भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१६२अध्यात्मरामायण[सर्ग २

पाहि मामङ्गदं राज्यं कुलं च हरिपुङ्गव ।
इत्युक्त्वाश्रुमुखी तारा पादयोः प्रणिपत्य तम् ॥३२॥
हस्ताभ्यां चरणौ धृत्वा रुरोद भयविह्वला ।
तामालिङ्ग्य तदा वाली सस्नेहमिदमब्रवीत् ॥३३॥
स्त्रीस्वभावाद्विभेषि त्वं प्रिये नास्ति भयं मम ।
रामो यदि समायातो लक्ष्मणेन समं प्रभुः ॥३४॥
तदा रामेण मे स्नेहो भविष्यति न संशयः ।
रामो नारायणः साक्षादवतीर्णोऽखिलप्रभुः ॥३५॥
भूभारहरणार्थाय श्रुतं पूर्वं मयाऽनघे ।
स्वपक्षः परपक्षो वा नास्ति तस्य परात्मनः ॥३६॥
आनेष्यामि गृहं साध्वि नत्वा तच्चरणाम्बुजम् ।
भजतोऽनुभजत्येष भक्तिगम्यः सुरेश्वरः ॥३७॥
यदि स्वयं समायाति सुग्रीवो हन्मि तं क्षणात् ।
यदुक्तं यौवराज्याय सुग्रीवस्याभिषेचनम् ॥३८॥
कथमाहूयमानोऽहं युद्धाय रिपुणा प्रिये ।
शूरोऽहं सर्वलोकानां सम्मतः शुभलक्षणे ॥३९॥
भीतभीतमिदं वाक्यं कथं वाली वदेत्प्रिये ।
तस्माच्छोकं परित्यज्य तिष्ठ सुन्दरि वेश्मनि॥४०॥
एवमाश्वास्य तारां तां शोचन्तीमश्रुलोचनाम् ।
गतो वाली समुद्युक्तः सुग्रीवस्य वधाय सः ॥४१॥
दृष्ट्वा वालिनमायान्तं सुग्रीवो भीमविक्रमः ।
उत्पपात गले बद्धपुष्पमालः मतङ्गजवत् ॥४२॥
मुष्टिभ्यां ताडयामास वालिनं सोऽपि तं तथा ।
अहन्वाली च सुग्रीवं सुग्रीवो वालिनं तथा ॥४३॥
रामं विलोकयन्नेव सुग्रीवो युयुधे युधि ।
इत्येवं युध्यमानौ तौ दृष्ट्वा रामः प्रतापवान्॥४४॥
बाणमादाय तूणीरादैन्द्रे धनुषि सन्दधे ।
आकृष्य कर्णपर्यन्तमदृश्यो वृक्षखण्डगः ॥४५॥

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कर तारा वालीके चरणोंमें गिर पड़ी। उस समय उसके मुखपर आँसुओंकी धाराएँ बह रही थीं ॥ ३२ ॥ वह भयसे अधीर होकर अपने हाथोंसे उसके दोनों चरण पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगी।

तब वालीने उसका प्रेमपूर्वक आलिंगन कर इस प्रकार कहा ॥ ३३ ॥ "प्रिये! तुम अपने स्त्री-स्वभावसे व्यर्थ डरती हो, मुझे तो भयका कोई भी कारण दिखलायी नहीं देता। यदि लक्ष्मणके सहित प्रभु राम यहाँ आये हैं तो इसमें कोई सन्देह नहीं, कि उनसे मेरा प्रेम हो जायगा। हे अनघे ! राम तो साक्षात् सर्वेश्वर श्रीनारायण हैं, उन्होंने पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही अवतार लिया है—यह बात मैंने पहलेसे ही सुन रखी है। वे तो प्रकृति आदिसे परे सबके आत्मारूप हैं उनका कोई अपना या पराया पक्ष नहीं है ॥ ३४-३६ ॥ हे साध्वि ! मैं उनके चरणकमलोंमें प्रणाम कर उन्हें घर ले आऊँगा। वे देव-देवेश्वर भक्तिसे प्राप्त होते हैं और जो कोई उनका भजन करता है उसीके अनुकूल हो जाते हैं ॥ ३७ ॥ और यदि अकेला सुग्रीव ही आया है तो उसे मैं एक क्षणमें मार डालूँगा। इसके सिवा, तुमने जो उसे युवराजपदपर अभिषिक्त करनेकी बात कही, सो हे शुभलक्षणे प्रिये ! मैं सम्पूर्ण लोकोंमें माननीय शूरवीर हूँ। भला शत्रुद्वारा युद्धके लिये पुकारे जानेपर वाली उससे ऐसा अत्यन्त भयपूर्ण वाक्य कैसे कह सकता है ? अतः हे सुन्दरि ! तुम निश्चिन्त होकर घर बैठो" ॥ ३८-४० ॥

इस प्रकार शोकसे आँसू बहाती हुई ताराको धीरज बँधा, वाली सुग्रीवको मारनेपर उतारू होकर चला ॥ ४१ ॥ वालीको आता देख प्रचण्ड पराक्रमी सुग्रीव गलेमें पुष्पमाला पहने हुए मत्त गजराजके समान उछलने लगा ॥ ४२ ॥ फिर सुग्रीवने अपने घूँसोंसे वालीपर और वालीने सुग्रीवपर प्रहार किया। इसी प्रकार परस्पर बारम्बार वाली सुग्रीवपर और सुग्रीव वालीपर मुष्टिकाघात करने लगे ॥ ४३ ॥ युद्ध करते समय सुग्रीवकी दृष्टि रामकी ओर ही लगी हुई थी।

परमप्रतापी श्रीरघुनाथजीने उन दोनोंको इस प्रकार लड़ते देख अपने तरकशसे एक बाण निकाल कर अपने ऐन्द्र धनुषपर चढ़ाया और एक वृक्षकी ओटमें छि-

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