अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
| सर्ग ९ ] | अरण्यकाण्ड | १४३ |
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| कृताञ्जलिरुवाचेदं भक्तिगद्गदया गिरा ॥२९॥ | गद्गद-कण्ठ हो हाथ जोड़कर कहने लगा ॥ २९ ॥ |
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| गन्धर्व उवाच | **गन्धर्व बोला—**हे राम ! आप अनन्त, आदि-अन्तसे रहित और मन-वाणीके अविषय हैं; तथापि आज मेरा मन आपकी स्तुति करनेको बड़े वेगसे उत्सुक हो रहा है ॥ ३० ॥ हे प्रभो ! आपके स्थूल और सूक्ष्म रूप (विराट् और हिरण्यगर्भ) से आपका वास्तविक ज्ञानस्वरूप अति सूक्ष्म और अदृश्य है । उससे अतिरिक्त जो कुछ है वह जड दृश्य और अनात्मा है । अतः आपसे भिन्न यह जड मन आपको कैसे जान सकता है ? बुद्धि और चिदाभासका अन्योन्याध्यासरूप ऐक्य ही जीव कहलाता है । इन बुद्धि आदि सबका साक्षी ब्रह्म ही है; वह मन-वाणी आदि किसीका भी विषय नहीं है, उसी निर्विकार सर्वात्मामें अज्ञानवश इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को आरोपित किया जाता है । हे राम ! आपका सूक्ष्म रूप हिरण्यगर्भ और स्थूल रूप विराट् कहलाता है । आपका भावनामय सूक्ष्म रूप जिसमें भूत, भविष्यत् और वर्तमान यह सम्पूर्ण जगत् दीख पड़ता है अपने ध्यान करनेवालोंका मंगल करनेवाला है ॥ ३१–३४ ॥ (एकसे एक दशगुण) महत्तत्त्वादि सात आवरणोंसे घिरे हुए आपके स्थूल ब्रह्माण्डशरीरमें ही धारणाका आश्रयरूप विराट् शरीर स्थित है ॥ ३५ ॥ आप ही एकमात्र मोक्षरूप हैं । सम्पूर्ण लोक आपहीके अवयव हैं । पाताल आपका चरणतल (तलुआ) है, महातल ऐँड़ी है ॥ ३६ ॥ हे राम ! रसातल गुल्फ (टखने) हैं, तलातल जानु हैं तथा सुतल और वितल आपकी जंघाएँ हैं ॥ ३७ ॥ अतलं और भूर्लोक आपकी जंघाओंके नीचे और ऊपरके भाग हैं, भुवर्लोक नाभि है, स्वर्लोक वक्षःस्थल है तथा महर्लोक आपकी ग्रीवा है ॥ ३८ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! जनःलोक आपका मुख है, तपःलोक ललाट है तथा हे प्रभो ! सत्यलोक आपका मस्तक है ॥ ३९ ॥ हे राम ! इन्द्रादि लोकपालगण आपकी भुजाएँ हैं, दिशाएँ कर्ण हैं, अश्विनीकुमार नासिका हैं और अग्नि आपका मुख बताया गया है ॥ ४० ॥ हे राम ! सूर्य आपके नेत्र हैं, चन्द्रमा मन है, काल भ्रूभंगी है और बृहस्पतिजी आपकी बुद्धि हैं ॥ ४१ ॥ रुद्र |
| स्तोतुमुत्सहते मेऽद्य मनो रामातिसम्भ्रमात् ।<br>त्वामनन्तमनाद्यन्तं मनोवाचामगोचरम् ॥३०॥ | |
| सूक्ष्मं ते रूपमव्यक्तं देहद्वयविलक्षणम् ।<br>दृग्रूपमितरत्सर्वं दृश्यं जडमनात्मकम् ।<br>तत्कथं त्वां विजानीयाद्व्यतिरिक्तं मनः प्रभो ३१ | |
| बुद्ध्यात्माभासयोरैक्यं जीव इत्यभिधीयते ।<br>बुद्ध्यादिसाक्षी ब्रह्मैव तस्मिन्निर्विषयेऽखिलम् ३२ | |
| आरोप्यतेऽज्ञानवशान्निर्विकारेऽखिलात्मनि ।<br>हिरण्यगर्भस्ते सूक्ष्मं देहं स्थूलं विराट् स्मृतम् ॥३३॥ | |
| भावनाविषयो राम सूक्ष्मं ते ध्यातृमङ्गलम् ।<br>भूतं भव्यं भविष्यच्च यत्रेदं दृश्यते जगत् ॥३४॥ | |
| स्थूलेऽण्डकोशे देहे ते महदादिभिरावृते ।<br>सप्तभिरुत्तरगुणैर्विराजो धारणाश्रयः ॥३५॥ | |
| त्वमेव सर्वकैवल्यं लोकास्तेऽवयवाः स्मृताः ।<br>पातालं ते पादमूलं पाष्णिस्तव महातलम् ॥३६॥ | |
| रसातलं ते गुल्फौ तु तलातलमितीर्यते ।<br>जानुनी सुतलं राम ऊरू ते वितलं तथा ॥३७॥ | |
| अतलं च मही राम जघनं नाभिंगं नभः ।<br>उरःस्थलं ते ज्योतींषि ग्रीवा ते मह उच्यते ॥३८॥ | |
| वदनं जनलोकस्ते तपस्ते शङ्खदेशगम् ।<br>सत्यलोको रघुश्रेष्ठ शीर्षण्यास्ते सदा प्रभो ॥३९॥ | |
| इन्द्रादयो लोकपाला बाहवस्ते दिशः श्रुती ।<br>अश्विनौ नासिके राम वक्त्रं तेऽग्निरुदाहृतः ॥४०॥ | |
| चक्षुस्ते सविता राम मनश्चन्द्र उदाहृतः ।<br>भ्रूभङ्ग एव कालस्ते बुद्धिस्ते वाक्पतिर्भवेत् ॥४१॥ |
| १४४ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ९ |
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| रुद्रोऽहङ्काररूपस्ते वाचश्छन्दांसि तेऽव्यय ।<br>यमस्ते दंष्ट्रदेशस्थो नक्षत्राणि द्विजालयः ॥४२॥ | आपका अहंकार है, वेद आपकी अविनाशी वाणी है, यम आपकी दाढ़ें हैं और नक्षत्रगण आपकी दन्तावलि है ॥४२॥ |
| हासो मोहकरी माया सृष्टिस्तेऽपाङ्गमोक्षणम् ।<br>धर्मः पुरस्तेऽधर्मश्च पृष्ठभाग उदीरितः ॥४३॥ | सबको मोहित करनेवाली माया आपका हास्य है, सृष्टि आपका कटाक्ष है, धर्म आपका आगेका भाग है और अधर्म पीठिका भाग है ॥४३॥ |
| निमिषोन्मेषणे रात्रिर्दिवा चैव रघूत्तम ।<br>समुद्राः सप्त ते कुक्षिर्नाड्यो नद्यस्तव प्रभो ॥४४॥ | हे रघूत्तम ! रात्रि और दिन आपके निमेषोन्मेष हैं, हे प्रभो ! सातों समुद्र आपकी कुक्षि और नदियाँ नाड़ियाँ हैं ॥४४॥ |
| रोमाणि वृक्षौषधयो रेतो वृष्टिस्तव प्रभो ।<br>महिमा ज्ञानशक्तिस्ते एवं स्थूलं वपुस्तव ॥४५॥ | हे प्रभो ! वृक्ष और ओषधियाँ आपके रोम, वृष्टि आपका वीर्य और ज्ञानशक्ति आपकी महिमा है। यही आपका स्थूल शरीर है ॥४५॥ |
| यदस्मिन् स्थूलरूपे ते मनः सन्धार्यते नरैः ।<br>अनायासेन मुक्तिः स्यादतोऽन्यन्नहि किञ्चन ॥४६॥ | यदि पुरुष आपके इस स्थूल शरीरमें मन स्थिर करें तो वह अनायास ही मुक्त हो जाता है। हे राम ! आपके इस स्थूल रूपसे पृथक् और कोई पदार्थ नहीं है ॥४६॥ |
| अतोऽहं राम रूपं ते स्थूलमेवानुभावये ।<br>यस्मिन्ध्याते प्रेमरसः सरोमपुलको भवेत् ॥४७॥ | अतः हे राम ! मैं आपके उस स्थूल रूपका ही सदा चिन्तन करता हूँ जिसके ध्यानमात्रसे ही शरीरमें रोमाञ्चके सहित मनुष्यके हृदयमें प्रेम-रसका सञ्चार हो जाता है ॥४७॥ |
| तदैव मुक्तिः स्याद्राम यदा ते स्थूलभावकः ।<br>तदप्यास्तां तथैवाहमेतद्रूपं विचिन्तये ॥४८॥ | हे राम ! जब यह जीव आपके विराट् रूपका चिन्तन करता है तो तत्काल ही उसकी मुक्ति हो जाती है तो भी मुझे उसकी आवश्यकता नहीं। मैं तो आपके इस रामरूपका ही चिन्तन करूँगा ॥४८॥ |
| धनुर्बाणधरं श्यामं जटावल्कलभूषितम् ।<br>अपीच्यवयसं सीतां विचिन्वन्तं सलक्ष्मणम् ॥४९॥<br>इदमेव सदा मे स्यान्मानसे रघुनन्दन ।<br>सर्वज्ञः शङ्करः साक्षात्पार्वत्या सहितः सदा ॥५०॥<br>त्वद्रूपमेवं सततं ध्यायन्नास्ते रघूत्तम ।<br>मुमूर्षूणां तदा काश्यां तारकं ब्रह्मवाचकम् ॥५१॥<br>रामरामेत्युपदिशन्सदा सन्तुष्टमानसः ।<br>अतस्त्वं जानकीनाथ परमात्मा सुनिश्चितः ॥५२॥ | हे रघुनन्दन ! (मेरी यही प्रार्थना है कि) लक्ष्मणजीके सहित सीताको खोजता हुआ आपका यह जटा-वल्कल-विभूषित धनुषबाणधारी अति सुन्दर सुकुमार श्याम शरीर सदा मेरे मनमें विराजमान रहे। हे रघुश्रेष्ठ ! आपके इस दिव्य रूपका पार्वतीजीके सहित सर्वज्ञ श्रीशंकरभगवान् सर्वदा चिन्तन किया करते हैं और काशीमें मरनेवालोंको ब्रह्मवाचक रामनाम-रूप तारक-मन्त्रका उपदेश करते हुए सदा अति आनन्दमें मग्न रहते हैं। अतः हे जानकीनाथ ! आप निश्चय ही परमात्मा हैं ॥४९-५२॥ |
