भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 423 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 185
१६०अध्यात्मरामायण[सर्ग २

वाली तमपि सुग्रीव एवं क्रुद्धौ परस्परम् ॥ ८ ॥
अयुद्धेतामेकरूपौ दृष्ट्वा रामोऽतिविस्मितः ।
न मुमोच तदा बाणं सुग्रीववधशङ्कया ॥ ९ ॥
ततो दुद्राव सुग्रीवो वमन् रक्तं भयाकुलः ।
वाली स्वभवनं यातः सुग्रीवो राममब्रवीत् ॥ १० ॥
किं मां घातयसे राम शत्रुगा भ्रातृरूपिणा ।
यदि मद्हनने वाञ्छा त्वमेव जहि मां विभो ॥ ११ ॥
एवं मे प्रत्ययं कृत्वा सत्यवादिन् रघूत्तम ।
उपेक्षसे किमर्थं मां शरणागतवत्सल ॥ १२ ॥

श्रुत्वा सुग्रीववचनं रामः साश्रुविलोचनः ।
आलिङ्ग्य मास्म भैषीस्त्वं दृष्ट्वा वामेकरूपिणौ ॥ १३ ॥
मित्रघातित्वमाशङ्क्य मुक्तवान्सायकं नहि ।
इदानीमेव ते चिह्नं करिष्ये भ्रमशान्तये ॥ १४ ॥
गत्वाऽऽह्वय पुनः शत्रुं हतं द्रक्ष्यसि वालिनम् ।
रामोऽहं त्वां शपे भ्रातर्हनिष्यामि रिपुं क्षणात् ॥ १५ ॥
इत्याश्वास्य स सुग्रीवं रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।
सुग्रीवस्य गले पुष्पमालामामुच्य पुष्पिताम् ॥ १६ ॥
प्रेषयस्व महाभाग सुग्रीवं वालिनं प्रति ।
लक्ष्मणस्तु तदा बद्ध्वा गच्छ गच्छेति सादरम् ॥ १७ ॥
प्रेषयामास सुग्रीवं सोऽपि गत्वा तथाऽकरोत् ।
पुनरप्यद्भुतं शब्दं कृत्वा वालिनमाह्वयत् ॥ १८ ॥

तच्छ्रुत्वा विस्मितो वाली क्रोधेन महता वृतः ।
बद्ध्वा परिकरं सम्यग्गमनायोपचक्रमे ॥ १९ ॥
गच्छन्तं वालिनं तारा गृहीत्वा निषिषेध तम् ।


पूर्वक एक-दूसरेसे लड़ने लगे। उन दोनोंका रूप ऐसा समान था कि श्रीरामचन्द्रजी उन्हें देखकर आश्चर्य-चकित हो गये (और उनमेंसे कौन वाली है तथा कौन सुग्रीव ? यह न पहचान सके)। अतः इस आशंकासे कि कहीं सुग्रीव न मारा जाय, बाण नहीं छोड़ा ॥ ८-९ ॥

अन्तमें सुग्रीव भयातुर होकर रक्त वमन करता हुआ दौड़ा और वाली अपने घर चला गया। तब सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ॥ १० ॥ "हे राम ! क्या आप इस भ्रातारूपी शत्रुसे मुझे मरवाना चाहते हैं। हे प्रभो ! यदि आपकी इच्छा मुझे मरवानेकी ही है तो आप स्वयं ही मार डालिये ॥ ११ ॥ हे सत्यवादी शरणागतवत्सल रघुनाथजी ! मुझे इस प्रकार विश्वास दिलाकर अब आप मेरी उपेक्षा क्यों करते हैं?" ॥ १२ ॥

सुग्रीवके ये वचन सुनकर रामचन्द्रजीने उसे हृदयसे लगा लिया और नेत्रोंमें जल भरकर कहा—"भैया ! डरो मत, तुम दोनोंको एक रूप देखकर मैंने इस भयसे कि कहीं मित्रका वध न हो जाय, बाण नहीं छोड़ा। अब इस भ्रमको दूर करनेके लिये मैं तुम्हारे शरीरमें कोई चिह्न कर दूँगा ॥ १३-१४ ॥ एक बार तुम फिर जाकर अपने शत्रुको पुकारो। अबकी बार तुम वालीको अवश्य मरा हुआ देखोगे। भैया ! मैं राम तुम्हारी शपथ करके कहता हूँ कि इस बार मैं अवश्य एक क्षणमें ही तुम्हारे शत्रुको मार डालूँगा" ॥ १५ ॥

सुग्रीवको इस प्रकार ढाँढ़स बँधाकर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! सुग्रीवके गलेमें एक फूले हुए पुष्पोंकी माला डाल दो ॥ १६ ॥ और हे महाभाग ! इसे वालीसे लड़नेके लिये भेज दो।" तब लक्ष्मणजीने सुग्रीवके गलेमें पुष्पमाला बाँधकर उससे आदरपूर्वक 'भाई जाओ, जाओ' ऐसा कहकर भेज दिया। सुग्रीवने भी वहाँ पहुँचकर पहलेकी भाँति ही फिर बड़ा विचित्र शब्द करते हुए वालीको पुकारा ॥ १७-१८ ॥

सुग्रीवका शब्द सुनकर वालीको बड़ा विस्मय और साथ ही अत्यन्त क्रोध हुआ और वह अपनी कमर कसकर चलनेके लिये तैयार हो गया ॥ १९ ॥ जाते समय

अध्यात्म रामायण · पृष्ठ 185, कुल 423 में से · BharatKosha