भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१५८ अध्यात्मरामायण [सर्ग १

क्षणार्धमपि यच्चित्तं त्वयि तिष्ठत्यचञ्चलम् । तस्याज्ञानमनर्थानां मूलं नश्यति तत्क्षणात्॥८२॥ तत्तिष्ठतु मनो राम त्वयि नान्यत्र मे सदा ॥८३॥ रामरामेति यद्वाणी मधुरं गायति क्षणम् । स ब्रह्महा सुरापो वा मुच्यते सर्वपातकैः ॥८४॥ न काङ्क्षे विजयं राम न च दारसुखादिकम् । भक्तिमेव सदा काङ्क्षे त्वयि बन्धविमोचनीम्॥८५॥ त्वन्मायाकृतसंसारस्त्वदंशोऽहं रघूत्तम । स्वपादभक्तिमादिश्य त्राहि मां भवसङ्कटात्॥८६॥ पूर्वं मित्रार्युदासीनास्त्वन्मायाऽऽवृतचेतसः । आसन्मेऽद्य भवत्पाददर्शनादेव राघव ॥८७॥ सर्वं ब्रह्मैव मे भाति क्व मित्रं क्व च मे रिपुः । यावत्त्वन्मायया बद्धस्तावद्गुणविशेषता ॥८८॥ सा यावदस्ति नानात्वं तावद्भवति नान्यथा । यावन्नानात्वमज्ञानात्तावत्कालकृतं भयम् ॥८९॥ अतोऽविद्यामुपास्ते यः सोऽन्धे तमसि मज्जति । मायामूलमिदं सर्वं पुत्रदारादिबन्धनम् । तदुत्सारय मायां त्वं दासीं तव रघूत्तम ॥९०॥ त्वत्पादपद्मर्पितचित्तवृत्ति- स्त्वन्नामसङ्गीतकथासु वाणी । त्वद्भक्तसेवानिरतौ करौ मे त्वदङ्गसङ्गं लभतां मदङ्गम् ॥९१॥ त्वन्मूर्तिभक्तान् स्वगुरुं च चक्षुः पश्यत्वजस्रं स शृणोतु कर्णः ।

जिसका चित्त आपके स्वरूपमें आधे क्षणके लिये भी निश्चल होकर संलग्न हो जाता है उसका सम्पूर्ण अनर्थोंका मूलकारण अज्ञान तत्काल नष्ट हो जाता है, अतः हे राम ! मेरा मन सदा आपहीमें लगा रहे, वह आपको छोड़कर और कहीं भी न जाय ॥८२-८३॥ जिसकी वाणी एक क्षण भी 'राम-राम' ऐसा सुमधुर गान करती है, वह ब्रह्मघाती अथवा मद्यपी भी क्यों न हो, समस्त पापोंसे छूट जाता है ॥८४॥ हे राम! अब मुझे वालीको जीतने अथवा स्त्री आदिका सुख प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं है। मैं तो संसार-बन्धनको काटनेवाली आपकी भक्ति ही चाहता हूँ ॥८५॥ हे रघुश्रेष्ठ ! यह संसार आपकी मायाका विलास है और मैं भी आपहीका अंश हूँ। अतः अपने चरणकमलोंकी भक्ति देकर मुझे इस संसार-संकटसे बचाइये ॥८६॥ पहले, जब मेरा चित्त आपकी मायासे ढँका हुआ था, मुझे अपने शत्रु-मित्र और उदासीन दिखायी देते थे। किन्तु हे रघुनाथजी ! अब आपके चरणकमलोंका दर्शन पाते ही मुझे सब कुछ ब्रह्मरूप ही भासता है। प्रभो ! संसारमें मेरा कौन मित्र है और कौन शत्रु ? जबतक जीव आपकी मायासे बँधा रहता है तभीतक उसपर सत्त्वादि गुणोंका प्रभाव पड़ता रहता है ॥८७-८८॥ जबतक मायाका प्रभाव रहता है तभी-तक शत्रु-मित्रादि भेद-भाव रहता है। उसके दूर होते ही समस्त भेद-भाव दूर हो जाता है। और जबतक यह अज्ञानजन्य भेद-भाव रहता है तभीतक मृत्युका भय है ॥८९॥ इसलिये जो पुरुष अविद्याकी उपासना करता है (अर्थात् अविद्याजन्य पदार्थोंकी कामना करता है) वह घोर अन्धकारमें पड़ता है। ये पुत्र-स्त्री आदि सम्पूर्ण बन्धन मायामय ही हैं अतः हे रघुश्रेष्ठ ! अपनी दासीरूप इस मायाको हमसे दूर कीजिये ॥९०॥ प्रभो ! मेरी चित्तवृत्ति सदा आपके चरणकमलोंमें लगी रहे, वाणी आपके नामसंकीर्तन और कथा-वार्तामें लगी रहे, हाथ आपके भक्तोंकी सेवामें लगे रहें और मेरा शरीर (आपके पाद-स्पर्श आदिके मिससे) सदा आपका अङ्गसङ्ग करता रहे ॥९१॥ मेरे नेत्र सर्वदा आपकी मूर्ति, आपके भक्त और अपने गुरुका दर्शन करते रहें, कान निरन्तर आपके अवतारोंकी लीलाओंका श्रवण करें