| सर्वे ते मायया मूढास्त्वां न जानन्ति तत्त्वतः ।<br>नमस्ते रामभद्राय वेधसे परमात्मने ॥५३॥ | आपकी मायासे मोहित होनेके कारण सब लोग आपका वास्तविक स्वरूप नहीं जानते। हे संसारकी रचना करनेवाले परमात्मा राम ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥५३॥ |
| अयोध्याधिपते तुभ्यं नमः सौमित्रिसेवित ।<br>त्राहि त्राहि जगन्नाथ मां माया नावृतोणुतु ते ॥५४॥ | हे सौमित्रिसेवित अयोध्यानाथ ! आपको नमस्कार है। हे जगन्नाथ ! आप मेरी रक्षा कीजिये, आपकी माया मुझे मोहित न करे ॥५४॥ |
अरण्यकाण्ड - सर्ग १०: शबरीसे भेंट
| सर्ग १० ] | अरण्यकाण्ड | १४५ |
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| श्रीराम उवाच | **श्रीरामचन्द्रजी बोले—**हे देवगन्धर्व ! मैं तुम्हारी |
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| तुष्टोऽहं देवगन्धर्व भक्त्या स्तुत्या च तेऽनघ।<br>याहि मे परमं स्थानं योगिगम्यं सनातनम् ॥५५॥ | भक्ति और स्तुतिसे अति सन्तुष्ट हूँ । हे अनघ ! तुम योगियोंके प्राप्त करनेयोग्य मेरे सनातन परमधामको जाओ ॥ ५५ ॥ |
| जपन्ति ये नित्यमनन्यबुद्ध्या<br>भक्त्या त्वदुक्तं स्तवमागमोक्तम्।<br>तेऽज्ञानसम्भूतभवं विहाय<br>मां यान्ति नित्यानुभवानुमेयम् ॥५६॥ | जो लोग तुम्हारे इस शास्त्रोक्त स्तोत्रका अनन्य बुद्धिसे नित्य भक्ति-पूर्वक जप करेंगे वे अन्तमें अज्ञानजन्य संसारसे मुक्त होकर मुझ नित्यानुभवरूप परमात्माको प्राप्त करेंगे ॥ ५६ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
दशम सर्ग
शबरीसे भेंट।
| श्रीमहादेव उवाच | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! (भगवान् रामसे) |
|---|---|
| लब्ध्वा वरं स गन्धर्वः प्रयास्यन् राममब्रवीत् ।<br>शबर्यास्ते पुरोभागे आश्रमे रघुनन्दन ॥ १ ॥ | वर पाकर (उनके परमधामको) जाते हुए उस गन्धर्व राजने कहा—"हे रघुनन्दन ! सामनेवाले आश्रममें शबरी रहती है। |
| भक्त्या त्वत्पादकमले भक्तिमार्गविशारदा ।<br>तां प्रयाहि महाभाग सर्वं ते कथयिष्यति ॥ २ ॥ | वह आपके चरण-कमलोंमें अति अनुराग रखनेके कारण भक्ति-मार्गमें कुशल है। हे महाभाग ! आप वहाँ पधारिये। वह आपको (सीताजी-के सम्बन्धमें ) सब बातें बता देगी" ॥ १-२ ॥ |
| इत्युक्त्वा प्रययौ सोऽपि विमानेनार्कवर्चसा ।<br>विष्णोः पदं रामनामस्मरणे फलमीदृशम् ॥ ३ ॥ | ऐसा कहकर वह एक सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर चढ़कर विष्णुलोकको चला गया । सच है, राम-नाम-स्मरणका फल ऐसा ही है ॥ ३ ॥ |
| त्यक्त्वा तद्विपिनं घोरं सिंहव्याघ्रादिदूषितम् ।<br>शनैरथाश्रमपदं शबर्या रघुनन्दनः ॥ ४ ॥ | तदनन्तर सिंह, व्याघ्रादिसे दूषित उस घोर वनको छोड़कर श्रीरघुनाथजी धीरे-धीरे शबरीके आश्रमपर पहुँचे ॥ ४ ॥ |
| शबरी राममालोक्य लक्ष्मणेन समन्वितम् ।<br>आयान्तमारार्द्धूपेण प्रत्युत्थायाचिरेण सा ॥ ५ ॥ | लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजीको समीप ही आते देख शबरी अत्यन्त हर्षसे तुरन्त उठ खड़ी हुई ॥ ५ ॥ |
| पतित्वा पादयोरग्रे हर्षपूर्णाश्रुलोचना ।<br>स्वागतेनाभिनन्द्याथ खासने संन्यवेशयत् ॥६॥ | उसके नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भर आये और वह भगवान् रामके चरणोंमें गिर पड़ी तथा उनका स्वागत कर कुशल-प्रश्नादिके अनन्तर उन्हें सुन्दर आसनपर बैठाया ॥ ६ ॥ |
| रामलक्ष्मणयोः सम्यक्पादौ प्रक्षाल्य भक्तितः ।<br>तज्जलेनाभिषिच्याङ्गमथार्घ्यादिभिरादृता ॥७॥ | तदनन्तर अत्यन्त भक्तिसे श्रीराम और लक्ष्मणके चरण अच्छी प्रकार धोये और उस चरणोदकको अपने अङ्गोंपर छिड़क-कर अर्ध्यादिसे भगवान्का सत्कार किया ॥ ७ ॥ फिर |
१४६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १०
| सम्पूज्य विधिवद्रामं ससौमित्रिं सपर्यया ।<br>सङ्गृहीतानि दिव्यानि रामार्थं शबरी मुदा ॥८॥<br>फलान्यमृतकल्पानि ददौ रामाय भक्तितः ।<br>पादौ सम्पूज्य कुसुमैः सुगन्धैः सानुलेपनैः ॥९॥ | विविध सामग्रियोंसे राम और लक्ष्मणका विधिवत् पूजन-कर जो अमृतके समान दिव्य फल उसने श्रीरामचन्द्रजीके लिये इकट्ठे कर रखे थे वे अत्यन्त हर्षसे लाकर उन्हें दिये और उनके चरण-कमलोंका सुगन्धित पुष्प और चन्दन आदिसे पूजन किया ॥ ८-९ ॥ |
| कृतातिथ्यं रघुश्रेष्ठमुपविष्टं सहानुजम् ।<br>शबरी भक्तिसम्पन्ना प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥१०॥ | इसप्रकार आतिथ्य-सत्कार हो चुकनेपर जब श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीके सहित आसनपर विराजमान थे, शबरीने भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर कहा— ॥ १०॥ |
| अत्राश्रमे रघुश्रेष्ठ गुरवो मे महर्षयः ।<br>स्थिताः शुश्रूषणं तेषां कुर्वती समुपस्थिता ॥११॥<br>बहुवर्षसहस्राणि गतास्ते ब्रह्मणः पदम् ।<br>गमिष्यन्तोऽब्रुवन्मां त्वं वसात्रैव समाहिता ॥१२॥<br>रामो दाशरथिर्जातः परमात्मा सनातनः ।<br>राक्षसानां वधार्थाय ऋषीणां रक्षणाय च ॥१३॥<br>आगमिष्यति सैकाग्रध्यानानिष्ठा स्थिरा भव ।<br>इदानीं चित्रकूटार्द्रावाश्रमे वसति प्रभुः ॥१४॥<br>यावदागमनं तस्य तावद्रक्ष कलेवरम् ।<br>दृष्ट्वैव राघवं दग्ध्वा देहं यास्यसि तत्पदम् ॥१५॥ | "हे रघुश्रेष्ठ ! इस आश्रममें पहले मेरे गुरु महर्षि ( मतंग ) रहा करते थे; मैं उनकी सेवा-शुश्रूषा करती हुई यहाँ हज़ारों वर्षोंसे रहती हूँ। अब वे महर्षिश्रेष्ठ ब्रह्मलोकको चले गये हैं। जाते समय उन्होंने मुझसे कहा था कि तू एकाग्रचित्त होकर यहीं रह ॥ ११-१२ ॥ सनातन परमात्माने राक्षसोंको मारने और ऋषियोंकी रक्षा करनेके लिये राजा दशरथके पुत्र रामरूपसे अवतार लिया है ॥ १३ ॥ वे (शीघ्र ही) यहाँ आयेंगे। तू एकाग्र-चित्तसे उनका ध्यान करती हुई यहाँ रह। आजकल भगवान् रामजी चित्रकूट पर्वतके आश्रममें विराजमान हैं ॥ १४ ॥ जबतक वे आवें तबतक तू अपने शरीरका पालन कर। रघुनाथजीके आनेपर उनका दर्शन करते हुए इस शरीरको जलाकर तू उनके परमधामको चली जायगी ॥ १५ ॥ |
| तथैवाकरवं राम त्वद्ध्यानैकपरायणा ।<br>प्रतीक्ष्यागमनं तेऽद्य सफलं गुरुभाषितम् ॥१६॥ | हे राम ! गुरुजीके कथनानुसार मैं तभीसे आपका ध्यान करती हुई आपके आनेकी बाट देख रही थी। आज गुरुजीका वह वाक्य सफल हो गया ॥ १६ ॥ |
| तव सन्दर्शनं राम गुरूणामपि मे नहि ।<br>योषिन्मूढाऽप्रमेयात्मन् हीनजातिसमुद्भवा ॥१७॥ | हे राम ! आपका दर्शन तो मेरे गुरुदेवको भी नहीं हुआ। फिर हे अप्रमेयात्मन् ! मैं तो नीच-जातिमें उत्पन्न हुई एक गँवारी नारी ही हूँ ! मेरी तो बात ही क्या है ? ॥ १७ ॥ |
| तव दासस्य दासानां शतसङ्ख्योत्तरस्य वा ।<br>दासीत्वे नाधिकारोऽस्ति कुतः साक्षात्तवैव हि ॥१८॥ | जो आपके दासोंके दास हैं उनके भी जो उत्तरोत्तर सैकड़ों दासानुदास हैं मैं तो उनकी दासी होनेकी भी अधिकारिणी नहीं हूँ; फिर साक्षात् आपकी दासी कहलानेका तो मेरा मुँह ही कहाँ है ? ॥ १८ ॥ |
