भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग १] | किष्किन्धाकाण्ड | १५५

बाहू प्रसार्य चालिङ्गय परस्परमकल्मषौ ।<br>समीपे रघुनाथस्य सुग्रीवः समुपाविशत् ॥४५॥अग्निको साक्षी कर परस्पर एक-दूसरेसे भुजा फैलाकर मिले । तत्पश्चात् सुग्रीव रामचन्द्रजीके पास बैठ गये ॥४४-४५॥
स्वोदन्तं कथयामास प्रणयाद्रघुनायके ।<br>सखे शृणु ममोदन्तं वालिना यत्कृतं पुरा ॥४६॥और अति प्रेमपूर्वक उन्हें अपना वृत्तान्त सुनाने लगे । वे बोले—"मित्र ! अब हमारी कहानी सुनो; वालीने पूर्वकालमें मेरे साथ जो कुछ किया है वह सुनाता हूँ ॥४६॥
मयपुत्रोऽथ मायावी नाम्ना परमदुर्मदः ।<br>किष्किन्धां समुपागत्य वालिनं समुपाव्हयत् ॥४७॥एक बार अति मदोन्मत्त मय दानवके पुत्र मायावीने किष्किन्धा-पुरीमें आकर वालीको युद्धके लिये ललकारा ॥४७॥
सिंहनादेन महता वाली तु तदमर्षणः ।<br>निर्ययौ क्रोधताम्राक्षो जघान दृढमुष्टिना ॥४८॥वह दैत्य बड़ा भारी सिंहनाद करने लगा । वाली उसका यह दर्प न देख सका, उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं और उसने बाहर आ उसके बड़े जोरसे एक घूँसा मारा ॥४८॥
दुद्राव तेन संविग्नो जगाम स्वगुहां प्रति ।<br>अनुदुद्राव तं वाली मायाविनमहं तथा ॥४९॥उसके आघातसे व्याकुल होकर मायावी अपनी गुफाकी ओर दौड़ा । तब वाली और मैं दोनोंहीने उसका पीछा किया ॥४९॥
ततः प्रविष्टमालोक्य गुहां मायाविनं रुषा ।<br>वाली मामाह तिष्ठ त्वं बहिर्गच्छाम्यहं गुहाम् ।<br>इत्युक्त्वाविश्य स गुहां मासमेकं न निर्ययौ ॥५०॥मायावीको गुफामें गया देखकर वालीको बड़ा रोष हुआ । उसने मुझसे कहा—"तुम यहीं रहो, मैं गुफामें जाता हूँ।" ऐसा कहकर वह गुफामें घुस गया और एक मास-तक उससे न निकला ॥५०॥
मासादूर्ध्वं गुहाद्वारान्निर्गतं रुधिरं बहु ।<br>तद्दृष्ट्वा परितप्ताङ्गो मृतो वालीति दुःखितः ॥५१॥एक महीना बीत जाने-पर उस गुफाके द्वारसे बहुत-सा रक्त निकला । उसे देख-कर यह समझकर कि वाली मारा गया, मुझे बड़ा दुःख और सन्ताप हुआ ॥५१॥
गुहाद्वारि शिलामेकां निधाय गृहमागतः ।<br>ततोऽब्रुवं मृतो वाली गुहायां रक्षसा हतः ॥५२॥तब (इस भयसे कि कहीं वालीको मारनेवाला दैत्य बाहर आकर मुझे भी न मार डाले) उस गुफाके द्वारपर एक शिला रखकर मैं घर लौट आया; और सबसे यह कह दिया कि वाली गुफामें राक्षसके हाथसे मारा गया ॥५२॥
तच्छ्रुत्वा दुःखिताः सर्वे मामनिच्छन्तमप्युत ।<br>राज्येऽभिषेचनं चक्रुः सर्वे वानरमन्त्रिणः ॥५३॥यह सुनकर सबको बड़ा दुःख हुआ और मेरी इच्छा न होनेपर भी समस्त वानर-मन्त्रिमण्डलने मुझे राजपद्पर अभिषिक्त कर दिया ॥५३॥
शिष्टं तदा मया राज्यं किञ्चित्कालमरिन्दम ।<br>ततः समागतो वाली मामाह परुषं रुषा ॥५४॥हे शत्रुदमन ! मैंने कुछ ही दिन राज्य-शासन किया होगा कि वाली आ गया और क्रोधपूर्वक मुझसे बड़ी कड़वी-कड़वी बातें कहने लगा ॥५४॥
बहुधा भर्त्सयित्वा मां निजघान च मुष्टिभिः ।<br>ततो निर्गत्य नगरादधावं परया भिया ॥५५॥इस प्रकार, मुझे बहुत कुछ भला-बुरा कहकर वह मुझे घूँसोंसे मारने लगा । तब मैं अत्यन्त भयभीत होकर नगर छोड़कर भाग गया ॥५५॥
लोकान् सर्वान्परिक्रम्य ऋष्यमूकं समाश्रितः ।<br>ऋषेः शापभयात्सोऽपि नायातीमं गिरि प्रभो ॥५६॥हे प्रभो ! मैंने सम्पूर्ण लोकोंमें घूमकर अन्तमें इस ऋष्यमूक-पर्वतकी शरण ली है क्योंकि ऋषिशापके भयसे वह इस पर्वत-पर नहीं आता ॥५६॥
तदादि मम भार्या स स्वयं भुङ्क्ते विमूढधीः ।<br>अतो दुःखेन सन्तप्तो हृतदारो हृताश्रयः ॥५७॥तबसे मेरी भार्याको वह दुर्मति स्वयं भोगता है और मैं स्त्री तथा घरके छिन जानेसे मन-ही-मन कुढ़ता हुआ यहाँ रहता हूँ । आज