अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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धर्मिष्ठ इति लोकेऽस्मिन् कथ्यसे रघुनन्दन ॥५७॥
वानरं व्याधवद्धत्वा धर्मं कं लप्स्यसे वद ।
अभक्ष्यं वानरं मांसं हत्वा मां किं करिष्यसि ॥५८॥
इत्येवं बहु भाषन्तं वालिनं राघवोऽब्रवीत् ।
धर्मस्य गोप्ता लोकेऽस्मिंश्चरामि सशरासनः॥५९॥
अधर्मकारिणं हत्वा सद्धर्मं पालयाम्यहम् ।
दुहिता भगिनी भ्रातृभार्या चैव तथा स्नुषा ॥६०॥
समा यो रमते तासामेकामपि विमूढधीः ।
पातकी स तु विज्ञेयः स वध्यो राजभिः सदा॥६१॥
त्वं तु भ्रातुः कनिष्ठस्य भार्यायां रमसे बलात् ।
अतो मया धर्मविदा हतोऽसि वनगोचर ॥६२॥
त्वं कपित्वान्न जानीषे महान्तो विचरन्ति यत् ।
लोकं पुनानाः सञ्चारैस्तस्मान्नातिभाषयेत् ॥६३॥
तच्छ्रुत्वा भयसन्त्रस्तो ज्ञात्वा रामं रमापतिम् ।
वाली प्रणम्य रभसाद्रामं वचनमब्रवीत् ॥६४॥
राम राम महाभाग जाने त्वां परमेश्वरम् ।
अजानता मया किञ्चिदुक्तं तत्क्षन्तुमर्हसि ॥६५॥
साक्षात्त्वच्छरघातेन विशेषेण तवाग्रतः ।
त्यजाम्यसूनन्महायोगािदुर्लभं तव दर्शनम् ॥६६॥
यन्नाम विवशो गृह्णन् म्रियमाणः परं पदम् ।
याति साक्षात्स एवाद्य मुमूर्षोर्मे पुरः स्थितः ॥६७॥
देव जानामि पुरुषं त्वां श्रियं जानकीं शुभाम् ।
रावणस्य वधार्थाय जातं त्वां ब्रह्मणार्यितम् ॥६८॥
सीताजी और लंकाके सहित ले आऊँ। और हे रघुनन्दन ! आप तो संसारमें बड़े धर्मात्मा कहे जाते हैं॥ ५६-५७ ॥
बताइये, एक वानरको व्याधके समान मारकर आपको क्या पुण्य मिलेगा ? वानरका मांस तो अभक्ष्य है फिर मुझे मारकर आप क्या करेंगे ?' ॥ ५८ ॥
वालीके इस प्रकार बहुत कुछ कहनेपर रघुनाथजीने कहा—"मैं धर्मकी रक्षा करनेके लिये ही लोकमें धनुष धारण कर विचरता हूँ ॥ ५९ ॥ और अधर्म करनेवालोंको मारकर सद्धर्मका पालन करता हूँ। पुत्री, बहिन, (छोटे) भाईकी स्त्री और पुत्रवधू ये चारों समान हैं। जो मूढ़ इनमेंसे किसी एकके साथ भी रमण करता है उसे महापापी जानना चाहिये; राजाको उचित है कि उसे अवश्य मार डाले ॥ ६०-६१ ॥
अरे वनचर ! तू बलात्कारसे अपने छोटे भाईकी स्त्रीके साथ रमण करता था इसीलिये मुझ धर्मज्ञने तुझे मारा है ॥ ६२ ॥ तू वानर ही तो है; तुझे इस बातका पता नहीं है कि महापुरुष सदैव अपने आचरणोंसे लोकोंको पवित्र करते हुए विचरा करते हैं। इसलिये उनसे इस प्रकार बढ़-बढ़कर बातें न करनी चाहिये" ॥ ६३ ॥
भगवान्के ये वचन सुनकर वाली उन्हें साक्षात् लक्ष्मीपति श्रीनारायण जानकर भयभीत हो गया और उन्हें शीघ्रतासे प्रणाम करके बोला—॥ ६४ ॥ "हे राम ! हे राम ! हे महाभाग ! मैं जान गया, आप साक्षात् परमेश्वर हैं। अज्ञानवश मैं जो कुछ कह गया हूँ उसे आप क्षमा करें ॥ ६५ ॥
हे प्रभो ! आपका दर्शन तो बड़े-बड़े योगियोंको भी अत्यन्त दुर्लभ है; बड़े भाग्यकी बात है कि मैं आपहीके बाणसे विद्ध होकर फिर आपहीके सामने प्राण छोड़ रहा हूँ ॥ ६६ ॥
मरते समय विवश होकर भी जिनका नाम लेनेसे पुरुष परम-पद प्राप्त कर लेता है, वही आप आज इस अन्तिम घड़ीपर साक्षात् मेरे सामने विराजमान हैं ॥ ६७ ॥
हे देव ! मैं यह जानता हूँ कि आप साक्षात् परमपुरुष नारायण हैं और जानकीजी लक्ष्मी हैं। ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे रावणका वध करनेके लिये ही आपने अवतार लिया है ॥ ६८ ॥ हे राम ! अब मैं