| कथं रामाद्य मे दृष्टस्त्वं मनोवागगोचरः ।<br>स्तोतुं न जाने देवेश किं करोमि प्रसीद मे ॥१९॥ | हे राम ! आप तो मन या वाणीके विषय नहीं हैं फिर न जाने आज मुझे आपका दर्शन कैसे हो गया। हे देवेश्वर ! मैं आपकी स्तुति करना नहीं जानती। अब मैं क्या करूँ? प्रभो ! आप स्वयं ही (अपनी दयालुतासे) मुझपर प्रसन्न होइये" ॥ १९ ॥ |
सर्ग १० ] अरण्यकाण्ड १४७
| श्रीराम उवाच | श्रीरामचन्द्रजी बोले—पुरुषत्व-स्त्रीत्वका भेद अथवा |
|---|---|
| पुंस्त्वे स्त्रीत्वे विशेषो वा जातिनामाश्रमादयः । | जाति, नाम और आश्रम—ये कोई भी मेरे भजन- |
| न कारणं मद्भजने भक्तिरेव हि कारणम् ॥२०॥ | के कारण नहीं हैं। उसका कारण तो एकमात्र मेरी भक्ति ही है ॥२०॥ जो मेरी भक्तिसे विमुख हैं वे |
| यज्ञदानतपोभिर्वा वेदाध्ययनकर्मभिः । | यज्ञ, दान, तप अथवा वेदाध्ययन आदि किसी भी कर्मसे |
| नैवं द्रष्टुमंहं शक्यो मद्भक्तिविमुखैः सदा ॥२१॥ | मुझे कभी नहीं देख सकते ॥२१॥ अतः हे भामिनि ! मैं संक्षेपसे अपनी भक्तिके साधनोंका वर्णन |
| तस्माद्भाभिनि सङ्क्षेपाद्वक्ष्येऽहं भक्तिसाधनम् । | करता हूँ। उनमें पहला साधन तो सत्सङ्ग ही है |
| सतां सङ्गतिरेवात्र साधनं प्रथमं स्मृतम् ॥२२॥ | ॥२२॥ मेरे जन्म-कर्मोंकी कथाका कीर्तन करना |
| द्वितीयं मत्कथालापस्तृतीयं मद्गुणेरणम् । | दूसरा साधन है, मेरे गुणोंकी चर्चा करना—यह तीसरा उपाय है और (गीता-उपनिषदादि) मेरे वाक्योंकी |
| व्याख्यातृत्वं मद्वचसां चतुर्थं साधनं भवेत् ॥२३॥ | व्याख्या करना उसका चौथा साधन है ॥२३॥ हे |
| आचार्योपासनं भद्रे मद्बुद्ध्याऽमायया सदा । | भद्रे ! अपने गुरुदेवकी निष्कपट होकर भगवद्बुद्धिसे सेवा करना पाँचवाँ, पवित्र स्वभाव, यम-नियमादिका |
| पञ्चमं पुण्यशीलत्वं यमादि नियमादि च ॥२४॥ | पालन और मेरी पूजामें प्रेम होना छठा, तथा मेरे |
| निष्ठा मत्पूजने नित्यं षष्ठं साधनमीरितम् । | मन्त्रकी सांगोपांग उपासना करना सातवाँ साधन कहा |
| मम मन्त्रोपासकत्वं साङ्गं सप्तममुच्यते ॥२५॥ | जाता है ॥२४-२५॥ मेरे भक्तोंकी मुझसे भी अधिक पूजा करना, समस्त प्राणियोंमें मेरी भावना करना, |
| मद्भक्तेष्वधिका पूजा सर्वभूतेषु मन्मतिः । | बाह्य पदार्थोंमें आसक्त न होना और शम-दमादि- |
| वाह्यार्थेषु विरागित्वं शमादिसहितं तथा ॥२६॥ | सम्पन्न होना—यह मेरी भक्तिका आठवाँ साधन है तथा तत्त्व-विचार करना नवाँ है। हे भामिनि ! |
| अष्टमं नवमं तत्त्वविचारो मम भामिनि । | इस प्रकार यह नौ प्रकारकी भक्ति है। हे शुभ- |
| एवं नवविधा भक्तिः साधनं यस्य कस्य वा ॥२७॥ | लक्षणे ! जिस किसीमें ये साधन होते हैं वह स्त्री, पुरुष अथवा पशु-पक्षी आदि कोई भी क्यों न हो उसमें प्रेम- |
| स्त्रियो वा पुरुषस्यापि तिर्यग्योनिगतस्य वा । | लक्षणा-भक्तिका आविर्भाव हो ही जाता है ॥२६- |
| भक्तिः सञ्जायते प्रेमलक्षणा शुभलक्षणे ॥२८॥ | २८॥ भक्तिके उत्पन्न होने मात्रसे ही मेरे स्वरूपका |
| भक्तौ सञ्जातमात्रायां मत्तत्त्वानुभवस्तदा । | अनुभव हो जाता है और जिसे मेरा अनुभव हो जाता है उसकी उसी जन्ममें निस्सन्देह मुक्ति हो जाती है |
| ममानुभवसिद्धस्य मुक्तिस्तत्रैव जन्मनि ॥२९॥ | अतः यह सिद्ध हुआ कि मोक्षका कारण भक्ति ही |
| स्यात्तस्मात्कारणं भक्तिर्मोक्षस्येति सुनिश्चितम् । | है। (भक्तिके उपरोक्त नौ साधनोंमेंसे) जिसमें पहला |
| प्रथमं साधनं यस्य भवेत्तस्य क्रमेण तु ॥३०॥ | साधन होता है उसमें क्रमशः ये सभी आ जाते हैं। तब फिर उसे भक्ति तथा मुक्तिका प्राप्त होना निश्चित |
| भवेत्सर्वं ततो भक्तिर्मुक्तिरेव सुनिश्चितम् । | ही है। तू मेरी भक्तिसे युक्त है इसीलिये मैं तेरे पास |
| यस्मान्मद्भक्तियुक्ता त्वं ततोऽहं त्वामुपस्थितः॥३१॥ | आया हूँ ॥२९-३१॥ अब, मेरा दर्शन होनेसे तेरी मुक्ति हो ही जायगी—इसमें सन्देह नहीं। यदि तुझे |
| इतो मदर्शनान्मुक्तिस्तव नास्त्यत्र संशयः । | पता हो तो बता इस समय कमललोचना सीता |
| यदि जानासि मे ब्रूहि सीता कमललोचना ॥३२॥ | कहाँ है। मेरी प्रियदर्शना प्रियाको कौन ले गया है ? |
| कुत्रास्ते केन वा नीता प्रिया मे प्रियदर्शना ॥३३॥ | ॥३२-३३॥ |
| १४८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १० |
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शबर्युवाच देव जानासि सर्वज्ञ सर्वं त्वं विश्वभावन । तथाऽपि पृच्छसे यन्मां लोकानुसृतः प्रभो ॥३४॥ ततोऽहमभिधास्यामि सीता यत्राधुना स्थिता । रावणेन हृता सीता लङ्कायां वर्ततेऽधुना ॥३५॥ इतः समीपे रामास्ते पम्पानाम सरोवरम् । ऋष्यमूकगिरिर्नाम तत्समीपे महानगः ॥३६॥ चतुर्भिर्मन्त्रिभिः सार्धं सुग्रीवो वानराधिपः । भीतभीतः सदा यत्र तिष्ठत्यतुलविक्रमः ॥३७॥ वालिनश्च भयाद्भ्रातुस्तदगम्यमृषेर्भयात् । वालिनस्तत्र गच्छ त्वं तेन सख्यं कुरु प्रभो ॥३८॥ सुग्रीवेण स सर्वं ते कार्यं सम्पादयिष्यति । अहमग्निं प्रवेक्ष्यामि तवाग्रे रघुनन्दन ॥३९॥ मुहूर्तं तिष्ठ राजेन्द्र यावद्दग्ध्वा कलेवरम् । यास्यामि भगवन् राम तव विष्णोः परं पदम् ॥४०॥ इति रामं समामन्त्र्य प्रविवेश हुताशनम् । क्षणात्रिर्धूय सकलमविद्याकृतबन्धनम् । रामप्रसादाच्छबरी मोक्षं प्रापातिदुर्लभम् ॥४१॥ किं दुर्लभं जगन्नाथे श्रीरामे भक्तवत्सले । प्रसन्नेऽधमजन्माऽपि शबरी मुक्तिमाप सा ॥४२॥ किं पुनर्ब्राह्मणा मुख्याः पुण्याः श्रीरामचिन्तकाः । मुक्तिं यान्तीति तद्भक्तिर्मुक्तिरेव न संशयः ॥४३॥ भक्तिर्मुक्तिविधायिनी भगवतः $\qquad\quad$श्रीरामचन्द्रस्य हे । लोकाः कामदुघाङ्घ्रिपङ्कजयुगलं $\qquad\quad$सेवध्वमत्युत्सुकाः । नानाज्ञानविशेषमन्त्रविततिं $\qquad\quad$त्यक्त्वा सुदूरे भृशं । रामं श्यामतनुं स्मरारिहृदये $\qquad\quad$भान्तं भजध्वं बुधाः ॥४४॥
शबरी बोली—हे देव ! हे सर्वज्ञ ! हे विश्वभावन ! आप सभी कुछ जानते हैं । तथापि हे प्रभो ! लोकाचारका अनुसरण करते हुए यदि आप मुझसे पूछते हैं तो इस समय सीताजी जहाँ हैं वह मैं आपको बतलाती हूँ । सीताजीको रावण हर ले गया है और इस समय वे लङ्कामें हैं ॥ ३४-३५ ॥ हे राम ! यहाँसे पास ही पम्पा नामका एक सरोवर है । उसके समीप ऋष्यमूक नामका एक बहुत बड़ा पर्वत है ॥ ३६ ॥ वहाँ अतुलित पराक्रमी वानरराज सुग्रीव अपने भाई वालीके भयसे सदा डरता हुआ अपने चार मन्त्रियोंके साथ रहता है । ऋषि-शापके भयसे वह स्थान वालीके लिये सर्वथा अगम्य है हे प्रभो ! आप वहाँ जाइये और उस सुग्रीवके मित्रत कीजिए वह आपका सब कार्य सिद्ध करेगा । हे रघुनन्दन ! अब मैं आपके सामने ही अग्निमें प्रवेश करूँगी ॥ ३७-३९ ॥ हे राजेश्वर ! हे भगवन् ! हे राम ! जबतक मैं अपने शरीरको जलाकर आप विष्णुभगवान्के परमधामको जाऊँ तबतक आप एक मुहूर्त्त यहाँ और ठहरिये ॥ ४० ॥
