भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१५६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १


वसाम्यद्य भवत्पादसंस्पर्शात्सुखितोऽस्म्यहम् ।
मित्रदुःखेन सन्तप्तो रामो राजीवलोचनः ॥५८॥
हनिष्यामि तव द्वेष्यं शीघ्रं भार्यापहारिणम् ।
इति प्रतिज्ञामकरोत्सुग्रीवस्य पुरस्तदा ॥५९॥

सुग्रीवोऽप्याह राजेन्द्र वाली बलवतां बली ।
कथं हनिष्यति भवान्देवैरपि दुरासदम् ॥६०॥

शृणु ते कथयिष्यामि तद्बलं बलिनां वर ।
कदाचिद्दुन्दुभिर्नाम महाकायो महाबलः ॥६१॥
किष्किन्धामगमद्राम महामहिषरूपधृक् ।
युद्धाय वालिनं रात्रौ समाह्वयत भीषणः ॥६२॥

तच्छ्रुत्वाऽसहमानोऽसौ वाली परमकोपनः ।
महिषं शृङ्गयोर्धृत्वा पातयामास भूतले ॥६३॥

पादेनैकेन तत्कायमाक्रम्यास्य शिरो महत् ।
हस्ताभ्यां भ्रामयञ्छित्त्वा तोलयित्वाक्षिपद्भुवि ॥६४॥

पपात तच्छिरो राम मातङ्गाश्रमसन्निधौ ।
योजनात्पतितं तन्मान्मुनेराश्रममण्डले ॥६५॥

रक्तवृष्टिः पपातोर्व्यान्दृष्ट्वा तां क्रोधमूर्च्छितः ।
मातङ्गो वालिनं प्राह यद्यागन्तासि मे गिरिम् ॥६६॥

इतः परं भग्नशिरा मरिष्यसि न संशयः ।
एवं शप्तस्तदारभ्य ऋष्यमूकं न यात्यसौ ॥६७॥

एतज्ज्ञात्वाहमध्येत्र वसामि भयवर्जितः ।
राम पश्य शिरस्तस्य दुन्दुभेः पर्वतोपमम् ॥६८॥

तत्क्षेपणे यदा शक्तः शक्तस्त्वं वालिनो वधे ।
इत्युक्त्वा दर्शयामास शिरस्तद्गिरिसन्निभम् ॥६९॥


आपके चरणकमलोंका स्पर्श करनेसे मुझे सुख चैन मिला है।" तब कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीने सखा सुग्रीवके दुःखसे आतुर होकर उसके सामने प्रतिज्ञा की कि 'मैं बहुत ही शीघ्र तुम्हारी पत्नीको छीननेवाले तुम्हारे शत्रु का नाश कर डालूँगा' ॥ ५७-५९॥

सुग्रीवने कहा--"हे राजेन्द्र ! वाली सम्पूर्ण योद्धाओंमें अग्रणी है, (वह कोई साधारण बलवाला नहीं है।) उसको पराजित करना देवताओंके लिये भी अति कठिन है। फिर आप उसे कैसे मार सकेंगे ? ॥ ६० ॥ हे वीरश्रेष्ठ ! सुनिये मैं आपको उसके बलका वृत्तान्त सुनाता हूँ। एक बार दुन्दुभि नामका एक बड़ा बलवान् और स्थूलकाय दैत्य किष्किन्धापुरीमें भैंसेका रूप बनाकर आया और उस महाभयानक असुरने रात्रिके समय वालीको युद्धके लिये ललकारा ॥ ६१-६२ ॥ उसकी गर्जना वालीको सहन न हुई और उसने अति क्रोधपूर्वक उस भैंसेके सींग पकड़कर उसे पृथिवीपर पटक दिया ॥ ६३ ॥ तथा अपने एक पैरसे उसके शरीरको दबाकर उसके महान् मस्तकको अपने हाथोंसे मरोड़कर तोड़ डाला और उसे उछालकर पृथिवीपर दूर फेंक दिया ॥ ६४ ॥ हे राम ! वह फिर वहाँसे एक योजन दूर मुनियोंके आश्रममण्डलमें महर्षि मतंगके आश्रमके पास जाकर गिरा ॥ ६५ ॥ उससे जहाँ-तहाँ बहुत-सा रक्त बरसा। उसे देखकर मुनिवर मतंगको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने क्रोधमें भरकर वालीसे कहा—"यदि आजसे तुम कभी मेरे इस पर्वतपर आओगे तो निस्सन्देह तुम्हारा शिर फट जायगा और तुम मर जाओगे।" हे रामजी ! मुनिके इस प्रकार शाप देनेसे ही वह तबसे इस ऋष्यमूक-पर्वतपर नहीं आता ॥ ६६-६७ ॥ ऐसा जानकर ही मैं यहाँ निर्भय होकर रहता हूँ। हे राम ! (जिसे वालीने मारा था) आप ज़रा उस दुन्दुभि दैत्यके पर्वताकार शिरको तो देखिये। (इसीसे आपको उसके बलका कुछ अनुमान हो जायगा ।) ॥ ६८ ॥ यदि आप उस मस्तकको फेंक सकेंगे तो अवश्य वालीका वध भी कर सकेंगे।"

ऐसा कहकर सुग्रीवने वह पर्वत-सदृश शिर