भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१४२अध्यात्मरामायण[सर्ग ९

तपसा ब्रह्मणो लब्धमवध्यत्वं रघूत्तम ॥१६॥
अष्टावक्रं मुनिं दृष्ट्वा कदाचिदहसं पुरा ।
क्रुद्धोऽसावाह दुष्ट त्वं राक्षसो भव दुर्मते ॥१७॥
अष्टावक्रः पुनः प्राह वन्दितो मे दयापरः ।
शापस्यान्तं च मे प्राह तपसा द्योतितप्रभः ॥१८॥
त्रेतायुगे दाशरथिर्भूत्वा नारायणः स्वयम् ।
आगमिष्यति ते वाहू च्छेद्येते योजनायतौ ॥१९॥
तेन शापाद्विनिर्मुक्तो भविष्यसि यथा पुरा ।
इति शप्तोऽहमद्राक्षं राक्षसीं तनुमात्मनः॥२०॥
कदाचिद्देवराजानमभ्याद्रवमहं रुषा ।
सोऽपि वज्रेण मां राम शिरोदेशेऽभ्यताडयत् ॥२१॥
तदा शिरो गतं कुक्षिं पादौ च रघुनन्दन ।
ब्रह्मदत्तवरान्मृत्युर्नाभून्मे वज्रताडनात् ॥२२॥
मुखाभावे कथं जीवेदियमित्ममराधिपम् ।
ऊचुः सर्वे दयाविष्टा मां विलोक्यास्यवर्जितम् २३
ततो मां प्राह मघवा जठरे ते मुखं भवेत् ।
वाहू ते योजनायामौ भविष्यत इतो व्रज ॥२४॥
इत्युक्तोऽत्र वसन्नित्यं बाहुभ्यां वनगोचरान् ।
भक्षयाम्यधुना वाहू खण्डितौ मे त्वयाऽनघ ॥२५॥
इतःपरं मां श्वभ्रास्ये निक्षिप्याग्नीन्धनावृते ।
अग्निना दह्यमानोऽहं त्वया रघुकुलोत्तम ॥२६॥
पूर्वरूपमनुप्राप्य भार्यामार्गं वदामि ते ।
इत्युक्ते लक्ष्मणेनाशु श्वभ्रं निर्माय तत्र तम् ॥२७॥
निक्षिप्य प्रादहत्काष्ठैस्ततो देहात्समुत्थितः ।
कन्दर्पसदृशाकारः सर्वाभरणभूषितः ॥२८॥
रामं प्रदक्षिणं कृत्वा साष्टाङ्गं प्रणिपत्य च ।

स्त्रियोंके चित्तोंको चुराता हुआ सम्पूर्ण लोकोंमें भ्रमा करता था ॥ १६ ॥ एक बार अष्टावक्र मुनिको देखकर मैं हँस पड़ा, अतः उन्होंने क्रोधित होकर कहा— "अरे दुर्बुद्धे ! तू बड़ा दुष्ट है, अतः तू राक्षस हो जा" ॥ १७ ॥ उनके शापसे भयभीत होकर जब मैंने उनकी बहुत कुछ अनुनय-विनय की तो तपके कारण परम तेजस्वी उन दयालु मुनीश्वरने मेरे शापका अन्त इस प्रकार बताया ॥ १८ ॥ वे बोले, "त्रेतायुगमें स्वयं नारायण दशरथके यहाँ अवतार लेकर तेरे पास आयेंगे और वे तेरी एक-एक योजन लम्बी भुजाओंको काट डालेंगे ॥ १९ ॥ तब तू शापसे छूटकर अपना पूर्वरूप धारण करेगा।" उनके इस प्रकार शाप देनेसे मैंने अपनेको राक्षसरूपमें देखा ॥ २० ॥

एक बार मैं रोषपूर्वक देवराज इन्द्रके पीछे दौड़ा। तब उसने क्रोधित होकर मेरे शिरपर अपना वज्र मारा ॥ २१ ॥ हे रघुनन्दन ! उस वज्रके आघातसे मेरे शिर और पैर पेटमें घुस गये किन्तु ब्रह्माजीके वरके प्रभावसे मैं मरा नहीं ॥ २२ ॥ मुझे मुखहीन देखकर समस्त देवताओंने दयावश हो देवराजसे कहा— "यह बिना मुखके कैसे जीवित रह सकेगा ?" ॥ २३ ॥ तब इन्द्रने मुझसे कहा— "तेरे पेटमें ही मुख होगा और तेरी भुजाएँ एक-एक योजन लम्बी हो जायँगी, अब तू यहाँसे चला जा" ॥ २४ ॥ इन्द्रके ऐसा कहनेपर मैं यहीं रहकर नित्यप्रति अपनी भुजाओंसे वनके जीवोंको खींचकर खाता रहा हूँ। हे अनघ ! अब उन भुजाओंको आपने काट डाला ॥ २५ ॥ हे रघुकुलश्रेष्ठ ! अब आप मुझे एक अग्नि और ईंधनसे युक्त गड्ढेमें डाल दीजिये । आपके द्वारा अग्निसे दग्ध होनेपर अपना पूर्वरूप धारण कर मैं आपकी भार्याका पता बताऊँगा ।

उसके इस प्रकार कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे तुरन्त ही एक बड़ा गड्ढा तैयार कराया और उसे उसमें डालकर लकड़ियोंसे जला दिया। तब उसके शरीरसे एक सर्वालंकारविभूषित कामदेवके समान अति सुन्दर पुरुष प्रकट हुआ ॥ २६–२८ ॥ उसने रामचन्द्रजीकी परिक्रमा कर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और भक्तिसे