श्रीरामचन्द्रजीके साथ इस प्रकार सम्भाषण करनेके अनन्तर शबरीने अग्निमें प्रवेश किया और एक क्षणमें ही समस्त अविद्याजन्य बन्धनोंको नष्ट कर भगवान् रामकी कृपासे अति दुर्लभ मोक्ष-पद प्राप्त किया ॥ ४१ ॥ भक्तवत्सल जगन्नाथ श्रीरामके प्रसन्न होनेपर संसारमें क्या दुर्लभ है । देखो, उनकी कृपासे नीच जातिमें उत्पन्न हुई शबरीने भी मोक्ष-पद प्राप्त कर लिया ॥ ४२ ॥ फिर श्रीरामका ध्यान करनेवाले पुण्यजन्मा ब्राह्मणादि यदि मुक्त हो जायें तो इसमें क्या आश्चर्य है ? निस्सन्देह, भगवान् रामकी भक्ति ही मुक्ति है ॥ ४३ ॥ अरे लोगो ! भगवान् श्रीरामचन्द्रकी भक्ति ही मोक्ष देनेवाली है । अतः कामधेनुरूप उनके चरण-युगलोंकी अति उत्साहपूर्वक सेवा करो । हे बुद्धिमान् लोगो ! इन विविध विज्ञान-वार्ताओं और मन्त्र-विस्तारको अलग रखकर तुरन्त ही श्रीशंकरके हृदयधाममें शोभा पानेवाले श्यामशरीर भगवान् रामका भजन करो ॥ ४४ ॥
'इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे दशमः सर्गः ॥ १० ॥
समाप्तमिदमरण्यकाण्डम् ।
किष्किन्धाकाण्ड
श्रीसीतारामाभ्यां नमः
अध्यात्मरामायण
किष्किन्धाकाण्ड
यो वालिना ध्वस्तबलं सुकण्ठं न्ययोजयद्राजपदे कपीनाम्।
तं स्वीयसन्तापसुतप्तचित्तं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि॥
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दास-भक्त हनुमानजी
तथेति तस्यारुरोह स्कन्धं रामोऽथ लक्ष्मणः । उत्पपात गिरेर्मूर्ध्नि क्षणादेव महाकपिः ॥
(अ० रा० कि० १ । २८-२९)
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग १: सुग्रीवसे भेंट
ॐ
अध्यात्मरामायण
किष्किन्धाकाण्ड
प्रथम सर्ग
सुग्रीवसे भेंट।
| श्रीमहादेव उवाच | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके सहित धीरे-धीरे पम्पासरके तटपर आये। उस सुन्दर सरोवरको देखकर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ ॥ १ ॥ उसका विस्तार एक कोशका था और उसमें अति निर्मल अगाध जल भरा हुआ था तथा सब ओर खिले हुए कमल, कह्लार, कुमुद और उत्पल आदि सुशोभित हो रहे थे ॥ २ ॥ उस सरोवरमें जहाँ-तहाँ हंस और कारण्डव आदि पक्षी विहार कर रहे थे, चक्रवाकादि उसकी शोभा बढ़ा रहे थे और जलकुक्कुट, कोयष्टि तथा क्रौंच आदि पक्षियोंके कलरवसे वह शब्दायमान हो रहा था ॥ ३ ॥ वह चित्र-विचित्र पुष्प-लताओंसे परिपूर्ण और नाना प्रकारके फलवाले वृक्षोंसे घिरा हुआ था तथा उसका कमलकेशरसे सुवासित जल सज्जनोंके चित्तके समान स्वच्छ था ॥ ४ ॥ |
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| ततः सलक्ष्मणो रामः शनैः पम्पासरस्तटम् ।<br>आगत्य सरसां श्रेष्ठं दृष्ट्वा विस्मयमाययौ ॥ १ ॥<br><br>क्रोशमात्रं सुविस्तीर्णमगाधामलशम्बरम् ।<br>उत्फुल्लाम्बुजकह्लारकुमुदोत्पलमण्डितम् ॥ २ ॥<br><br>हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकादिशोभितम् ।<br>जलकुक्कुटकोयष्टिकौञ्चनादोपनादितम् ॥ ३ ॥<br><br>नानापुष्पलताकीर्णं नानाफलसमावृतम् ।<br>सतां मनःस्वच्छजलं पद्मकिञ्जल्कवासितम् ॥ ४ ॥ | |
| तत्रोपस्पृश्य सलिलं पीत्वा श्रमहरं विभुः ।<br>सानुजः सरसस्तीरे शीतलेन पथा ययौ ॥ ५ ॥<br><br>ऋष्यमूकगिरेः पार्श्वे गच्छन्तौ रामलक्ष्मणौ ।<br>धनुर्वाणकरौ दान्तौ जटावल्कलमण्डितौ ।<br>पश्यन्तौ विविधान्वृक्षान् गिरेः शोभां सुविक्रमौ ॥ ६ ॥<br><br>सुग्रीवस्तु गिरेर्मूर्ध्नि चतुर्भिः सह वानरैः । | वहाँ पहुँचनेपर छोटे भाई लक्ष्मणके सहित प्रभु रामने आचमनकर उस सरोवरका श्रमहारी शीतल जल पीया और फिर उसके किनारे-किनारे शीतल छायायुक्त मार्गसे चलने लगे ॥ ५ ॥ इस प्रकार जटा-वल्कलविभूषित जितेन्द्रिय परम पराक्रमी राम और लक्ष्मण, जब हाथमें धनुष-बाण लिये विविध वृक्षों और पर्वतकी शोभाको निहारते हुए ऋष्यमूक पर्वतकी बगलमें चल रहे थे ॥ ६ ॥ उस समय अपने चार मन्त्रियोंके सहित गिरि-शिखरपर बैठे हुए सुग्रीवने उन्हें उधर |
| '१५२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १ |
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स्थित्वा ददर्श तौ यान्तावारुरोह गिरेः शिरः॥ ७॥
भयादाह हनूमन्तं कौ तौ वीरवरौ सखे ।
गच्छ जानीहि भद्रं ते बटुर्भूत्वा द्विजाकृतिः ॥८॥
वालिना प्रेषितौ किंवा मां हन्तुं समुपागतौ ।
ताभ्यां सम्भाषणं कृत्वा जानीहि हृदयं तयोः॥९॥
यदि तौ दुष्टहृदयौ संज्ञां कुरु कराग्रतः ।
विनयावनतो भूत्वा एवं जानीहि निश्चयम् ॥१०॥
तथेति वटुरूपेण हनुमान् समुपागतः ।
विनयावनतो भूत्वा रामं नत्वेदमब्रवीत् ॥११॥
कौ युवां पुरुषव्याघ्रौ युवानौ वीरसम्मतौ ।
द्योतयन्तौ दिशः सर्वाः प्रभया भास्कराविवा॥ १२॥
युवां त्रैलोक्यकर्ताराविति भाति मनो मम ।
युवां प्रधानपुरुषौ जगद्धेतू जगन्मयौ ॥१३॥
मायया मानुषाकारौ चरन्ताविच लीलया ।
भूभारहरणार्थाय भक्तानां पालनाय च ॥१४॥
अवतीर्णाविह परौ चरन्तौ क्षत्रियाकृती ।
जगत्स्थितिलयौ सर्गं लीलया कर्तुमुद्यतौ ॥१५॥
स्वतन्त्रौ प्रेरकौ सर्वहृदयस्थाविहेश्वरौ ।
नरनारायणौ लोके चरन्ताविति मे मतिः ॥१६॥
श्रीरामो लक्ष्मणं प्राह पश्यैनं वटुरूपिणम् ।
शब्दशास्त्रमशेषेण श्रुतं नूनमनेकधा ॥१७॥
अनेन भाषितं कृत्स्नं न किञ्चिदपशब्दितम् ।
ततः प्राह हनूमन्तं राघवो ज्ञानविग्रहः ॥१८॥
अहं दाशरथी रामस्त्वयं मे लक्ष्मणोऽनुजः ।
सीतया भार्यया सार्धं पितुर्वचनगौरवात् ॥१९॥ | जाते देखा और वह सबसे ऊँचे शिखरपर चढ़ गया ॥ ७॥ फिर भयभीत होकर हनुमान्जीसे बोला— "मित्र ! देखो, ये दो वीरवर कौन हैं। तुम्हारा कल्याण हो, तुम ब्राह्मण ब्रह्मचारीके वेषमें उनके पास जाकर यह मालूम तो करो ॥ ८॥ तुम उनसे बातचीत करके उनके यहाँ आनेका अभिप्राय मालूम करना । ऐसा न हो, वे वालीके भेजनेसे मुझे मारनेके लिये आ रहे हों ॥ ९ ॥ यदि तुम्हें उनका हृदय दूषित मालूम हो तो अपनी अंगुलीसे मुझे संकेत कर देना । देखो, बड़े विनीत होकर यह सब भेद मालूम कर लेना ॥ १०॥<br><br>तब हनुमान्जी सुग्रीवसे 'जो आज्ञा' कह ब्रह्मचारीका वेष बनाकर रघुनाथजीके पास आये और बड़ी नम्रतासे उन्हें नमस्कार कर बोले—॥ ११॥ "हे पुरुषव्याघ्र! आप दोनों कौन हैं? आपकी युवावस्था है और आप बड़े वीर मालूम होते हैं। अहो! अपने शरीरकी कान्तिसे आपने समस्त दिशाओंको सूर्यके समान प्रकाशमान कर रक्खा है ॥ १२॥ मेरा मन तो यह कहता है कि आप दोनों त्रिलोकीके रचनेवाले संसारके कारणभूत जगन्मय प्रधान और पुरुष ही हैं ॥ १३ ॥ आप मानो पृथ्वीका भार उतारने और भक्तजनोंकी रक्षा करनेके लिये ही लीलावश अपनी मायासे मनुष्यरूप धारण-कर विचर रहे हैं ॥ १४॥ आप साक्षात् परमात्मा ही क्षत्रियकुमारके रूपमें अवतीर्ण होकर पृथिवीपर घूम रहे हैं ! आप लीलाहीसे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और (दुष्टोंका) नाश करनेमें तत्पर हैं ॥ १५ ॥ मेरी बुद्धिमें तो यही आता है कि आप सबके हृदयमें विराजमान, सबके प्रेरक, परम स्वतन्त्र भगवान् नर-नारायण ही इस लोकमें विचर रहे हैं" ॥ १६॥<br><br>तब श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! इस ब्रह्मचारीको देखो। अवश्य ही इसने सम्पूर्ण शब्दशास्त्र (व्याकरण) कई बार भली प्रकार पढ़ा है ॥ १७॥ देखो, इसने इतनी बातें कहीं किन्तु इसके बोलनेमें कहीं कोई एक भी अशुद्धि नहीं हुई।" तदनन्तर विज्ञानघन श्रीरघुनाथजीने हनुमान्जीसे कहा—॥ १८॥ "हे द्विज ! मैं दशरथका पुत्र राम हूँ और यह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है। मैं पिताकी आज्ञा मानकर अपनी स्त्री सीताके सहित वनमें आया
