भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१६६ अध्यात्मरामायण [सर्ग ३


इत्युक्त्वा त्वरिता तत्र रुदती मुक्तमूर्धजा ।
ययौ ताराऽतिशोकार्ता यत्र भर्तृकलेवरम् ॥ ६ ॥

पतितं वालिनं दृष्ट्वा रक्तैः पांसुभिरावृतम् ।
रुदती नाथनाथेति पतिता तस्य पादयोः ॥ ७ ॥

करुणं विलपन्ती सा ददर्श रघुनन्दनम् ।
राम मां जहि बाणेन येन वाली हतस्त्वया ॥ ८ ॥

गच्छामि पतिसालोक्यं पतिर्मामभिकाङ्क्षते ।
स्वर्गेऽपि न सुखं तस्य मां विना रघुनन्दन ॥ ९ ॥

पत्नीवियोगजं दुःखमनुभूतं त्वयाऽनघ ।
वालिने मां प्रयच्छाशु पत्नीदानफलं भवेत् ॥ १० ॥

सुग्रीव त्वं सुखं राज्यं दापितं वालिघातिना ।
रामेण रुमया सार्धं भुङ्क्ष्व सापत्‍नवजितम् ॥ ११ ॥

इत्येवं विलपन्तीं तां तारां रामो महामनाः ।
सान्त्वयामास दयया तत्त्वज्ञानोपदेशतः ॥ १२ ॥

किं भीरु शोचसि व्यर्थं शोकस्याविषयं पतिम् ।
पतिस्तवायं देहो वा जीवो वा वद तत्त्वतः ॥ १३ ॥

पञ्चात्मको जडो देहस्त्वङ्मांसरुधिरास्थिमान् ।
कालकर्मगुणोत्पन्नः सोऽप्यास्तेऽद्यापि ते पुरः ॥ १४ ॥

मन्यसे जीवमात्मानं जीवस्तर्हि निरामयः ।
न जायते न म्रियते न तिष्ठति न गच्छति ॥ १५ ॥

न स्त्री पुमान्न षण्ढो वा जीवः सर्वगतोऽव्ययः ।
एक एवाद्वितीयोऽयमाकाशवदलेपकः ।
नित्यो ज्ञानमयः शुद्धः स कथं शोकमर्हति ॥ १६ ॥


गयी जहाँ उसके पतिका देह पड़ा हुआ था, उस समय वह अत्यन्त शोकाकुल थी और उसके बाल बिखरे हुए थे ॥ ६ ॥ वहाँ वालीको रक्त और धूलिसे लथपथ पड़ा देख वह 'हा नाथ ! हा नाथ !' कहकर रोती हुई उसके पैरोंपर गिर पड़ी ॥ ७ ॥

इस प्रकार करुणक्रन्दन करते हुए उसकी दृष्टि श्रीरघुनाथजीपर पड़ी । (उन्हें देखकर वह बोली—) "राम ! आपने जिस बाणसे वालीको मारा है उसीसे मुझे भी मार डालिये ॥ ८ ॥ जिससे मैं तुरन्त ही पति-लोकको चली जाऊँ; वे मेरी बाट देख रहे होंगे, क्योंकि हे रघुनन्दन ! मेरे विना उन्हें स्वर्गमें भी चैन नहीं होगा ॥ ९ ॥ हे अनघ ! पत्नीके वियोगका दुःख आपने अनुभव किया ही है (अतः आपको उसकी तीव्रताका अनुमान हो ही सकता है।) इसलिये अब आप मुझे वालीके पास पहुँचा दीजिये । इससे आपको स्त्री-दानका फल मिलेगा ॥ १० ॥ सुग्रीव ! तुम्हें वालीको मारनेवाले रामने राज्य दिला ही दिया है । अब उस निष्कण्टक राज्यको तुम रुमाके साथ सुखपूर्वक भोगो" ॥ ११ ॥

इस प्रकार विलाप करती हुई उस ताराको महामना रामने दयापूर्वक तत्त्वज्ञानका उपदेश देकर शान्त किया ॥ १२ ॥ वे बोले—"अयि भीरु ! तेरा पति शोक करनेयोग्य नहीं है, तू उसके लिये व्यर्थ क्यों शोक करती है ? तू विचारकर ठीक-ठीक बता वास्तवमें तेरा पति यह देह है या इसमें रहनेवाला जीव ? (यदि यह देह ही तेरा पति है तो) यह तो जड, पञ्चभूतजय एवं त्वचा, मांस, रुधिर और अस्थियोंसे बना हुआ है तथा काल, कर्म और गुणोंसे उत्पन्न हुआ है; और वह तो अब भी तेरे सामने पड़ा है । (फिर उसके लिये शोक क्यों करती है ?) ॥ १३-१४ ॥ और यदि तू जीवको अपना पति मानती है तो भी तुझे शोक न करना चाहिये क्योंकि वह निर्विकार है। वह न उत्पन्न होता है, न मरता है, न स्थिर रहता है और न आता-जाता है ॥ १५ ॥ जीव सर्वव्यापी और अव्यय है, वह स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक कुछ भी नहीं है बल्कि एक, अद्वितीय, आकाशके समान निर्लेप, नित्य, ज्ञानमय और शुद्ध है फिर वह शोचनीय कैसे हो सकता है ?" ॥ १६ ॥