो ? इस लोकमें अथवा स्वर्गवासी देवताओंमें भी कोई ऐसा (समर्थ) होना सम्भव नहीं" ॥ १० ॥ |
| ततोऽब्रवीद्धसन्नेव रामो राजीवलोचनः ।<br>अयोध्याधिपतिः श्रीमान् राजा दशरथो महान् ११<br>रामोऽहं तस्य पुत्रोऽसौ भ्राता मे लक्ष्मणः सुधीः ।<br>मम भार्या जनकजा सीता त्रैलोक्यसुन्दरी ॥१२॥<br>आवां मृगयया यातौ तदा केनापि रक्षसा ।<br>नीतां सीतां विचिन्वन्तौ चागतौ घोरकानने ॥१३॥<br>बाहुभ्यां वेष्टितावत्र तव प्राणरिरक्षया ।<br>छिन्नौ तव भुजौ त्वं च को वा विकटरूपधृक् ॥१४॥ | इसपर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीने हँसते हुए कहा—"श्रीमान् महाराज दशरथ अयोध्याके स्वामी थे ॥ ११ ॥ मैं उन्हींका पुत्र 'राम' हूँ और यह बुद्धिमान् मेरा छोटा भाई 'लक्ष्मण' है तथा त्रैलोक्यसुन्दरी जनकनन्दिनी सीता मेरी भार्या है ॥ १२ ॥ हम मृगया (शिकार) के लिये बाहर गये हुए थे कि किसी राक्षसने सीताको चुरा लिया, उसीको ढूँढ़ते हुए हम यहाँ इस घोर वनमें आ गये। इतनेहीमें तुमने हमें अपनी भुजाओंसे घेर लिया। तब हमने अपने प्राण बचानेके लिये तुम्हारी भुजाएँ काट डालीं। अब यह बताओ—ऐसे विकट रूपवाले तुम कौन हो ? ॥ १३-१४ ॥ |
| कबन्व उवाच<br>धन्योऽहं यदि रामस्त्वमागतोऽसि ममान्तिकम् ।<br>पुरा गन्धर्वराजोऽहं रूपयौवनदर्पितः ॥१५॥<br>विचरँल्लोकमखिलं वरनारीमनोहरः । | कबन्धनें कहा—"हे राम ! यदि आज आप स्वयं मेरे पास आये हैं तो मैं धन्य हूँ। पूर्वकालमें मैं रूप और यौवनके मदसे उन्मत्त एक गन्धर्वराज था ॥ १५ ॥ हे रघुकुलश्रेष्ठ ! मैंने तपस्याद्वारा ब्रह्माजीसे अवध्यता (किसीसे भी न मारे जा सकनेकी योग्यता) प्राप्त कर ली थी और मैं अपनी रूपकान्तिसे सुन्दर |