सर्ग १ ] किष्किन्धाकाण्ड १५३
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| आगतस्तत्र विपिने स्थितोऽहं दण्डके द्विज ॥१९॥<br>तत्र भार्या हृता सीता रक्षसा केनचिन्मम ।<br>तामन्वेष्टुमिहायातौ त्वं को वा कस्य वा वद॥२०॥ | था और यहाँ दण्डकारण्यमें रहता था। वहाँ किसी राक्षसने मेरी भार्या सीताको हर लिया। उसे ढूँढ़नेके लिये हम यहाँ आये हैं। कहिये, आप कौन हैं और किसके पुत्र हैं ? ॥ १९-२० ॥ |
| बटुरुवाच<br>सुग्रीवो नाम राजा यो वानराणां महामतिः ।<br>चतुर्भिर्मन्त्रिभिः सार्धं गिरिमूर्धनि तिष्ठति ॥२१॥<br>भ्राता कनीयान् सुग्रीवो वालिनः पापचेतसः ।<br>तेन निष्कासितो भार्या हृता तस्येह वालिना॥२२॥<br>तद्भयादृष्यमूकाख्यं गिरिमाश्रित्य संस्थितः ।<br>अहं सुग्रीवसचिवो वायुपुत्रो महामते ॥२३॥<br>हनूमान्नाम विख्यातो ह्यञ्जनीगर्भसम्भवः ।<br>तेन सख्यं त्वया युक्तं सुग्रीवेण रघूत्तम ॥२४॥<br>भार्यापहारिणं हन्तुं सहायस्ते भविष्यति ।<br>इदानीमेव गच्छाम आगच्छ यदि रोचते ॥२५॥ | ब्रह्मचारी बोले— महामति सुग्रीव वानरोंके राजा हैं। वे अपने चार मन्त्रियोंके साथ इस पर्वतके शिखरपर रहते हैं ॥ २१ ॥ वे दुष्टचित्त वालीके छोटे भाई हैं। उस वालीने उनकी स्त्री छीनकर उन्हें घरसे निकाल दिया है ॥ २२ ॥ अतः उसके भयसे वे इस ऋष्यमूक पर्वतपर ही रहते हैं। हे महामते ! मैं उन्हीं सुग्रीवका मन्त्री और वायुका पुत्र हूँ ॥ २३ ॥ मेरा जन्म माता अञ्जनीके गर्भसे हुआ है और मैं 'हनूमान्' नामसे विख्यात हूँ। हे रघुश्रेष्ठ ! आपको महाराज सुग्रीवसे मित्रता करनी चाहिये ॥ २४ ॥ वे आपकी भार्याको चुरानेवालेका वध करनेमें आपके सहायक होंगे। आइये, यदि आपकी इच्छा हो तो अभी उनके पास चलें ॥ २५ ॥ |
| श्रीराम उवाच<br>अहमप्यागतस्तेन सख्यं कर्तुं कपीश्वर ।<br>सख्युस्तस्यापि यत्कार्यं तत्करिष्याम्यसंशयम्॥२६॥ | श्रीरामचन्द्रजी बोले— हे कपीश्वर ! मैं भी उनसे मित्रता करनेके लिये ही आया हूँ। उन मित्रवरका भी जो कुछ कार्य होगा वह मैं निस्सन्दह पूर्ण कर दूँगा ॥ २६ ॥ |
| हनूमान् स्वस्वरूपेण स्थितो राममथाब्रवीत् ।<br>आरोहतां मम स्कन्धौ गच्छामः पर्वतोपरि ॥२७॥<br>यत्र तिष्ठति सुग्रीवो मन्त्रिभिर्वालिनो भयात् ।<br>तथेति तस्यारुरोह स्कन्धं रामोऽथ लक्ष्मणः॥२८॥<br>उत्पपात गिरेर्मूर्ध्नि क्षणादेव महाकपिः ।<br>वृक्षच्छायां समाश्रित्य स्थितौ तौ रामलक्ष्मणौ॥२९॥ | यह सुनकर हनूमान्जीने अपना रूप धारण कर रामसे कहा, “आइये, आप दोनों मेरे कन्धोंपर चढ़ जाइये, अब हम पर्वतके ऊपर चलते हैं, जहाँ अपने मन्त्रियोंके सहित सुग्रीव वालीके भयसे (छिपकर) रहते हैं।” तब राम और लक्ष्मण 'बहुत अच्छा' कह उनके कन्धोंपर चढ़ गये ॥ २७-२८ ॥ वानरराज हनूमान् एक क्षणमें ही पर्वतके शिखरपर कूदकर पहुँच गये। वहाँ राम और लक्ष्मण एक वृक्षकी छायामें खड़े हो गये ॥ २९ ॥ |
| हनूमानपि सुग्रीवमुपगम्य कृताञ्जलिः ।<br>व्येतु ते भयमायातो राजन् श्रीरामलक्ष्मणौ ॥३०॥<br>शीघ्रमुत्तिष्ठ रामेण सख्यं ते योजितं मया ।<br>अग्निं साक्षिणमारोप्य तेन सख्यं द्रुतं कुरु ॥३१॥<br>ततोऽतिहर्षात्सुग्रीवः समागम्य रघूत्तमम् । | इधर हनूमान्जीने सुग्रीवके पास जा उनसे हाथ जोड़कर कहा—“राजन् ! अब अपनी शंका दूर कीजिये, क्योंकि आपके यहाँ श्रीराम और लक्ष्मण पधारे हैं ॥ ३० ॥ शीघ्र उठिये, मैंने रामके साथ आपकी मित्रता होनेका योग लगा दिया है। शीघ्र ही अग्निको साक्षी करके उनसे मित्रता कीजिये ॥ ३१ ॥<br>तब सुग्रीव अति प्रसन्न होकर रघुनाथजीके पास |
२०
| १५४ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग १ . |
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वृक्षशाखां स्वयं छित्त्वा विष्टराय ददौ मुदा ॥३२॥
हनूमांल्लक्ष्मणायादात्सुग्रीवाय च लक्ष्मणः ।
हर्षेण महताऽऽविष्टाः सर्व एवावतस्थिरे ॥३३॥
लक्ष्मणस्त्वब्रवीत्सर्वं रामवृत्तान्तमादितः ।
वनवासाभिगमनं सीताहरणमेव च ॥३४॥
लक्ष्मणोक्तं वचः श्रुत्वा सुग्रीवो राममब्रवीत् ।
अहं करिष्ये राजेन्द्र सीतायाः परिमार्गणम् ॥३५॥
साहाय्यमपि ते राम करिष्ये शत्रुघातिनः ।
शृणु राम मया दृष्टं किञ्चित्ते कथयाम्यहम् ॥३६॥
एकदा मन्त्रिभिः सार्धं स्थितोऽहं गिरिमूर्धनि ।
विहायसा नीयमानां केनचित्प्रमदोत्तमाम् ॥३७॥
क्रोशन्तीं रामरामेति दृष्ट्वाऽस्मान्पर्वतोपरि ।
आमुच्याभरणान्याशु स्वोत्तरीयेण भामिनी ॥३८॥
निरीक्ष्याधः परित्यज्य क्रोशन्ती तेन रक्षसा ।
नीताऽहं भूषणान्याशु गुहायामक्षिपं प्रभो ॥३९॥
इदानीमपि पश्य त्वं जानीहि तव वा न वा ।
इत्युक्त्वाऽऽनीय रामाय दर्शयामास वानरः॥४०॥
विमुच्य रामस्तद्दृष्ट्वा हा सीतेति मुहुर्मुहुः ।
हृदि निक्षिप्य तत्सर्वं रुरोद प्राकृतो यथा ॥४१॥
आश्वास्य राघवं भ्राता लक्ष्मणे वाक्यमब्रवीत् ।
अचिरेणैव ते राम प्राप्स्यते जानकी शुभा ।
वानरेन्द्रसहायेन हत्वा रावणमाहवे ॥४२॥
सुग्रीवोऽप्याह हे राम प्रतिज्ञां करवाणि ते ।
समरे रावणं हत्वा तव दास्यामि जानकीम् ॥४३॥
ततो हनूमान्प्रज्वाल्य तयोरग्निं समीपतः ।
तावुभौ रामसुग्रीवावग्नौ साक्षिणि तिष्ठति ॥४४
| आये और प्रसन्नमनसे अपने हाथसे एक वृक्षकी शाखा तोड़कर उन्हें बैठनेके लिये आसन दिया ॥३२॥ इसी प्रकार हनुमान्जीने लक्ष्मणजीको तथा लक्ष्मणजीने सुग्रीवको आसन दिया और सब लोग अति आनन्दपूर्वक अपने-अपने आसनोंपर बैठ गये ॥३३॥ तदनन्तर लक्ष्मणजीने आरम्भसे लेकर वनमें आने और सीताजीके हरे जानेतकका रामचन्द्रजी का सारा वृत्तान्त सुनाया ॥३४॥ | लक्ष्मणजीके वचन सुनकर सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजी से कहा—"हे राजराजेश्वर ! मैं सीताजीकी खोज करूँगा ॥३५॥ और शत्रु का वध करते समय भी आपकी सहायता करूँगा। हे राम ! इस सम्बन्धमें मैंने जो कुछ देखा है वह आपको सुनाता हूँ, सुनिये ॥३६॥ | "एक दिन अपने मन्त्रियोंके साथ मैं पर्वतके शिखरपर बैठा था । उस समय हमने देखा कि कोई राक्षस किसी उत्तम कामिनीको आकाश-मार्गसे लिये जाता है ॥३७॥ वह 'राम ! राम !' कहकर विलाप कर रही थी । हमें पर्वतपर बैठे देख कर उसने तुरन्त ही अपने आभूषण उतारकर एक वस्त्रमें बाँधे और हमारी ओर देखते हुए नीचे गिरा दिये । हे प्रभो ! इसी प्रकार निरन्तर विलाप करती हुई उस अबलाको वह राक्षस ले गया। प्रभो ! मैंने तुरन्त ही उन आभूषणोंको उठाकर गुफामें रख दिया ॥३८–३९॥ आप उन्हें अभी देखिये और पहचानिये कि वे आपकी हैं या नहीं।" ऐसा कह कपिराज सुग्रीवने वे आभूषण लाकर रामको दिखाये ॥४०॥ रामचन्द्रजी ने उन्हें खोलकर देखा तो (उन्हें पहचानकर) छातीसे लगा लिया और साधारण पुरुषोंके समान वारम्बार 'हा सीते ! हा सीते !' कहकर रोने लगे ॥४१॥ | तब भाई लक्ष्मणने उन्हें ढाँढस बँधाकर कहा— "हे राम ! वानरराज सुग्रीवकी सहायतासे युद्धमें रावणको मारकर आप शीघ्र ही शुभलक्षणा जनक-नन्दिनीको प्राप्त करेंगे" ॥४२॥ सुग्रीवने भी कहा— "हे राम ! मैं आपसे प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रावण-को युद्धमें मारकर आपको सीता दिला दूँगा" ॥४३॥ | तदनन्तर हनूमान्जीने उन दोनोंके पास अग्नि प्रज्वलित की । तब निष्पाप राम और सुग्रीव दोनों ही
