भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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'१५२अध्यात्मरामायण[ सर्ग १

स्थित्वा ददर्श तौ यान्तावारुरोह गिरेः शिरः॥ ७॥
भयादाह हनूमन्तं कौ तौ वीरवरौ सखे ।
गच्छ जानीहि भद्रं ते बटुर्भूत्वा द्विजाकृतिः ॥८॥
वालिना प्रेषितौ किंवा मां हन्तुं समुपागतौ ।
ताभ्यां सम्भाषणं कृत्वा जानीहि हृदयं तयोः॥९॥
यदि तौ दुष्टहृदयौ संज्ञां कुरु कराग्रतः ।
विनयावनतो भूत्वा एवं जानीहि निश्चयम् ॥१०॥

तथेति वटुरूपेण हनुमान् समुपागतः ।
विनयावनतो भूत्वा रामं नत्वेदमब्रवीत् ॥११॥
कौ युवां पुरुषव्याघ्रौ युवानौ वीरसम्मतौ ।
द्योतयन्तौ दिशः सर्वाः प्रभया भास्कराविवा॥ १२॥
युवां त्रैलोक्यकर्ताराविति भाति मनो मम ।
युवां प्रधानपुरुषौ जगद्धेतू जगन्मयौ ॥१३॥
मायया मानुषाकारौ चरन्ताविच लीलया ।
भूभारहरणार्थाय भक्तानां पालनाय च ॥१४॥
अवतीर्णाविह परौ चरन्तौ क्षत्रियाकृती ।
जगत्स्थितिलयौ सर्गं लीलया कर्तुमुद्यतौ ॥१५॥
स्वतन्त्रौ प्रेरकौ सर्वहृदयस्थाविहेश्वरौ ।
नरनारायणौ लोके चरन्ताविति मे मतिः ॥१६॥

श्रीरामो लक्ष्मणं प्राह पश्यैनं वटुरूपिणम् ।
शब्दशास्त्रमशेषेण श्रुतं नूनमनेकधा ॥१७॥
अनेन भाषितं कृत्स्नं न किञ्चिदपशब्दितम् ।
ततः प्राह हनूमन्तं राघवो ज्ञानविग्रहः ॥१८॥
अहं दाशरथी रामस्त्वयं मे लक्ष्मणोऽनुजः ।
सीतया भार्यया सार्धं पितुर्वचनगौरवात् ॥१९॥ | जाते देखा और वह सबसे ऊँचे शिखरपर चढ़ गया ॥ ७॥ फिर भयभीत होकर हनुमान्जीसे बोला— "मित्र ! देखो, ये दो वीरवर कौन हैं। तुम्हारा कल्याण हो, तुम ब्राह्मण ब्रह्मचारीके वेषमें उनके पास जाकर यह मालूम तो करो ॥ ८॥ तुम उनसे बातचीत करके उनके यहाँ आनेका अभिप्राय मालूम करना । ऐसा न हो, वे वालीके भेजनेसे मुझे मारनेके लिये आ रहे हों ॥ ९ ॥ यदि तुम्हें उनका हृदय दूषित मालूम हो तो अपनी अंगुलीसे मुझे संकेत कर देना । देखो, बड़े विनीत होकर यह सब भेद मालूम कर लेना ॥ १०॥<br><br>तब हनुमान्‌जी सुग्रीवसे 'जो आज्ञा' कह ब्रह्मचारीका वेष बनाकर रघुनाथजीके पास आये और बड़ी नम्रतासे उन्हें नमस्कार कर बोले—॥ ११॥ "हे पुरुषव्याघ्र! आप दोनों कौन हैं? आपकी युवावस्था है और आप बड़े वीर मालूम होते हैं। अहो! अपने शरीरकी कान्तिसे आपने समस्त दिशाओंको सूर्यके समान प्रकाशमान कर रक्खा है ॥ १२॥ मेरा मन तो यह कहता है कि आप दोनों त्रिलोकीके रचनेवाले संसारके कारणभूत जगन्मय प्रधान और पुरुष ही हैं ॥ १३ ॥ आप मानो पृथ्वीका भार उतारने और भक्तजनोंकी रक्षा करनेके लिये ही लीलावश अपनी मायासे मनुष्यरूप धारण-कर विचर रहे हैं ॥ १४॥ आप साक्षात् परमात्मा ही क्षत्रियकुमारके रूपमें अवतीर्ण होकर पृथिवीपर घूम रहे हैं ! आप लीलाहीसे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और (दुष्टोंका) नाश करनेमें तत्पर हैं ॥ १५ ॥ मेरी बुद्धिमें तो यही आता है कि आप सबके हृदयमें विराजमान, सबके प्रेरक, परम स्वतन्त्र भगवान् नर-नारायण ही इस लोकमें विचर रहे हैं" ॥ १६॥<br><br>तब श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! इस ब्रह्मचारीको देखो। अवश्य ही इसने सम्पूर्ण शब्दशास्त्र (व्याकरण) कई बार भली प्रकार पढ़ा है ॥ १७॥ देखो, इसने इतनी बातें कहीं किन्तु इसके बोलनेमें कहीं कोई एक भी अशुद्धि नहीं हुई।" तदनन्तर विज्ञानघन श्रीरघुनाथजीने हनुमान्जीसे कहा—॥ १८॥ "हे द्विज ! मैं दशरथका पुत्र राम हूँ और यह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है। मैं पिताकी आज्ञा मानकर अपनी स्त्री सीताके सहित वनमें आया