भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग २ ]किष्किन्धाकाण्ड१५९

त्वज्जन्मकर्माणि च पादयुग्मं<br>  व्रजत्वजस्रं तव मन्दिराणि ॥९२॥<br>अङ्गानि ते पादरजोविमिश्र-<br>  तीर्थानि बिभ्रत्वहिशत्रुकेतो।<br>शिरस्त्वदीयं भवपद्मजाद्यै-<br>  र्जुष्टं पदं राम नमत्वजस्रम् ॥९३॥ | और मेरे पैर सदा आपके मन्दिरोंकी यात्रा करते रहें ॥ ९२ ॥ हे गरुडध्वज ! मेरा शरीर आपकी चरण-रजसे युक्त तीर्थोदकको धारण करे और मेरा शिर निरन्तर आपके उन चरणोंमें प्रणाम किया करे जिनकी शिव और ब्रह्मा आदि देवगण भी सदैव सेवा करते हैं" ॥ ९३ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे<br>प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीय सर्ग

वालीका वध और भगवान्‌के साथ उसका सम्भाषण।

श्रीमहादेव उवाच|श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! इस प्रकार अपने संसर्गसे जिसके सब पाप दूर हो गये हैं उस सुग्रीवकी ओर देखते हुए श्रीरघुनाथजी कार्य सिद्ध करनेके लिये उसपर अपनी मोह उत्पन्न करनेवाली मायाका विस्तार करते हुए मुसका कर बोले—"मित्र ! तुमने मुझसे जो कुछ कहा है वह निस्सन्देह सब ठीक है ॥१-२॥ तथापि (यदि तुम राज्यादिसे उपराम हो जाओगे तो) लोग मेरेलिये कहेंगे कि रघुनाथजीने वानरराज सुग्रीवसे अग्निको साक्षी बनाकर मित्रता की; किन्तु उन्होंने उसका कौन-सा काम सिद्ध किया ? ॥ ३ ॥ इस प्रकार लोगोंमें मेरी निन्दा होगी इसमें सन्देह नहीं। अतः तुम्हारा कल्याण हो, तुम अभी जाकर वालीको युद्धके लिये ललकारो ॥ ४ ॥ मैं उसे एक ही वाणसे मारकर तुम्हें राजपदपर अभिषिक्त कर दूँगा ।" तब सुग्रीव 'बहुत अच्छा' कह तुरन्त ही किष्किन्धापुरीके उपवनमें गया और अति घोर शब्दसे गरजकर वालीको युद्धके लिये पुकारा । इत्थं स्वात्मपरिष्वङ्गनिर्धूताशेषकल्मषम् ।| रामः सुग्रीवमालोक्य सस्मितं वाक्यमब्रवीत् ॥१॥| मायां मोहकरीं तस्मिन्वितन्वन् कार्यसिद्धये ।| सखे त्वदुक्तं यत्तन्मां सत्यमेव न संशयः ॥ २ ॥| किन्तु लोका वदिष्यन्ति मामेवं रघुनन्दनः ।| कृतवान्किं कपीन्द्राय सख्यं कृत्वाऽग्निसाक्षिकम् ३| इति लोकापवादो मे भविष्यति न संशयः ।| तस्मादाह्वय भद्रं ते गत्वा युद्धाय वालिनम्॥ ४॥| बाणेनैकेन तं हत्वा राज्ये त्वामभिषेचये ।| तथेति गत्वा सुग्रीवः किष्किन्धोपवनं द्रुतम् ॥५॥| कृत्वा शब्दं महानादं समाह्वयत वालिनम् ।| तच्छ्रुत्वा भ्रातृनिनदं रोषताम्रविलोचनः ॥ ६॥|भाईका सिंहनाद सुनते ही वालीके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वह तत्काल अपने घरसे निकलकर वानरराज सुग्रीवके पास आया। उसके आते ही सुग्रीवने तुरन्त उसके वक्षःस्थलमें प्रहार किया ॥५–७॥ इसपर वालीने भी क्रोधातुर होकर सुग्रीवपर अपने दोनों घूँसोंसे प्रहार किया और सुग्रीवने वालीपर आक्रमण किया । इस प्रकार वे दोनों ही अति क्रोध- निर्जगाम गृहाच्छीघ्रं सुग्रीवो यत्र वानरः ।| तमापतन्तं सुग्रीवः शीघ्रं वक्षस्यताडयत् ॥ ७॥| सुग्रीवमपि मुष्टिभ्यां जघान क्रोधमूर्च्छितः ।|

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