अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
DevanagariHindipublished423 पृष्ठ
पृष्ठ 188, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 188
सर्ग २ ] किष्किन्धाकाण्ड १६३
| निरीक्ष्य वालिनं सम्यग्लक्ष्यं तद्हृदयं हरिः ।<br>उत्ससर्जाशनिसमं महावेगं महाबलः ॥४६॥<br>बिभेद स शरो वक्षो वालिनः कम्पयन्महीम् ।<br>उत्पपात महाशब्दं मुञ्चन्स निपपात ह ॥४७॥<br>तदा मुहूर्त्तं निःसंज्ञो भूत्वा चेतनामपाप सः ।<br>ततो वाली ददर्शग्रे रामं राजीवलोचनम् ।<br>धनुरालम्ब्य वामेन हस्तेनान्येन सायकम् ॥४८॥<br>बिभ्राणं चीरवसनं जटामुकुटधारिणम् ।<br>विशालवक्षसं भ्राजद्वनमालाविभूषितम् ॥४९॥<br>पीनचार्व्वायतभुजं नवदूर्वादलच्छविम् ।<br>सुग्रीवलक्ष्मणाभ्यां च पार्श्वयोः परिसेवितम्॥५०॥ | छिपे धनुषको कर्णपर्यन्त तानकर महाबलवान् श्रीहरिने वालीको देख उसके हृदयको ठीक लक्ष्य करके वह वज्रके समान कठोर और महावेगशाली बाण छोड़ दिया ॥ ४४–४६ ॥ उस बाणने वालीके वक्षःस्थलको वेध डाला । बाणके लगते ही वाली बड़ा घोर शब्द करता हुआ उछलकर पृथिवीपर गिर पड़ा । उसके गिरते समय पृथिवी डगमगा उठी ॥ ४७ ॥ उस समय एक मुहूर्त्तके लिये वह संज्ञाशून्य हो गया; पीछे जब उसे चेत हुआ तो उसने अपने सामने कमलनयन श्रीरघुनाथजीको खड़े देखा । वे बायें हाथसे धनुषका सहारा लेकर दाहिनेमें बाण लिये हुए थे तथा शरीरमें चीरवस्त्र और शिरपर जटाओंका मुकुट धारण किये थे। उनका विशाल वक्षःस्थल मनोहर वनमालासे विभूषित था ॥ ४८-४९ ॥ भुजाएँ स्थूल, सुन्दर और लम्बी-लम्बी थीं, शरीरकी कान्ति नवीन दूर्वादलके समान श्यामवर्ण थी तथा उनके दोनों ओर सुग्रीव और लक्ष्मण उनकी सेवामें खड़े थे ॥ ५० ॥ |
| विलोक्य शनकैः प्राह वाली रामं विगर्हयन् ।<br>किं मयाऽपकृतं राम तव येन हतोऽस्म्यहम् ॥५१॥<br>राजधर्ममविज्ञाय गर्हितं कर्म ते कृतम् ।<br>वृक्षखण्डे तिरोभूत्वा त्यजता मयि सायकम्॥५२॥<br>यशः किं लप्स्यसे राम चोरवत्कृतसङ्गरः ।<br>यदि क्षत्रियदायादो मनोर्व्वंशसमुद्भवः ॥५३॥<br>युद्धं कृत्वा समक्षं मे प्राप्स्यसे तत्फलं तदा ।<br>सुग्रीवेण कृतं किं ते मया वा न कृतं किमु ॥५४॥<br>रावणेन हृता भार्या तव राम महावने ।<br>सुग्रीवं शरणं यातस्तदर्थमिति शुश्रुम ॥५५॥<br>बत राम न जानीषे मद्बलं लोकविश्रुतम् ।<br>रावणं संकुलं बद्ध्वा ससीतं लङ्कया सह ॥५६॥<br>आनयामि मुहूर्त्तार्द्धाद्यदि चेच्छामि राघव । | रामचन्द्रजीको देखकर वालीने कुछ तिरस्कार करते हुए मन्दस्वरमें कहा—“हे राम ! मैंने आपका क्या बिगाड़ा था, जो आपने मुझे मारा ॥ ५१ ॥ राजनीति को न जाननेके कारण ही आपने ऐसा निन्दनीय कार्य किया है। इस प्रकार वृक्षकी आड़में छिपकर मुझपर बाण छोड़ते हुए चोरके समान युद्ध करनेसे आपको क्या यश मिलेगा ? यदि आप क्षत्रियकुमार हैं और आपका जन्म मनुजीके पवित्र वंशमें हुआ है, तो मेरे सामने आकर युद्ध किया होता, तब आपको उसका (यश अथवा स्वर्गरूप) कोई फल भी मिलता । हे राम ! सुग्रीवने आपके साथ ऐसा कौन-सा उपकार किया था और मैंने क्या नहीं किया ? ॥ ५२-५४ ॥ मैंने तो यही सुना है कि दण्डकारण्यमें रावण आपकी भार्याको हर ले गया था; उसे पानेके लिये ही आपने सुग्रीवकी शरण ली है ॥ ५५ ॥ किन्तु खेद है कि आपने मेरा विश्वविख्यात बल नहीं सुना । हे राघव ! मैं यदि चाहूँ तो आधे मुहूर्त्तमें ही रावणको कुलसहित बाँधकर |