भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ३ ]
किष्किन्धाकाण्ड
१६७


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तारोवाच<br>देहोऽचित्काष्ठवद्राम जीवो नित्यश्चिदात्मकः ।<br>सुखदुःखादिसम्बन्धः कस्य स्याद्राम मे वद ॥१७॥तारा बोली- हे राम ! देह तो काष्ठके समान जड है और जीव नित्य तथा चैतन्यरूप है, (उसका नाश हो नहीं सकता) फिर सुख-दुःखादिका सम्बन्ध किससे होता है, यह मुझे बतलाइये ॥ १७ ॥
श्रीराम उवाच<br>अहङ्कारादिसम्बन्धो यावद्देहेन्द्रियैः सह ।<br>संसारस्तावदेव स्यादात्मनस्त्वविवेकिनः ॥१८॥श्रीरामचन्द्रजी बोले- जबतक देह और इन्द्रियोंके साथ 'मैं' 'मेरापन' आदिका सम्बन्ध रहता है तबतक आत्मा और अनात्माके विवेकसे रहित जीवका सुख-दुःखादिके भोगरूप संसारसे सम्बन्ध रहता है ॥ १८ ॥
मिथ्याऽऽरोपितसंसारो न स्वयं विनिवर्तते ।<br>विषयान्ध्यायमानस्य स्वप्ने मिथ्याऽऽगमो यथा ॥१९॥यह संसार आत्मामें मिथ्या ही आरोपित हुआ है तथापि ज्ञानोदयके बिना यह अपने-आप निवृत्त नहीं होता; जिस प्रकार विषयोंका निरन्तर ध्यान करनेवाले पुरुषको स्वप्नमें अनेक पदार्थ दीखते हैं, परन्तु वे होते मिथ्या ही हैं ॥१९॥
अनाद्यविद्यासम्बन्धात्तत्कार्याहङ्कृतेस्तथा ।<br>संसारोऽपार्थकोऽपि स्याद्रागद्वेषादिसङ्कुलः ॥२०॥अनादि अविद्या और उसके कार्य अहंकारके सम्बन्धसे स्थित हुआ यह संसार निरर्थक (अत्यन्त मिथ्या) होते हुए भी राग-द्वेष आदिसे पूर्ण है ॥ २० ॥
मन एव हि संसारो बन्धश्चैव मनः शुभे ।<br>आत्मा मनः समानत्वमेत्य तद्गतबन्धभाक् ॥२१॥हे शुभे ! मन ही संसार है और मन ही बन्धन है । उस अनात्म वस्तु मनके साथ (अन्योन्याध्याससे) एक हो जानेसे ही यह आत्मा तद्गत सुख-दुःखादिके बन्धनमें पड़ता है ॥ २१ ॥
यथा विशुद्धः स्फटिकोऽलक्तकादिसमीपगः ।<br>तत्तद्वर्णयुगाभाति वस्तुतो नास्ति रञ्जनम् ॥२२॥जैसे स्फटिकमणि स्वभावसे शुक्लवर्ण होने पर भी लाख आदिके समीप होनेपर उसीके रंगकी मालूम होने लगती है, परन्तु वास्तवमें उसमें वह रंग नहीं होता ॥ २२ ॥
बुद्धीन्द्रियादिसामीप्यादात्मनः संसृतिर्बलात् ।<br>आत्मा स्वलिङ्गं तु मनः परिगृह्य तदुद्भवन् ॥२३॥<br><br>कामान् जुषन् गुणैर्बद्धः संसारे वर्ततेऽवशः ।<br>आदौ मनोगुणान् सृष्ट्वा ततः कर्माण्यनेकधा ॥२४॥<br><br>शुक्ललोहितकृष्णानि गतयस्तत्समानतः ।<br>एवं कर्मवशाज्जीवो भ्रमत्याभूतसम्प्लवम् ॥२५॥वैसे ही बुद्धि और इन्द्रिय आदिकी सन्निधिसे आत्माको बलात्कारसे संसारकी प्रतीति होती है। आत्मा, अपने लिंग (पहचाननेके साधन) मनको स्वीकार कर उससे प्राप्त होनेवाले विषयोंका सेवन करता हुआ उसके राग-द्वेषादि गुणोंमें बँधकर विवश हो संसार-चक्रमें फँसा रहता है। पहले वह राग-द्वेषादि मनके गुणोंकी रचना करता है और फिर (उनके योगसे) नाना प्रकारके कर्म करता है । वे कर्म शुक्ल (जप, ध्यानादि) लोहित (हिंसामय यज्ञ-यागादि) और कृष्ण (मद्यपानादि पापकर्म) तीन प्रकारके होते हैं । उन कर्मोंके अनुसार ही उसकी गतियाँ होती हैं । इस प्रकार यह जीव कर्मोंके वशीभूत होकर प्रलय-पर्यन्त आवागमनके चक्रमें पड़ा रहता है ॥२३-२५॥
सर्वोपसंहृतौ जीवो वासनाभिः स्वकर्मभिः ।<br>अनाद्यविद्यावशगास्तिष्ठत्यभिनिवेशतः ॥२६॥प्रलयकालमें सब भूतोंका लय हो जानेपर भी अपने कर्त्ता-भोक्तापनके अभिनिवेशसे यह अपनी...