भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग १ ] किष्किन्धाकाण्ड १५७


दृष्ट्वा रामः स्मितं कृत्वा पादाङ्गुष्ठेन चाक्षिपत् ।
दशयोजनपर्यन्तं तदद्भुतमिवाभवत् ॥७०॥
साधु साध्विति सम्प्राह सुग्रीवो मन्त्रिभिः सह ।
पुनरप्याह सुग्रीवो रामं भक्तपरायणम् ॥७१॥
एते ताला महासाराः सप्त पश्य रघूत्तम ।
एकैकं चालयित्वाऽसौ निष्पत्रान्कुरुतेऽञ्जसा ॥७२॥
यदि त्वमेकबाणेन विद्ध्वा छिद्रं करोषि चेत् ।
हतस्त्वया तदा वाली विश्वासो मे प्रजायते ।
तथेति धनुरादाय सायकं तत्र सन्दधे ॥७३॥
बिभेद च तदा रामः सप्त तालान्महाबलः ।
तालान्सप्त विनिर्भिद्य गिरिं भूमिं च सायकः॥७४॥
पुनरागत्य रामस्य तूणीरे पूर्ववत्स्थितः ।
ततोऽतिहर्षात्सुग्रीवो राममाहातिविस्मितः ॥७५॥
देव त्वं जगतां नाथः परमात्मा न संशयः ।
मत्पूर्वकृतपुण्यौघैः सङ्गतोऽद्य मया सह ॥७६॥
त्वां भजन्ति महात्मानः संसारविनिवृत्तये ।
त्वां प्राप्य मोक्षसचिवं प्रार्थयेऽहं कथं भवम् ॥७७॥
दाराः पुत्रा धनं राज्यं सर्वं त्वन्मायया कृतम् ।
अतोऽहं देवदेवेश नाकाङ्क्षेऽन्यत्प्रसीद मे ॥७८॥
आनन्दानुभवं त्वाऽद्य प्राप्तोऽहं भाग्यगौरवात् ।
मृदर्थं यतमानेन निधानमिव सत्पते ॥७९॥
अनाद्यविद्यासंसिद्धं बन्धनं छिन्नमद्य नः ।
यज्ञदानतपःकर्मपूर्तेष्टादिभिरप्यसौ ॥८०॥
न जीर्यते पुनर्दाढ्यं भजते संसृतिः प्रभो ।
त्वत्पाददर्शनात्सद्यो नाशमेति न संशयः ॥८१॥


दिखलाया ॥ ६९ ॥ उसे देखकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसकाते हुए अपने पैरके अँगूठेसे उसे दश योजन दूर फेंक दिया। यह बड़े आश्चर्यकी बात हुई ॥ ७० ॥ अपने मन्त्रियोंके सहित सुग्रीव भी 'वाह ! वाह !' करने लगे और फिर वह भक्तोंके एकमात्र आश्रय भगवान् रामसे बोले—॥ ७१ ॥ "हे रघूश्रेष्ठ ! देखिये, तालके ये सात वृक्ष कैसे सुदृढ़ हैं, किन्तु वाली इनमेंसे प्रत्येकको हिलाकर अनायास ही पत्र-हीन (बे-पत्तेके) कर दिया करता है ॥ ७२ ॥ यदि आप एक बाणसे ही इन सबको बेधकर इनमें छिद्र कर देंगे तो मुझे यह विश्वास हो जायगा कि आप अवश्य ही वालीको मार डालेंगे।"

तब महाबली रघुनाथजीने 'बहुत अच्छा' कह अपना धनुष लेकर उसपर बाण चढ़ाया और उन सातों ताल-वृक्षोंको बेध दिया । तत्पश्चात् वह बाण सातों ताल, पर्वत और पृथिवीको बेधकर पहलेके समान फिर आकर रामचन्द्रजीके तरकशमें स्थित हो गया ।

तब सुग्रीवने आश्चर्यचकित होकर श्रीरामचन्द्रजीसे अत्यन्त हर्षके साथ कहा—॥ ७३–७५ ॥ "हे देव ! आप सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी साक्षात् परमात्मा हैं—इसमें सन्देह नहीं। मेरे पूर्वकृत पुण्य-पुञ्जके परिपाकसे ही आज आपसे मेरा संयोग हुआ है ॥ ७६ ॥ महात्मा लोग संसार-बन्धनकी निवृत्तिके लिये आपका भजन करते हैं, फिर आप मोक्षदायक प्रभुको पाकर मैं सांसारिक पदार्थोंकी कामना कैसे करूँ ? ॥ ७७ ॥ हे देव-देवेश्वर ! ये स्त्री, पुत्र, धन, राज्य आदि सभी आपकी मायाके कार्य हैं । अतः अब आपके अतिरिक्त और किसी पदार्थकी मुझे इच्छा नहीं है, आप मुझपर कृपा कीजिये ॥ ७८ ॥ हे सत्पते ! आप आनन्दस्वरूप हैं । मिट्टी खोदते हुए जैसे किसीको खजाना हाथ लग जाय उसी प्रकार आज बड़े भाग्यसे मुझे आपके दर्शन हुए हैं ॥ ७९ ॥ आज हमारा अनादि अविद्याजन्य बन्धन कट गया । हे प्रभो ! यह संसार-बन्धन यज्ञ, दान, तप तथा इष्टापूर्त्त आदि कर्मोंसे भी नहीं टूटता बल्कि और दृढ़ हो जाता है । किन्तु आपके चरणकमलोंका दर्शन करते ही यह तुरन्त नष्ट हो जाता है—इसमें सन्देह नहीं ॥ ८०-८१ ॥

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