भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१५४अध्यात्मरामायण[सर्ग १ .

वृक्षशाखां स्वयं छित्त्वा विष्टराय ददौ मुदा ॥३२॥
हनूमांल्लक्ष्मणायादात्सुग्रीवाय च लक्ष्मणः ।
हर्षेण महताऽऽविष्टाः सर्व एवावतस्थिरे ॥३३॥
लक्ष्मणस्त्वब्रवीत्सर्वं रामवृत्तान्तमादितः ।
वनवासाभिगमनं सीताहरणमेव च ॥३४॥

लक्ष्मणोक्तं वचः श्रुत्वा सुग्रीवो राममब्रवीत् ।
अहं करिष्ये राजेन्द्र सीतायाः परिमार्गणम् ॥३५॥
साहाय्यमपि ते राम करिष्ये शत्रुघातिनः ।
शृणु राम मया दृष्टं किञ्चित्ते कथयाम्यहम् ॥३६॥
एकदा मन्त्रिभिः सार्धं स्थितोऽहं गिरिमूर्धनि ।
विहायसा नीयमानां केनचित्प्रमदोत्तमाम् ॥३७॥
क्रोशन्तीं रामरामेति दृष्ट्वाऽस्मान्पर्वतोपरि ।
आमुच्याभरणान्याशु स्वोत्तरीयेण भामिनी ॥३८॥
निरीक्ष्याधः परित्यज्य क्रोशन्ती तेन रक्षसा ।
नीताऽहं भूषणान्याशु गुहायामक्षिपं प्रभो ॥३९॥
इदानीमपि पश्य त्वं जानीहि तव वा न वा ।
इत्युक्त्वाऽऽनीय रामाय दर्शयामास वानरः॥४०॥
विमुच्य रामस्तद्दृष्ट्वा हा सीतेति मुहुर्मुहुः ।
हृदि निक्षिप्य तत्सर्वं रुरोद प्राकृतो यथा ॥४१॥

आश्वास्य राघवं भ्राता लक्ष्मणे वाक्यमब्रवीत् ।
अचिरेणैव ते राम प्राप्स्यते जानकी शुभा ।
वानरेन्द्रसहायेन हत्वा रावणमाहवे ॥४२॥
सुग्रीवोऽप्याह हे राम प्रतिज्ञां करवाणि ते ।
समरे रावणं हत्वा तव दास्यामि जानकीम् ॥४३॥
ततो हनूमान्प्रज्वाल्य तयोरग्निं समीपतः ।
तावुभौ रामसुग्रीवावग्नौ साक्षिणि तिष्ठति ॥४४

| आये और प्रसन्नमनसे अपने हाथसे एक वृक्षकी शाखा तोड़कर उन्हें बैठनेके लिये आसन दिया ॥३२॥ इसी प्रकार हनुमान्‌जीने लक्ष्मणजीको तथा लक्ष्मणजीने सुग्रीवको आसन दिया और सब लोग अति आनन्दपूर्वक अपने-अपने आसनोंपर बैठ गये ॥३३॥ तदनन्तर लक्ष्मणजीने आरम्भसे लेकर वनमें आने और सीताजीके हरे जानेतकका रामचन्द्रजी का सारा वृत्तान्त सुनाया ॥३४॥ | लक्ष्मणजीके वचन सुनकर सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजी से कहा—"हे राजराजेश्वर ! मैं सीताजीकी खोज करूँगा ॥३५॥ और शत्रु का वध करते समय भी आपकी सहायता करूँगा। हे राम ! इस सम्बन्धमें मैंने जो कुछ देखा है वह आपको सुनाता हूँ, सुनिये ॥३६॥ | "एक दिन अपने मन्त्रियोंके साथ मैं पर्वतके शिखरपर बैठा था । उस समय हमने देखा कि कोई राक्षस किसी उत्तम कामिनीको आकाश-मार्गसे लिये जाता है ॥३७॥ वह 'राम ! राम !' कहकर विलाप कर रही थी । हमें पर्वतपर बैठे देख कर उसने तुरन्त ही अपने आभूषण उतारकर एक वस्त्रमें बाँधे और हमारी ओर देखते हुए नीचे गिरा दिये । हे प्रभो ! इसी प्रकार निरन्तर विलाप करती हुई उस अबलाको वह राक्षस ले गया। प्रभो ! मैंने तुरन्त ही उन आभूषणोंको उठाकर गुफामें रख दिया ॥३८–३९॥ आप उन्हें अभी देखिये और पहचानिये कि वे आपकी हैं या नहीं।" ऐसा कह कपिराज सुग्रीवने वे आभूषण लाकर रामको दिखाये ॥४०॥ रामचन्द्रजी ने उन्हें खोलकर देखा तो (उन्हें पहचानकर) छातीसे लगा लिया और साधारण पुरुषोंके समान वारम्बार 'हा सीते ! हा सीते !' कहकर रोने लगे ॥४१॥ | तब भाई लक्ष्मणने उन्हें ढाँढस बँधाकर कहा— "हे राम ! वानरराज सुग्रीवकी सहायतासे युद्धमें रावणको मारकर आप शीघ्र ही शुभलक्षणा जनक-नन्दिनीको प्राप्त करेंगे" ॥४२॥ सुग्रीवने भी कहा— "हे राम ! मैं आपसे प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रावण-को युद्धमें मारकर आपको सीता दिला दूँगा" ॥४३॥ | तदनन्तर हनूमान्जीने उन दोनोंके पास अग्नि प्रज्वलित की । तब निष्पाप राम और सुग्रीव दोनों ही