अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
DevanagariHindipublished423 पृष्ठ
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| सर्ग २ ] | ·किष्किन्धाकाण्ड | १६१ |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| न गन्तव्यं त्वयेदानीं शङ्का मेऽतीव जायते ॥२०॥<br><br>इदानीमेव ते भग्नः पुनरायाति सत्वरः।<br>सहायो बलवांस्तस्य कश्चिन्नूनं समागतः ॥२१॥<br><br>वाली तामाह हे सुभ्रु शङ्का ते व्येतु तद्गता ।<br>प्रिये करं परित्यज्य गच्छ गच्छामि तं रिपुम् ॥२२॥<br><br>हत्वा शीघ्रं समायास्ये सहायस्तस्य को भवेत् ।<br>सहायो यदि सुग्रीवस्ततो हत्वोभयं क्षणात् ॥२३॥<br><br>आयास्ये मा शुचः शूरः कथं तिष्ठेद्गृहे रिपुम्।<br>ज्ञात्वाऽप्याह्वयमानं हि हत्वाऽऽयास्यामि सुन्दरि ॥<br><br>तारोवाच<br>मत्तोऽन्यच्छृणु राजेन्द्र श्रुत्वा कुरु यथोचितम् ।<br>आह मामङ्गदः पुत्रो मृगयायां श्रुतं वचः ॥२५॥<br><br>अयोध्याधिपतिः श्रीमान् रामो दाशरथिः किल<br>लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया भार्यया सह ॥२६॥<br><br>आगतो दण्डकारण्यं तत्र सीता हृता किल ।<br>रावणेन सह भ्रात्रा मार्गमाणोऽथ जानकीम् ॥२७॥<br><br>आगतो ऋष्यमूकाद्रिं सुग्रीवेण समागतः ।<br>चकार तेन सुग्रीवः सख्यं चानलसाक्षिकम् ॥२८॥<br><br>प्रतिज्ञां कृतवान् रामः सुग्रीवाय सलक्ष्मणः।<br>वालिनं समरे हत्वा राजानं त्वां करोम्यहम् ॥२९॥<br><br>इति निश्चित्य तौ यातौ निश्चितं शृणु मद्वचः।<br>इदानीमेव ते भग्नः कथं पुनरुपागतः ॥३०॥<br><br>अतस्त्वं सर्वथा वैरं त्यक्त्वा सुग्रीवमानय ।<br>यौवराज्येऽभिषिञ्चाशु रामं त्वं शरणं व्रज ॥३१॥<br>२१ | उसकी स्त्री ताराने उसका हाथ पकड़कर रोका और कहा—"देव ! इस समय आप न जाइये, मेरे हृदयमें बड़ी शंका हो रही है ॥२०॥ यह अभी-अभी आपसे मार खाकर भागा था, तो भी तुरन्त ही लौट आया ! इससे मालूम होता है कि अवश्य ही इसे कोई बलवान् सहायक मिल गया है" ॥२१॥<br><br>वालीने कहा—"हे सुन्दर भृकुटिवाली ! तुम इस विषयमें कोई शंका न करो। हे प्रिये ! मेरा हाथ छोड़कर तुम घर लौट जाओ, मैं भी अभी जाकर उस शत्रुको मारकर लौट आता हूँ। उस (अभागे) को भला कौन सहायक मिलेगा ? और यदि कोई होगा भी, तो मैं एक क्षणमें ही दोनोंको मारकर आ जाऊँगा । हे सुन्दरि ! तुम किसी प्रकारकी चिन्ता न करो। (मैं इस समय रुक नहीं सकता) शत्रुको बाहरसे युद्धके लिये ललकारता हुआ जानकर कोई शूरवीर अपने घरमें कैसे ठहर सकता है ? अतः अब मैं उसे मारकर ही लौटूंगा” ॥ २२—२४॥<br><br>तारा बोली—हे राजेन्द्र ! आप मुझसे कुछ और भी वृत्तान्त सुन लीजिये । उसे सुनकर जो उचित समझें करें। मुझसे आपके पुत्र अंगदने मृगयाके समय (वनमें) सुनी हुई यह बात कही थी ॥ २५ ॥ कि अयोध्याधिपति दशरथनन्दन भगवान् रामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मण और भार्या सीताके सहित दण्डकारण्यमें आये थे। वहाँ उनकी प्रिया सीताको रावण हर ले गया। अब वे अपने भाईके सहित जानकी-जीको ढूँढ़ते हुए ऋष्यमूक-पर्वतपर आकर सुग्रीवसे मिले हैं। वहाँ सुग्रीवने उनसे अग्निको साक्षी कर मित्रता जोड़ी है ॥ २६-२८ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीके सहित सुग्रीवसे यह प्रतिज्ञा की है कि मैं युद्धमें वाली-को मारकर तुम्हें राजा बना दूँँगा ॥ २९ ॥ इसी निश्चयको लेकर वे दोनों भी (उसके साथ) आये हैं; मेरी यह बात सच मानिये, नहीं तो अभी-अभी आपसे मार खाकर भागा हुआ वह कैसे लौट आता ? ॥ ३० ॥ इसलिये अब आप सर्वथा सुग्रीवसे वैरभाव छोड़कर उसे ले आइये और उसे तुरन्त युवराजपदपर अभिषिक्त कर श्रीरामकी शरणमें जाइये ॥ ३१ ॥ और हे कपिश्रेष्ठ ! मेरी, अंगदकी तथा इस राज्य और कुलकी रक्षा कीजिये । ऐसा कह- |