अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग १ ] किष्किन्धाकाण्ड १५३
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| आगतस्तत्र विपिने स्थितोऽहं दण्डके द्विज ॥१९॥<br>तत्र भार्या हृता सीता रक्षसा केनचिन्मम ।<br>तामन्वेष्टुमिहायातौ त्वं को वा कस्य वा वद॥२०॥ | था और यहाँ दण्डकारण्यमें रहता था। वहाँ किसी राक्षसने मेरी भार्या सीताको हर लिया। उसे ढूँढ़नेके लिये हम यहाँ आये हैं। कहिये, आप कौन हैं और किसके पुत्र हैं ? ॥ १९-२० ॥ |
| बटुरुवाच<br>सुग्रीवो नाम राजा यो वानराणां महामतिः ।<br>चतुर्भिर्मन्त्रिभिः सार्धं गिरिमूर्धनि तिष्ठति ॥२१॥<br>भ्राता कनीयान् सुग्रीवो वालिनः पापचेतसः ।<br>तेन निष्कासितो भार्या हृता तस्येह वालिना॥२२॥<br>तद्भयादृष्यमूकाख्यं गिरिमाश्रित्य संस्थितः ।<br>अहं सुग्रीवसचिवो वायुपुत्रो महामते ॥२३॥<br>हनूमान्नाम विख्यातो ह्यञ्जनीगर्भसम्भवः ।<br>तेन सख्यं त्वया युक्तं सुग्रीवेण रघूत्तम ॥२४॥<br>भार्यापहारिणं हन्तुं सहायस्ते भविष्यति ।<br>इदानीमेव गच्छाम आगच्छ यदि रोचते ॥२५॥ | ब्रह्मचारी बोले— महामति सुग्रीव वानरोंके राजा हैं। वे अपने चार मन्त्रियोंके साथ इस पर्वतके शिखरपर रहते हैं ॥ २१ ॥ वे दुष्टचित्त वालीके छोटे भाई हैं। उस वालीने उनकी स्त्री छीनकर उन्हें घरसे निकाल दिया है ॥ २२ ॥ अतः उसके भयसे वे इस ऋष्यमूक पर्वतपर ही रहते हैं। हे महामते ! मैं उन्हीं सुग्रीवका मन्त्री और वायुका पुत्र हूँ ॥ २३ ॥ मेरा जन्म माता अञ्जनीके गर्भसे हुआ है और मैं 'हनूमान्' नामसे विख्यात हूँ। हे रघुश्रेष्ठ ! आपको महाराज सुग्रीवसे मित्रता करनी चाहिये ॥ २४ ॥ वे आपकी भार्याको चुरानेवालेका वध करनेमें आपके सहायक होंगे। आइये, यदि आपकी इच्छा हो तो अभी उनके पास चलें ॥ २५ ॥ |
| श्रीराम उवाच<br>अहमप्यागतस्तेन सख्यं कर्तुं कपीश्वर ।<br>सख्युस्तस्यापि यत्कार्यं तत्करिष्याम्यसंशयम्॥२६॥ | श्रीरामचन्द्रजी बोले— हे कपीश्वर ! मैं भी उनसे मित्रता करनेके लिये ही आया हूँ। उन मित्रवरका भी जो कुछ कार्य होगा वह मैं निस्सन्दह पूर्ण कर दूँगा ॥ २६ ॥ |
| हनूमान् स्वस्वरूपेण स्थितो राममथाब्रवीत् ।<br>आरोहतां मम स्कन्धौ गच्छामः पर्वतोपरि ॥२७॥<br>यत्र तिष्ठति सुग्रीवो मन्त्रिभिर्वालिनो भयात् ।<br>तथेति तस्यारुरोह स्कन्धं रामोऽथ लक्ष्मणः॥२८॥<br>उत्पपात गिरेर्मूर्ध्नि क्षणादेव महाकपिः ।<br>वृक्षच्छायां समाश्रित्य स्थितौ तौ रामलक्ष्मणौ॥२९॥ | यह सुनकर हनूमान्जीने अपना रूप धारण कर रामसे कहा, “आइये, आप दोनों मेरे कन्धोंपर चढ़ जाइये, अब हम पर्वतके ऊपर चलते हैं, जहाँ अपने मन्त्रियोंके सहित सुग्रीव वालीके भयसे (छिपकर) रहते हैं।” तब राम और लक्ष्मण 'बहुत अच्छा' कह उनके कन्धोंपर चढ़ गये ॥ २७-२८ ॥ वानरराज हनूमान् एक क्षणमें ही पर्वतके शिखरपर कूदकर पहुँच गये। वहाँ राम और लक्ष्मण एक वृक्षकी छायामें खड़े हो गये ॥ २९ ॥ |
| हनूमानपि सुग्रीवमुपगम्य कृताञ्जलिः ।<br>व्येतु ते भयमायातो राजन् श्रीरामलक्ष्मणौ ॥३०॥<br>शीघ्रमुत्तिष्ठ रामेण सख्यं ते योजितं मया ।<br>अग्निं साक्षिणमारोप्य तेन सख्यं द्रुतं कुरु ॥३१॥<br>ततोऽतिहर्षात्सुग्रीवः समागम्य रघूत्तमम् । | इधर हनूमान्जीने सुग्रीवके पास जा उनसे हाथ जोड़कर कहा—“राजन् ! अब अपनी शंका दूर कीजिये, क्योंकि आपके यहाँ श्रीराम और लक्ष्मण पधारे हैं ॥ ३० ॥ शीघ्र उठिये, मैंने रामके साथ आपकी मित्रता होनेका योग लगा दिया है। शीघ्र ही अग्निको साक्षी करके उनसे मित्रता कीजिये ॥ ३१ ॥<br>तब सुग्रीव अति प्रसन्न होकर रघुनाथजीके पास |
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