भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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अध्यात्मरामायण

किष्किन्धाकाण्ड


प्रथम सर्ग

सुग्रीवसे भेंट।

श्रीमहादेव उवाच**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके सहित धीरे-धीरे पम्पासरके तटपर आये। उस सुन्दर सरोवरको देखकर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ ॥ १ ॥ उसका विस्तार एक कोशका था और उसमें अति निर्मल अगाध जल भरा हुआ था तथा सब ओर खिले हुए कमल, कह्लार, कुमुद और उत्पल आदि सुशोभित हो रहे थे ॥ २ ॥ उस सरोवरमें जहाँ-तहाँ हंस और कारण्डव आदि पक्षी विहार कर रहे थे, चक्रवाकादि उसकी शोभा बढ़ा रहे थे और जलकुक्कुट, कोयष्टि तथा क्रौंच आदि पक्षियोंके कलरवसे वह शब्दायमान हो रहा था ॥ ३ ॥ वह चित्र-विचित्र पुष्प-लताओंसे परिपूर्ण और नाना प्रकारके फलवाले वृक्षोंसे घिरा हुआ था तथा उसका कमलकेशरसे सुवासित जल सज्जनोंके चित्तके समान स्वच्छ था ॥ ४ ॥
ततः सलक्ष्मणो रामः शनैः पम्पासरस्तटम् ।<br>आगत्य सरसां श्रेष्ठं दृष्ट्वा विस्मयमाययौ ॥ १ ॥<br><br>क्रोशमात्रं सुविस्तीर्णमगाधामलशम्बरम् ।<br>उत्फुल्लाम्बुजकह्लारकुमुदोत्पलमण्डितम् ॥ २ ॥<br><br>हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकादिशोभितम् ।<br>जलकुक्कुटकोयष्टिकौञ्चनादोपनादितम् ॥ ३ ॥<br><br>नानापुष्पलताकीर्णं नानाफलसमावृतम् ।<br>सतां मनःस्वच्छजलं पद्मकिञ्जल्कवासितम् ॥ ४ ॥
तत्रोपस्पृश्य सलिलं पीत्वा श्रमहरं विभुः ।<br>सानुजः सरसस्तीरे शीतलेन पथा ययौ ॥ ५ ॥<br><br>ऋष्यमूकगिरेः पार्श्वे गच्छन्तौ रामलक्ष्मणौ ।<br>धनुर्वाणकरौ दान्तौ जटावल्कलमण्डितौ ।<br>पश्यन्तौ विविधान्वृक्षान् गिरेः शोभां सुविक्रमौ ॥ ६ ॥<br><br>सुग्रीवस्तु गिरेर्मूर्ध्नि चतुर्भिः सह वानरैः ।वहाँ पहुँचनेपर छोटे भाई लक्ष्मणके सहित प्रभु रामने आचमनकर उस सरोवरका श्रमहारी शीतल जल पीया और फिर उसके किनारे-किनारे शीतल छायायुक्त मार्गसे चलने लगे ॥ ५ ॥ इस प्रकार जटा-वल्कलविभूषित जितेन्द्रिय परम पराक्रमी राम और लक्ष्मण, जब हाथमें धनुष-बाण लिये विविध वृक्षों और पर्वतकी शोभाको निहारते हुए ऋष्यमूक पर्वतकी बगलमें चल रहे थे ॥ ६ ॥ उस समय अपने चार मन्त्रियोंके सहित गिरि-शिखरपर बैठे हुए सुग्रीवने उन्हें उधर