अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ३ ] किष्किन्धाकाण्ड : १६५
अनुजानीहि मां राम यान्तं त्वत्पदमुत्तमम् । मम तुल्यबले बाले अङ्गदे त्वं दयां कुरु ॥ ६९ ॥
विशल्यं कुरु मे राम हृदयं पाणिना स्पृशन् । तथेति बाणमुद्धृत्य रामः पस्पर्श पाणिना । त्यक्त्वा तद्वानरं देहममरेन्द्रोऽभवत्क्षणात् ॥ ७० ॥
वाली रघूत्तमशराभिहतो विमृष्टो रामेण शीतलकरेण सुखाकरेण । सद्यो विमुच्य कपिदेहमनन्यलभ्यं प्राप्तं परं परमहंसगणैर्दुरापम् ॥ ७१ ॥
आपके सर्वश्रेष्ठ परमधामको जा रहा हूँ, आप मुझे आज्ञा दीजिये । मेरा बालक अंगद मेरे ही समान बलशाली है, उसपर आप दयादृष्टि रखें ॥ ६९ ॥
हे राम ! मेरे हृदयको अपने कर-कमलोंसे स्पर्शकर इस बाणको निकाल दीजिये।" तब रामचन्द्रजीने 'अच्छा' कह उसे स्पर्श करते हुए वह बाण निकाल दिया । उसके निकलते ही वाली वानर-शरीर छोड़कर इन्द्र-रूप हो गया ॥ ७० ॥
हे पार्वति ! वाली रघुनाथजीके बाणसे मारा गया था और फिर उसे उनके सुखमय कर-कमलका शीतल स्पर्श भी मिला । अतः वह शीघ्र ही अपना वानर-देह छोड़कर उस परम श्रेष्ठ पदको प्राप्त हुआ जो और किसीके लिये बहुत ही दुर्लभ है। और तो क्या, महान् परमहंसोंको भी उसका मिलना अत्यन्त कठिन है ॥ ७१ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
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तृतीय सर्ग
ताराका विलाप, श्रीरामचन्द्रजीका उसे समझाना तथा सुग्रीवका राजपद प्राप्त करना ।
श्रीमहादेव उवाच
निहते वालिनि रणे रामेण परमात्मना । दुद्रुवुर्वानराः सर्वे किष्किन्धां भयविह्वलाः ॥ १ ॥
तारामूचुर्महाभागे हतो वाली रणाजिरे । अङ्गदं परिरक्षाद्य मन्त्रिणः परिनोदय ॥ २ ॥
चतुर्द्वार कपातादीन् बद्ध्वा रक्षामहे पुरीम् । वानराणां तु राजानमङ्गदं कुरु भामिनि ॥ ३ ॥
निहतं वालिनं श्रुत्वा तारा शोकविमूर्च्छिता । अताडयत्स्वपाणिभ्यां शिरो वक्षश्च भूरिशः ॥ ४ ॥
किमङ्गदेन राज्येन नगरेण धनेन वा । इदानीमेव निधनं यास्यामि पतिना सह ॥ ५ ॥
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! परमात्मा रामके द्वारा युद्धमें वालीके मारे जानेपर समस्त वानरगण भयसे व्याकुल होकर किष्किन्धापुरीमें दौड़े गये ॥ १ ॥
और तारासे बोले— "हे महाभागे ! वानरराज वाली युद्धक्षेत्रमें मारे गये । अब आप राजकुमार अंगदकी रक्षा कीजिये और मन्त्रियोंको सावधान कर दीजिये ॥ २ ॥
हे भामिनि ! हमलोग चारों द्वारोंके किवाड़ आदि लगाकर नगरकी रक्षा करते हैं, आप अंगदको वानरोंका राजा बनाइये" ॥ ३ ॥
वालीको मरा हुआ सुनकर तारा शोकसे मूर्च्छित हो गयी और अपने शिर और छातीको बारम्बार हाथोंसे पीटने लगी ॥ ४ ॥
और बोली, "मुझे अंगद, राज्य, नगर और धन आदिसे क्या काम है, मैं तो अभी अपने पतिदेवके साथ ही प्राण त्याग करूँगी" ॥ ५ ॥ ऐसा कह वह रोती हुई तुरन्त ही वहाँ