सर्ग १] | किष्किन्धाकाण्ड | १५५
| बाहू प्रसार्य चालिङ्गय परस्परमकल्मषौ ।<br>समीपे रघुनाथस्य सुग्रीवः समुपाविशत् ॥४५॥ | अग्निको साक्षी कर परस्पर एक-दूसरेसे भुजा फैलाकर मिले । तत्पश्चात् सुग्रीव रामचन्द्रजीके पास बैठ गये ॥४४-४५॥ |
| स्वोदन्तं कथयामास प्रणयाद्रघुनायके ।<br>सखे शृणु ममोदन्तं वालिना यत्कृतं पुरा ॥४६॥ | और अति प्रेमपूर्वक उन्हें अपना वृत्तान्त सुनाने लगे । वे बोले—"मित्र ! अब हमारी कहानी सुनो; वालीने पूर्वकालमें मेरे साथ जो कुछ किया है वह सुनाता हूँ ॥४६॥ |
| मयपुत्रोऽथ मायावी नाम्ना परमदुर्मदः ।<br>किष्किन्धां समुपागत्य वालिनं समुपाव्हयत् ॥४७॥ | एक बार अति मदोन्मत्त मय दानवके पुत्र मायावीने किष्किन्धा-पुरीमें आकर वालीको युद्धके लिये ललकारा ॥४७॥ |
| सिंहनादेन महता वाली तु तदमर्षणः ।<br>निर्ययौ क्रोधताम्राक्षो जघान दृढमुष्टिना ॥४८॥ | वह दैत्य बड़ा भारी सिंहनाद करने लगा । वाली उसका यह दर्प न देख सका, उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं और उसने बाहर आ उसके बड़े जोरसे एक घूँसा मारा ॥४८॥ |
| दुद्राव तेन संविग्नो जगाम स्वगुहां प्रति ।<br>अनुदुद्राव तं वाली मायाविनमहं तथा ॥४९॥ | उसके आघातसे व्याकुल होकर मायावी अपनी गुफाकी ओर दौड़ा । तब वाली और मैं दोनोंहीने उसका पीछा किया ॥४९॥ |
| ततः प्रविष्टमालोक्य गुहां मायाविनं रुषा ।<br>वाली मामाह तिष्ठ त्वं बहिर्गच्छाम्यहं गुहाम् ।<br>इत्युक्त्वाविश्य स गुहां मासमेकं न निर्ययौ ॥५०॥ | मायावीको गुफामें गया देखकर वालीको बड़ा रोष हुआ । उसने मुझसे कहा—"तुम यहीं रहो, मैं गुफामें जाता हूँ।" ऐसा कहकर वह गुफामें घुस गया और एक मास-तक उससे न निकला ॥५०॥ |
| मासादूर्ध्वं गुहाद्वारान्निर्गतं रुधिरं बहु ।<br>तद्दृष्ट्वा परितप्ताङ्गो मृतो वालीति दुःखितः ॥५१॥ | एक महीना बीत जाने-पर उस गुफाके द्वारसे बहुत-सा रक्त निकला । उसे देख-कर यह समझकर कि वाली मारा गया, मुझे बड़ा दुःख और सन्ताप हुआ ॥५१॥ |
| गुहाद्वारि शिलामेकां निधाय गृहमागतः ।<br>ततोऽब्रुवं मृतो वाली गुहायां रक्षसा हतः ॥५२॥ | तब (इस भयसे कि कहीं वालीको मारनेवाला दैत्य बाहर आकर मुझे भी न मार डाले) उस गुफाके द्वारपर एक शिला रखकर मैं घर लौट आया; और सबसे यह कह दिया कि वाली गुफामें राक्षसके हाथसे मारा गया ॥५२॥ |
| तच्छ्रुत्वा दुःखिताः सर्वे मामनिच्छन्तमप्युत ।<br>राज्येऽभिषेचनं चक्रुः सर्वे वानरमन्त्रिणः ॥५३॥ | यह सुनकर सबको बड़ा दुःख हुआ और मेरी इच्छा न होनेपर भी समस्त वानर-मन्त्रिमण्डलने मुझे राजपद्पर अभिषिक्त कर दिया ॥५३॥ |
| शिष्टं तदा मया राज्यं किञ्चित्कालमरिन्दम ।<br>ततः समागतो वाली मामाह परुषं रुषा ॥५४॥ | हे शत्रुदमन ! मैंने कुछ ही दिन राज्य-शासन किया होगा कि वाली आ गया और क्रोधपूर्वक मुझसे बड़ी कड़वी-कड़वी बातें कहने लगा ॥५४॥ |
| बहुधा भर्त्सयित्वा मां निजघान च मुष्टिभिः ।<br>ततो निर्गत्य नगरादधावं परया भिया ॥५५॥ | इस प्रकार, मुझे बहुत कुछ भला-बुरा कहकर वह मुझे घूँसोंसे मारने लगा । तब मैं अत्यन्त भयभीत होकर नगर छोड़कर भाग गया ॥५५॥ |
| लोकान् सर्वान्परिक्रम्य ऋष्यमूकं समाश्रितः ।<br>ऋषेः शापभयात्सोऽपि नायातीमं गिरि प्रभो ॥५६॥ | हे प्रभो ! मैंने सम्पूर्ण लोकोंमें घूमकर अन्तमें इस ऋष्यमूक-पर्वतकी शरण ली है क्योंकि ऋषिशापके भयसे वह इस पर्वत-पर नहीं आता ॥५६॥ |
| तदादि मम भार्या स स्वयं भुङ्क्ते विमूढधीः ।<br>अतो दुःखेन सन्तप्तो हृतदारो हृताश्रयः ॥५७॥ | तबसे मेरी भार्याको वह दुर्मति स्वयं भोगता है और मैं स्त्री तथा घरके छिन जानेसे मन-ही-मन कुढ़ता हुआ यहाँ रहता हूँ । आज |
१५६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १
वसाम्यद्य भवत्पादसंस्पर्शात्सुखितोऽस्म्यहम् ।
मित्रदुःखेन सन्तप्तो रामो राजीवलोचनः ॥५८॥
हनिष्यामि तव द्वेष्यं शीघ्रं भार्यापहारिणम् ।
इति प्रतिज्ञामकरोत्सुग्रीवस्य पुरस्तदा ॥५९॥
सुग्रीवोऽप्याह राजेन्द्र वाली बलवतां बली ।
कथं हनिष्यति भवान्देवैरपि दुरासदम् ॥६०॥
शृणु ते कथयिष्यामि तद्बलं बलिनां वर ।
कदाचिद्दुन्दुभिर्नाम महाकायो महाबलः ॥६१॥
किष्किन्धामगमद्राम महामहिषरूपधृक् ।
युद्धाय वालिनं रात्रौ समाह्वयत भीषणः ॥६२॥
तच्छ्रुत्वाऽसहमानोऽसौ वाली परमकोपनः ।
महिषं शृङ्गयोर्धृत्वा पातयामास भूतले ॥६३॥
पादेनैकेन तत्कायमाक्रम्यास्य शिरो महत् ।
हस्ताभ्यां भ्रामयञ्छित्त्वा तोलयित्वाक्षिपद्भुवि ॥६४॥
पपात तच्छिरो राम मातङ्गाश्रमसन्निधौ ।
योजनात्पतितं तन्मान्मुनेराश्रममण्डले ॥६५॥
रक्तवृष्टिः पपातोर्व्यान्दृष्ट्वा तां क्रोधमूर्च्छितः ।
मातङ्गो वालिनं प्राह यद्यागन्तासि मे गिरिम् ॥६६॥
इतः परं भग्नशिरा मरिष्यसि न संशयः ।
एवं शप्तस्तदारभ्य ऋष्यमूकं न यात्यसौ ॥६७॥
एतज्ज्ञात्वाहमध्येत्र वसामि भयवर्जितः ।
राम पश्य शिरस्तस्य दुन्दुभेः पर्वतोपमम् ॥६८॥
तत्क्षेपणे यदा शक्तः शक्तस्त्वं वालिनो वधे ।
इत्युक्त्वा दर्शयामास शिरस्तद्गिरिसन्निभम् ॥६९॥
आपके चरणकमलोंका स्पर्श करनेसे मुझे सुख चैन मिला है।" तब कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीने सखा सुग्रीवके दुःखसे आतुर होकर उसके सामने प्रतिज्ञा की कि 'मैं बहुत ही शीघ्र तुम्हारी पत्नीको छीननेवाले तुम्हारे शत्रु का नाश कर डालूँगा' ॥ ५७-५९॥
सुग्रीवने कहा--"हे राजेन्द्र ! वाली सम्पूर्ण योद्धाओंमें अग्रणी है, (वह कोई साधारण बलवाला नहीं है।) उसको पराजित करना देवताओंके लिये भी अति कठिन है। फिर आप उसे कैसे मार सकेंगे ? ॥ ६० ॥ हे वीरश्रेष्ठ ! सुनिये मैं आपको उसके बलका वृत्तान्त सुनाता हूँ। एक बार दुन्दुभि नामका एक बड़ा बलवान् और स्थूलकाय दैत्य किष्किन्धापुरीमें भैंसेका रूप बनाकर आया और उस महाभयानक असुरने रात्रिके समय वालीको युद्धके लिये ललकारा ॥ ६१-६२ ॥ उसकी गर्जना वालीको सहन न हुई और उसने अति क्रोधपूर्वक उस भैंसेके सींग पकड़कर उसे पृथिवीपर पटक दिया ॥ ६३ ॥ तथा अपने एक पैरसे उसके शरीरको दबाकर उसके महान् मस्तकको अपने हाथोंसे मरोड़कर तोड़ डाला और उसे उछालकर पृथिवीपर दूर फेंक दिया ॥ ६४ ॥ हे राम ! वह फिर वहाँसे एक योजन दूर मुनियोंके आश्रममण्डलमें महर्षि मतंगके आश्रमके पास जाकर गिरा ॥ ६५ ॥ उससे जहाँ-तहाँ बहुत-सा रक्त बरसा। उसे देखकर मुनिवर मतंगको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने क्रोधमें भरकर वालीसे कहा—"यदि आजसे तुम कभी मेरे इस पर्वतपर आओगे तो निस्सन्देह तुम्हारा शिर फट जायगा और तुम मर जाओगे।" हे रामजी ! मुनिके इस प्रकार शाप देनेसे ही वह तबसे इस ऋष्यमूक-पर्वतपर नहीं आता ॥ ६६-६७ ॥ ऐसा जानकर ही मैं यहाँ निर्भय होकर रहता हूँ। हे राम ! (जिसे वालीने मारा था) आप ज़रा उस दुन्दुभि दैत्यके पर्वताकार शिरको तो देखिये। (इसीसे आपको उसके बलका कुछ अनुमान हो जायगा ।) ॥ ६८ ॥ यदि आप उस मस्तकको फेंक सकेंगे तो अवश्य वालीका वध भी कर सकेंगे।"
