भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१६८अध्यात्मरामायण[सर्ग ३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सृष्टिकाले पुनः पूर्ववासनामानसैः सह ।<br>जायते पुनरप्येवं घटीयन्त्रमिवावशः ॥२७॥वासनाओं और कर्मोंके साथ अनादि अविद्यासे आच्छादित हुआ रहता है ॥२६॥ जब नवीन सृष्टि आरम्भ होती है तो यह विवश होकर अपनी पूर्व वासनाओंसे युक्त मनके सहित घटीयन्त्रके समान फिर उत्पन्न हो जाता है ॥ २७ ॥
यदा पुण्यविशेषेण लभते सङ्गतिं सताम् ।<br>मद्भक्तानां सुशान्तानां तदा मद्विषया मतिः ॥२८॥जिस समय किसी विशेष पुण्यपरिपाकसे इसे मेरे भक्त और शान्तचित्त महात्माओंकी संगति मिलती है उस समय इसका चित्त मेरी ओर लगता है ॥ २८ ॥
मत्कथाश्रवणे श्रद्धा दुर्लभा जायते ततः ।<br>ततः स्वरूपविज्ञानमनायासेन जायते ॥२९॥उससे मेरी कथा सुननेमें इसकी श्रद्धा होती है, जो बहुत ही दुर्लभ है। मेरी कथा सुननेसे इसको अनायास ही मेरे स्वरूपका ज्ञान हो जाता है ॥ २९ ॥
तदाचार्यप्रसादेन वाक्यार्थज्ञानतः क्षणात् ।<br>देहेन्द्रियमनःप्राणाहङ्कृतिभ्यः पृथक्स्थितम् ॥३०॥उस समय गुरु-कृपाद्वारा तत्त्वमसि आदि महावाक्योंके अर्थ-ज्ञानसे तथा स्वयं अपने अनुभवसे भी यह अपने सच्चिदानन्दस्वरूप अद्वितीय आत्माको देह, इन्द्रिय, मन, प्राण और अहंकारादिसे पृथक् जानकर एक क्षणमें ही तुरन्त मुक्त हो जाता है। हे तारे ! मैंने यह वास्तविक सत्य तुझसे कह दिया ॥ ३०-३१ ॥
स्वात्मानुभवतः सत्यमानन्दात्मानमद्वयम् ।<br>ज्ञात्वा सद्यो भवेन्मुक्तः सत्यमेव मयोदितम् ॥३१॥
एवं मयोदितं सम्यगालोचयति योऽनिशम् ।<br>तस्य संसारदुःखानि न स्पृशन्ति कदाचन ॥३२॥मेरे कहे हुए इस परमार्थ-ज्ञानका जो अहर्निश मनन करता है उसे सांसारिक दुःख कभी स्पर्श नहीं करते ॥ ३२ ॥
त्वमप्येतन्मया प्रोक्तमालोचय विशुद्धधीः ।<br>न स्पृश्यसे दुःखजालैः कर्मबन्धाद्विमोक्ष्यसे ॥३३॥तू भी शुद्ध-चित्त होकर मेरे इस उपदेशका मनन कर । ऐसा करनेसे क्लेश-कलाप तुझे छू भी न सकेंगे और तू कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जायगी ॥ ३३ ॥
पूर्वजन्मनि ते सुभ्रु कृता मद्भक्तिरुत्तमा ।<br>अतस्तव विमोक्षाय रूपं मे दर्शितं शुभे ॥३४॥हे सुभ्रु ! अपने पूर्वजन्ममें तूने मेरी उत्कृष्ट भक्ति की थी, इसीलिये हे सुन्दरि ! तुझे मुक्त करनेके लिये मैंने अपना दर्शन दिया है ॥ ३४ ॥
ध्यात्वा मद्रूपमनिशमालोचय मयोदितम् ।<br>प्रवाहपतितं कार्यं कुर्वन्त्यपि न लिप्यसे ॥३५॥तू रात-दिन मेरे रूपका ध्यान करती हुई मेरे उपदेशका मनन कर । ऐसा करनेसे प्रारब्ध-क्रमसे प्राप्त हुए कर्मोंको करती हुई भी तू उनसे लिप्त न होगी ॥ ३५ ॥
श्रीरामेणोदितं सर्वं श्रुत्वा ताराऽतिविस्मिता ।<br>देहाभिमानजं शोकं त्यक्त्वा नत्वा रघूत्तमम् ॥३६॥भगवान् रामका यह अद्भुत उपदेश सुनकर ताराको बड़ा ही विस्मय हुआ और उसने देहाभिमानजनित शोक छोड़कर श्रीरघुनाथजीको प्रणाम किया, तथा आत्मानुभवसे सन्तुष्ट होकर वह तत्काल जीवन्मुक्त हो गयी ।
आत्मानुभवसन्तुष्टा जीवन्मुक्ता बभूव ह ।<br>क्षणसङ्गममात्रेण रामेण परमात्मना ॥३७॥परमात्मा रामके क्षणमात्रके सत्संगसे वह अनादि अविद्याके बन्धनको काटकर निष्पाप और मुक्त हो गयी ।
अनादिबन्धं निर्धूय मुक्ता साऽपि विकल्मषा ।<br>सुग्रीवोऽपि च तच्छ्रुत्वा रामवक्त्रात्समीरितम् ॥३८॥भगवान्‌के श्रीमुखका वक्तव्य सुनकर सुग्रीवका भी समस्त अज्ञान जाता रहा और वह शान्त-