अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| सर्ग ९ ] | अरण्यकाण्ड | १४३ |
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| कृताञ्जलिरुवाचेदं भक्तिगद्गदया गिरा ॥२९॥ | गद्गद-कण्ठ हो हाथ जोड़कर कहने लगा ॥ २९ ॥ |
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| गन्धर्व उवाच | **गन्धर्व बोला—**हे राम ! आप अनन्त, आदि-अन्तसे रहित और मन-वाणीके अविषय हैं; तथापि आज मेरा मन आपकी स्तुति करनेको बड़े वेगसे उत्सुक हो रहा है ॥ ३० ॥ हे प्रभो ! आपके स्थूल और सूक्ष्म रूप (विराट् और हिरण्यगर्भ) से आपका वास्तविक ज्ञानस्वरूप अति सूक्ष्म और अदृश्य है । उससे अतिरिक्त जो कुछ है वह जड दृश्य और अनात्मा है । अतः आपसे भिन्न यह जड मन आपको कैसे जान सकता है ? बुद्धि और चिदाभासका अन्योन्याध्यासरूप ऐक्य ही जीव कहलाता है । इन बुद्धि आदि सबका साक्षी ब्रह्म ही है; वह मन-वाणी आदि किसीका भी विषय नहीं है, उसी निर्विकार सर्वात्मामें अज्ञानवश इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को आरोपित किया जाता है । हे राम ! आपका सूक्ष्म रूप हिरण्यगर्भ और स्थूल रूप विराट् कहलाता है । आपका भावनामय सूक्ष्म रूप जिसमें भूत, भविष्यत् और वर्तमान यह सम्पूर्ण जगत् दीख पड़ता है अपने ध्यान करनेवालोंका मंगल करनेवाला है ॥ ३१–३४ ॥ (एकसे एक दशगुण) महत्तत्त्वादि सात आवरणोंसे घिरे हुए आपके स्थूल ब्रह्माण्डशरीरमें ही धारणाका आश्रयरूप विराट् शरीर स्थित है ॥ ३५ ॥ आप ही एकमात्र मोक्षरूप हैं । सम्पूर्ण लोक आपहीके अवयव हैं । पाताल आपका चरणतल (तलुआ) है, महातल ऐँड़ी है ॥ ३६ ॥ हे राम ! रसातल गुल्फ (टखने) हैं, तलातल जानु हैं तथा सुतल और वितल आपकी जंघाएँ हैं ॥ ३७ ॥ अतलं और भूर्लोक आपकी जंघाओंके नीचे और ऊपरके भाग हैं, भुवर्लोक नाभि है, स्वर्लोक वक्षःस्थल है तथा महर्लोक आपकी ग्रीवा है ॥ ३८ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! जनःलोक आपका मुख है, तपःलोक ललाट है तथा हे प्रभो ! सत्यलोक आपका मस्तक है ॥ ३९ ॥ हे राम ! इन्द्रादि लोकपालगण आपकी भुजाएँ हैं, दिशाएँ कर्ण हैं, अश्विनीकुमार नासिका हैं और अग्नि आपका मुख बताया गया है ॥ ४० ॥ हे राम ! सूर्य आपके नेत्र हैं, चन्द्रमा मन है, काल भ्रूभंगी है और बृहस्पतिजी आपकी बुद्धि हैं ॥ ४१ ॥ रुद्र |
| स्तोतुमुत्सहते मेऽद्य मनो रामातिसम्भ्रमात् ।<br>त्वामनन्तमनाद्यन्तं मनोवाचामगोचरम् ॥३०॥ | |
| सूक्ष्मं ते रूपमव्यक्तं देहद्वयविलक्षणम् ।<br>दृग्रूपमितरत्सर्वं दृश्यं जडमनात्मकम् ।<br>तत्कथं त्वां विजानीयाद्व्यतिरिक्तं मनः प्रभो ३१ | |
| बुद्ध्यात्माभासयोरैक्यं जीव इत्यभिधीयते ।<br>बुद्ध्यादिसाक्षी ब्रह्मैव तस्मिन्निर्विषयेऽखिलम् ३२ | |
| आरोप्यतेऽज्ञानवशान्निर्विकारेऽखिलात्मनि ।<br>हिरण्यगर्भस्ते सूक्ष्मं देहं स्थूलं विराट् स्मृतम् ॥३३॥ | |
| भावनाविषयो राम सूक्ष्मं ते ध्यातृमङ्गलम् ।<br>भूतं भव्यं भविष्यच्च यत्रेदं दृश्यते जगत् ॥३४॥ | |
| स्थूलेऽण्डकोशे देहे ते महदादिभिरावृते ।<br>सप्तभिरुत्तरगुणैर्विराजो धारणाश्रयः ॥३५॥ | |
| त्वमेव सर्वकैवल्यं लोकास्तेऽवयवाः स्मृताः ।<br>पातालं ते पादमूलं पाष्णिस्तव महातलम् ॥३६॥ | |
| रसातलं ते गुल्फौ तु तलातलमितीर्यते ।<br>जानुनी सुतलं राम ऊरू ते वितलं तथा ॥३७॥ | |
| अतलं च मही राम जघनं नाभिंगं नभः ।<br>उरःस्थलं ते ज्योतींषि ग्रीवा ते मह उच्यते ॥३८॥ | |
| वदनं जनलोकस्ते तपस्ते शङ्खदेशगम् ।<br>सत्यलोको रघुश्रेष्ठ शीर्षण्यास्ते सदा प्रभो ॥३९॥ | |
| इन्द्रादयो लोकपाला बाहवस्ते दिशः श्रुती ।<br>अश्विनौ नासिके राम वक्त्रं तेऽग्निरुदाहृतः ॥४०॥ | |
| चक्षुस्ते सविता राम मनश्चन्द्र उदाहृतः ।<br>भ्रूभङ्ग एव कालस्ते बुद्धिस्ते वाक्पतिर्भवेत् ॥४१॥ |