ऐसा कहकर सुग्रीवने वह पर्वत-सदृश शिर
सर्ग १ ] किष्किन्धाकाण्ड १५७
दृष्ट्वा रामः स्मितं कृत्वा पादाङ्गुष्ठेन चाक्षिपत् ।
दशयोजनपर्यन्तं तदद्भुतमिवाभवत् ॥७०॥
साधु साध्विति सम्प्राह सुग्रीवो मन्त्रिभिः सह ।
पुनरप्याह सुग्रीवो रामं भक्तपरायणम् ॥७१॥
एते ताला महासाराः सप्त पश्य रघूत्तम ।
एकैकं चालयित्वाऽसौ निष्पत्रान्कुरुतेऽञ्जसा ॥७२॥
यदि त्वमेकबाणेन विद्ध्वा छिद्रं करोषि चेत् ।
हतस्त्वया तदा वाली विश्वासो मे प्रजायते ।
तथेति धनुरादाय सायकं तत्र सन्दधे ॥७३॥
बिभेद च तदा रामः सप्त तालान्महाबलः ।
तालान्सप्त विनिर्भिद्य गिरिं भूमिं च सायकः॥७४॥
पुनरागत्य रामस्य तूणीरे पूर्ववत्स्थितः ।
ततोऽतिहर्षात्सुग्रीवो राममाहातिविस्मितः ॥७५॥
देव त्वं जगतां नाथः परमात्मा न संशयः ।
मत्पूर्वकृतपुण्यौघैः सङ्गतोऽद्य मया सह ॥७६॥
त्वां भजन्ति महात्मानः संसारविनिवृत्तये ।
त्वां प्राप्य मोक्षसचिवं प्रार्थयेऽहं कथं भवम् ॥७७॥
दाराः पुत्रा धनं राज्यं सर्वं त्वन्मायया कृतम् ।
अतोऽहं देवदेवेश नाकाङ्क्षेऽन्यत्प्रसीद मे ॥७८॥
आनन्दानुभवं त्वाऽद्य प्राप्तोऽहं भाग्यगौरवात् ।
मृदर्थं यतमानेन निधानमिव सत्पते ॥७९॥
अनाद्यविद्यासंसिद्धं बन्धनं छिन्नमद्य नः ।
यज्ञदानतपःकर्मपूर्तेष्टादिभिरप्यसौ ॥८०॥
न जीर्यते पुनर्दाढ्यं भजते संसृतिः प्रभो ।
त्वत्पाददर्शनात्सद्यो नाशमेति न संशयः ॥८१॥
दिखलाया ॥ ६९ ॥ उसे देखकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसकाते हुए अपने पैरके अँगूठेसे उसे दश योजन दूर फेंक दिया। यह बड़े आश्चर्यकी बात हुई ॥ ७० ॥ अपने मन्त्रियोंके सहित सुग्रीव भी 'वाह ! वाह !' करने लगे और फिर वह भक्तोंके एकमात्र आश्रय भगवान् रामसे बोले—॥ ७१ ॥ "हे रघूश्रेष्ठ ! देखिये, तालके ये सात वृक्ष कैसे सुदृढ़ हैं, किन्तु वाली इनमेंसे प्रत्येकको हिलाकर अनायास ही पत्र-हीन (बे-पत्तेके) कर दिया करता है ॥ ७२ ॥ यदि आप एक बाणसे ही इन सबको बेधकर इनमें छिद्र कर देंगे तो मुझे यह विश्वास हो जायगा कि आप अवश्य ही वालीको मार डालेंगे।"
तब महाबली रघुनाथजीने 'बहुत अच्छा' कह अपना धनुष लेकर उसपर बाण चढ़ाया और उन सातों ताल-वृक्षोंको बेध दिया । तत्पश्चात् वह बाण सातों ताल, पर्वत और पृथिवीको बेधकर पहलेके समान फिर आकर रामचन्द्रजीके तरकशमें स्थित हो गया ।
तब सुग्रीवने आश्चर्यचकित होकर श्रीरामचन्द्रजीसे अत्यन्त हर्षके साथ कहा—॥ ७३–७५ ॥ "हे देव ! आप सम्पूर्ण जगत्के स्वामी साक्षात् परमात्मा हैं—इसमें सन्देह नहीं। मेरे पूर्वकृत पुण्य-पुञ्जके परिपाकसे ही आज आपसे मेरा संयोग हुआ है ॥ ७६ ॥ महात्मा लोग संसार-बन्धनकी निवृत्तिके लिये आपका भजन करते हैं, फिर आप मोक्षदायक प्रभुको पाकर मैं सांसारिक पदार्थोंकी कामना कैसे करूँ ? ॥ ७७ ॥ हे देव-देवेश्वर ! ये स्त्री, पुत्र, धन, राज्य आदि सभी आपकी मायाके कार्य हैं । अतः अब आपके अतिरिक्त और किसी पदार्थकी मुझे इच्छा नहीं है, आप मुझपर कृपा कीजिये ॥ ७८ ॥ हे सत्पते ! आप आनन्दस्वरूप हैं । मिट्टी खोदते हुए जैसे किसीको खजाना हाथ लग जाय उसी प्रकार आज बड़े भाग्यसे मुझे आपके दर्शन हुए हैं ॥ ७९ ॥ आज हमारा अनादि अविद्याजन्य बन्धन कट गया । हे प्रभो ! यह संसार-बन्धन यज्ञ, दान, तप तथा इष्टापूर्त्त आदि कर्मोंसे भी नहीं टूटता बल्कि और दृढ़ हो जाता है । किन्तु आपके चरणकमलोंका दर्शन करते ही यह तुरन्त नष्ट हो जाता है—इसमें सन्देह नहीं ॥ ८०-८१ ॥
१५८ अध्यात्मरामायण [सर्ग १
क्षणार्धमपि यच्चित्तं त्वयि तिष्ठत्यचञ्चलम् । तस्याज्ञानमनर्थानां मूलं नश्यति तत्क्षणात्॥८२॥ तत्तिष्ठतु मनो राम त्वयि नान्यत्र मे सदा ॥८३॥ रामरामेति यद्वाणी मधुरं गायति क्षणम् । स ब्रह्महा सुरापो वा मुच्यते सर्वपातकैः ॥८४॥ न काङ्क्षे विजयं राम न च दारसुखादिकम् । भक्तिमेव सदा काङ्क्षे त्वयि बन्धविमोचनीम्॥८५॥ त्वन्मायाकृतसंसारस्त्वदंशोऽहं रघूत्तम । स्वपादभक्तिमादिश्य त्राहि मां भवसङ्कटात्॥८६॥ पूर्वं मित्रार्युदासीनास्त्वन्मायाऽऽवृतचेतसः । आसन्मेऽद्य भवत्पाददर्शनादेव राघव ॥८७॥ सर्वं ब्रह्मैव मे भाति क्व मित्रं क्व च मे रिपुः । यावत्त्वन्मायया बद्धस्तावद्गुणविशेषता ॥८८॥ सा यावदस्ति नानात्वं तावद्भवति नान्यथा । यावन्नानात्वमज्ञानात्तावत्कालकृतं भयम् ॥८९॥ अतोऽविद्यामुपास्ते यः सोऽन्धे तमसि मज्जति । मायामूलमिदं सर्वं पुत्रदारादिबन्धनम् । तदुत्सारय मायां त्वं दासीं तव रघूत्तम ॥९०॥ त्वत्पादपद्मर्पितचित्तवृत्ति- स्त्वन्नामसङ्गीतकथासु वाणी । त्वद्भक्तसेवानिरतौ करौ मे त्वदङ्गसङ्गं लभतां मदङ्गम् ॥९१॥ त्वन्मूर्तिभक्तान् स्वगुरुं च चक्षुः पश्यत्वजस्रं स शृणोतु कर्णः ।
जिसका चित्त आपके स्वरूपमें आधे क्षणके लिये भी निश्चल होकर संलग्न हो जाता है उसका सम्पूर्ण अनर्थोंका मूलकारण अज्ञान तत्काल नष्ट हो जाता है, अतः हे राम ! मेरा मन सदा आपहीमें लगा रहे, वह आपको छोड़कर और कहीं भी न जाय ॥८२-८३॥ जिसकी वाणी एक क्षण भी 'राम-राम' ऐसा सुमधुर गान करती है, वह ब्रह्मघाती अथवा मद्यपी भी क्यों न हो, समस्त पापोंसे छूट जाता है ॥८४॥ हे राम! अब मुझे वालीको जीतने अथवा स्त्री आदिका सुख प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं है। मैं तो संसार-बन्धनको काटनेवाली आपकी भक्ति ही चाहता हूँ ॥८५॥ हे रघुश्रेष्ठ ! यह संसार आपकी मायाका विलास है और मैं भी आपहीका अंश हूँ। अतः अपने चरणकमलोंकी भक्ति देकर मुझे इस संसार-संकटसे बचाइये ॥८६॥ पहले, जब मेरा चित्त आपकी मायासे ढँका हुआ था, मुझे अपने शत्रु-मित्र और उदासीन दिखायी देते थे। किन्तु हे रघुनाथजी ! अब आपके चरणकमलोंका दर्शन पाते ही मुझे सब कुछ ब्रह्मरूप ही भासता है। प्रभो ! संसारमें मेरा कौन मित्र है और कौन शत्रु ? जबतक जीव आपकी मायासे बँधा रहता है तभीतक उसपर सत्त्वादि गुणोंका प्रभाव पड़ता रहता है ॥८७-८८॥ जबतक मायाका प्रभाव रहता है तभी-तक शत्रु-मित्रादि भेद-भाव रहता है। उसके दूर होते ही समस्त भेद-भाव दूर हो जाता है। और जबतक यह अज्ञानजन्य भेद-भाव रहता है तभीतक मृत्युका भय है ॥८९॥ इसलिये जो पुरुष अविद्याकी उपासना करता है (अर्थात् अविद्याजन्य पदार्थोंकी कामना करता है) वह घोर अन्धकारमें पड़ता है। ये पुत्र-स्त्री आदि सम्पूर्ण बन्धन मायामय ही हैं अतः हे रघुश्रेष्ठ ! अपनी दासीरूप इस मायाको हमसे दूर कीजिये ॥९०॥ प्रभो ! मेरी चित्तवृत्ति सदा आपके चरणकमलोंमें लगी रहे, वाणी आपके नामसंकीर्तन और कथा-वार्तामें लगी रहे, हाथ आपके भक्तोंकी सेवामें लगे रहें और मेरा शरीर (आपके पाद-स्पर्श आदिके मिससे) सदा आपका अङ्गसङ्ग करता रहे ॥९१॥ मेरे नेत्र सर्वदा आपकी मूर्ति, आपके भक्त और अपने गुरुका दर्शन करते रहें, कान निरन्तर आपके अवतारोंकी लीलाओंका श्रवण करें
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग २: वालीका वध और भगवान्के साथ उसका सम्भाषण
| सर्ग २ ] | किष्किन्धाकाण्ड | १५९ |
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त्वज्जन्मकर्माणि च पादयुग्मं<br> व्रजत्वजस्रं तव मन्दिराणि ॥९२॥<br>अङ्गानि ते पादरजोविमिश्र-<br> तीर्थानि बिभ्रत्वहिशत्रुकेतो।<br>शिरस्त्वदीयं भवपद्मजाद्यै-<br> र्जुष्टं पदं राम नमत्वजस्रम् ॥९३॥ | और मेरे पैर सदा आपके मन्दिरोंकी यात्रा करते रहें ॥ ९२ ॥ हे गरुडध्वज ! मेरा शरीर आपकी चरण-रजसे युक्त तीर्थोदकको धारण करे और मेरा शिर निरन्तर आपके उन चरणोंमें प्रणाम किया करे जिनकी शिव और ब्रह्मा आदि देवगण भी सदैव सेवा करते हैं" ॥ ९३ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे<br>प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
द्वितीय सर्ग
वालीका वध और भगवान्के साथ उसका सम्भाषण।
श्रीमहादेव उवाच|श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! इस प्रकार अपने संसर्गसे जिसके सब पाप दूर हो गये हैं उस सुग्रीवकी ओर देखते हुए श्रीरघुनाथजी कार्य सिद्ध करनेके लिये उसपर अपनी मोह उत्पन्न करनेवाली मायाका विस्तार करते हुए मुसका कर बोले—"मित्र ! तुमने मुझसे जो कुछ कहा है वह निस्सन्देह सब ठीक है ॥१-२॥ तथापि (यदि तुम राज्यादिसे उपराम हो जाओगे तो) लोग मेरेलिये कहेंगे कि रघुनाथजीने वानरराज सुग्रीवसे अग्निको साक्षी बनाकर मित्रता की; किन्तु उन्होंने उसका कौन-सा काम सिद्ध किया ? ॥ ३ ॥ इस प्रकार लोगोंमें मेरी निन्दा होगी इसमें सन्देह नहीं। अतः तुम्हारा कल्याण हो, तुम अभी जाकर वालीको युद्धके लिये ललकारो ॥ ४ ॥ मैं उसे एक ही वाणसे मारकर तुम्हें राजपदपर अभिषिक्त कर दूँगा ।" तब सुग्रीव 'बहुत अच्छा' कह तुरन्त ही किष्किन्धापुरीके उपवनमें गया और अति घोर शब्दसे गरजकर वालीको युद्धके लिये पुकारा । इत्थं स्वात्मपरिष्वङ्गनिर्धूताशेषकल्मषम् ।| रामः सुग्रीवमालोक्य सस्मितं वाक्यमब्रवीत् ॥१॥| मायां मोहकरीं तस्मिन्वितन्वन् कार्यसिद्धये ।| सखे त्वदुक्तं यत्तन्मां सत्यमेव न संशयः ॥ २ ॥| किन्तु लोका वदिष्यन्ति मामेवं रघुनन्दनः ।| कृतवान्किं कपीन्द्राय सख्यं कृत्वाऽग्निसाक्षिकम् ३| इति लोकापवादो मे भविष्यति न संशयः ।| तस्मादाह्वय भद्रं ते गत्वा युद्धाय वालिनम्॥ ४॥| बाणेनैकेन तं हत्वा राज्ये त्वामभिषेचये ।| तथेति गत्वा सुग्रीवः किष्किन्धोपवनं द्रुतम् ॥५॥| कृत्वा शब्दं महानादं समाह्वयत वालिनम् ।| तच्छ्रुत्वा भ्रातृनिनदं रोषताम्रविलोचनः ॥ ६॥|भाईका सिंहनाद सुनते ही वालीके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वह तत्काल अपने घरसे निकलकर वानरराज सुग्रीवके पास आया। उसके आते ही सुग्रीवने तुरन्त उसके वक्षःस्थलमें प्रहार किया ॥५–७॥ इसपर वालीने भी क्रोधातुर होकर सुग्रीवपर अपने दोनों घूँसोंसे प्रहार किया और सुग्रीवने वालीपर आक्रमण किया । इस प्रकार वे दोनों ही अति क्रोध- निर्जगाम गृहाच्छीघ्रं सुग्रीवो यत्र वानरः ।| तमापतन्तं सुग्रीवः शीघ्रं वक्षस्यताडयत् ॥ ७॥| सुग्रीवमपि मुष्टिभ्यां जघान क्रोधमूर्च्छितः ।|
| १६० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग २ |
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वाली तमपि सुग्रीव एवं क्रुद्धौ परस्परम् ॥ ८ ॥
अयुद्धेतामेकरूपौ दृष्ट्वा रामोऽतिविस्मितः ।
न मुमोच तदा बाणं सुग्रीववधशङ्कया ॥ ९ ॥
ततो दुद्राव सुग्रीवो वमन् रक्तं भयाकुलः ।
वाली स्वभवनं यातः सुग्रीवो राममब्रवीत् ॥ १० ॥
किं मां घातयसे राम शत्रुगा भ्रातृरूपिणा ।
यदि मद्हनने वाञ्छा त्वमेव जहि मां विभो ॥ ११ ॥
एवं मे प्रत्ययं कृत्वा सत्यवादिन् रघूत्तम ।
उपेक्षसे किमर्थं मां शरणागतवत्सल ॥ १२ ॥
श्रुत्वा सुग्रीववचनं रामः साश्रुविलोचनः ।
आलिङ्ग्य मास्म भैषीस्त्वं दृष्ट्वा वामेकरूपिणौ ॥ १३ ॥
मित्रघातित्वमाशङ्क्य मुक्तवान्सायकं नहि ।
इदानीमेव ते चिह्नं करिष्ये भ्रमशान्तये ॥ १४ ॥
गत्वाऽऽह्वय पुनः शत्रुं हतं द्रक्ष्यसि वालिनम् ।
रामोऽहं त्वां शपे भ्रातर्हनिष्यामि रिपुं क्षणात् ॥ १५ ॥
इत्याश्वास्य स सुग्रीवं रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।
सुग्रीवस्य गले पुष्पमालामामुच्य पुष्पिताम् ॥ १६ ॥
प्रेषयस्व महाभाग सुग्रीवं वालिनं प्रति ।
लक्ष्मणस्तु तदा बद्ध्वा गच्छ गच्छेति सादरम् ॥ १७ ॥
प्रेषयामास सुग्रीवं सोऽपि गत्वा तथाऽकरोत् ।
पुनरप्यद्भुतं शब्दं कृत्वा वालिनमाह्वयत् ॥ १८ ॥
तच्छ्रुत्वा विस्मितो वाली क्रोधेन महता वृतः ।
बद्ध्वा परिकरं सम्यग्गमनायोपचक्रमे ॥ १९ ॥
गच्छन्तं वालिनं तारा गृहीत्वा निषिषेध तम् ।
पूर्वक एक-दूसरेसे लड़ने लगे। उन दोनोंका रूप ऐसा समान था कि श्रीरामचन्द्रजी उन्हें देखकर आश्चर्य-चकित हो गये (और उनमेंसे कौन वाली है तथा कौन सुग्रीव ? यह न पहचान सके)। अतः इस आशंकासे कि कहीं सुग्रीव न मारा जाय, बाण नहीं छोड़ा ॥ ८-९ ॥
अन्तमें सुग्रीव भयातुर होकर रक्त वमन करता हुआ दौड़ा और वाली अपने घर चला गया। तब सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ॥ १० ॥ "हे राम ! क्या आप इस भ्रातारूपी शत्रुसे मुझे मरवाना चाहते हैं। हे प्रभो ! यदि आपकी इच्छा मुझे मरवानेकी ही है तो आप स्वयं ही मार डालिये ॥ ११ ॥ हे सत्यवादी शरणागतवत्सल रघुनाथजी ! मुझे इस प्रकार विश्वास दिलाकर अब आप मेरी उपेक्षा क्यों करते हैं?" ॥ १२ ॥
सुग्रीवके ये वचन सुनकर रामचन्द्रजीने उसे हृदयसे लगा लिया और नेत्रोंमें जल भरकर कहा—"भैया ! डरो मत, तुम दोनोंको एक रूप देखकर मैंने इस भयसे कि कहीं मित्रका वध न हो जाय, बाण नहीं छोड़ा। अब इस भ्रमको दूर करनेके लिये मैं तुम्हारे शरीरमें कोई चिह्न कर दूँगा ॥ १३-१४ ॥ एक बार तुम फिर जाकर अपने शत्रुको पुकारो। अबकी बार तुम वालीको अवश्य मरा हुआ देखोगे। भैया ! मैं राम तुम्हारी शपथ करके कहता हूँ कि इस बार मैं अवश्य एक क्षणमें ही तुम्हारे शत्रुको मार डालूँगा" ॥ १५ ॥
सुग्रीवको इस प्रकार ढाँढ़स बँधाकर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! सुग्रीवके गलेमें एक फूले हुए पुष्पोंकी माला डाल दो ॥ १६ ॥ और हे महाभाग ! इसे वालीसे लड़नेके लिये भेज दो।" तब लक्ष्मणजीने सुग्रीवके गलेमें पुष्पमाला बाँधकर उससे आदरपूर्वक 'भाई जाओ, जाओ' ऐसा कहकर भेज दिया। सुग्रीवने भी वहाँ पहुँचकर पहलेकी भाँति ही फिर बड़ा विचित्र शब्द करते हुए वालीको पुकारा ॥ १७-१८ ॥
सुग्रीवका शब्द सुनकर वालीको बड़ा विस्मय और साथ ही अत्यन्त क्रोध हुआ और वह अपनी कमर कसकर चलनेके लिये तैयार हो गया ॥ १९ ॥ जाते समय